बहस जड़ और जड़ता पर

प्रशान्त करण
रांची(झारखण्ड)
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     शहर के पुराने कॉफी हाउस को नया रूप दिया गया था,इसलिए युवा जोड़ी बनाकर महाविद्यालय के समय आने लगे थे। शाम में पारिवारिक भीड़ जुटती,पर रविवार को युवाओं की संख्या नगण्य रहती। बात रविवार की है। पिछले शनिवार को शहर में आचार्या आनन्दीमयी का प्रवचन था। दूसरे दिन हर रविवार की तरह ग्यारह बजे जुटान होना शुरू हुआ। सबसे पहले अंग्रेजी के प्राध्यापक दीपक कुमार उर्फ डीके आकर कुर्सी पर चुपचाप बैठकर सोचने लगे। फिर हिंदी दैनिक समाचार-पत्र के चंचल जी आए। अब दोनों बात करने लगे। इतने में हिंदी के प्राध्यापक प्रखर जी आए। उनके पीछे उर्दू के शायर और प्रो. डॉ.नसीम भाई पँहुचे। फिर अंग्रेजी समाचार-पत्र के स्थानीय संपादक चंद्रदेव जी उर्फ सीडी,संस्कृत के आचार्य पण्डित विद्यानन्दन और आकाशवाणी के हृदयेश जी भी आ गए। कॉफी आ गई ।अंत में रामलाल जी भी आ गए। उनके लिए भी कॉफ़ी मंगाई गई।
  चंचल जी ने कहा-कल आचार्या आनन्दीमयी ‘जड़ और जड़ता’ पर बोल रही थी। वे कह रही थीं कि अगर करुणा की दिशा में आगे बढ़ना है,तो सबसे पहले हमारे आस-पास,जिसे हम जड़ कहते हैं,उसका जो जगत है,यद्यपि जड़ कुछ भी नहीं,लेकिन हमारी समझ के भीतर अभी जो जड़ मालूम पड़ता है, उस जड़ से ही शुरू करना होगा। उस जड़ जगत के प्रति ही,करुणापूर्ण होना पड़ेगा,तभी हमारी जड़ता टूटेगी। हमारी यही जड़ता ही हमारी समस्या है।
     तभी वनस्पति विभाग के अखिलेश जी भी आ गए। उनके लिए भी कॉफ़ी का आदेश दिया गया। प्रखर जी ने बात फिर शुरू की। बोले-देखिए बात जड़ पर हो रही है। जड़ का अर्थ अचेतन,चेतना-रहित,निर्बुद्धि,मूर्ख,वेद पढ़ने में असमर्थ, सर्दी से ठिठुरा,जकड़ा हुआ,निश्चेष्ट,गति-क्रिया रहित,बहरा-गूंगा,पौधों का वह भाग जो जमीन के अंदर रहता है,मूल,नींव, आधार आदि होता है। जड़ता प्रचलित तैंतीस में से एक संचारी भाव,निश्चेष्ट हो जाना जड़ता है सर्व कार्या प्रति पत्ति:।
गीता में धनन्जय ने इष्ट दर्शन और अनिष्ट श्रवण के कारण जड़ता के उदाहरण दिए हैं। एकदम से ठप हो जाना जड़ता है। इस अवस्था में अनुभव होते ही व्यक्ति के मानसिक एवं शारीरिक अवस्था कुछ देर के लिए स्थगित हो जाते हैं। जड़ता मानसिक अवस्था है।
‘हित अहितहि देखे जहाँ,अचल चेष्टा होई।
जानि बूझि कारज थके,जड़ता बरने सोई’।
उनको टक्कर देने के लिए चंचल जी बोल पड़े। जड़ की मुस्कान पर बच्चन जी की रचना प्रसिद्ध है। मिकलोश रादनोती की रचना-जड़ की ताकत लहकती है-का हिंदी में अनुवाद विष्णु खरे ने किया। चंचल जी की बात खत्म होते ही पण्डित विद्यानन्द जी ने अपनी बात शुरू की। बोले-नारद पुराण के पूर्व भाग के द्वितीय पद में जड़ की चर्चा की गई है,जिसके अनुसार राजा ऋषभ के पुत्र तथा पहिले मन्वन्तर के एक विष्णु भक्त राजा जड़भरत थे। वे अंगिरसगोत्री एक ब्राह्मण थे,जो जड़वत रहते थे।भागवतानुसार वानप्रस्थ आश्रम में राजा भरत ने एक हिरन पाला था,जिसकी चिंता उन्हें अंत तक रही। अतः मरने पर ही वे हिरन की योनि में उत्पन्न हुए,यह शरीर त्याग फिर ब्राह्मण हुए। वे संसार की वासना से बचने के लिए जड़वत रहते। इसी कारण उनका नाम जड़भरत पड़ा। एक बार सौबिर राज शिविका पर चढ़ इक्षुमति नदी के तट पर महर्षि कपिल के आश्रम पर जाना चाहते थे।अतः बेगार में जड़भरत पकड़े गए। उनके काम करने की गति में शिथिलता देखकर राजा बिगड़ गए,लेकिन जड़भरत के विद्वतापूर्ण उत्तर से वे बड़े प्रभावित हुए और उनके शिष्य हो गए।
   अब नसीम भाई कॉफी खत्म कर कप रखते हुए बोले-देखिए जनाब,उर्दू में भी जड़ शब्द है। इसका मतलब होता है-पानी,आब,बर्फ…और जड़ता का मतलब है ग़ैरफुतहरीरकी,बेवकूफी। वे अपनी बात और कहना चाह ही रहे थे कि सीडी बोलने लगे-जड़ को अंग्रेजी में रूट कहते हैं। इसका अर्थ मूल,तलदेश,मूल अवयव, मूल अंग,आधार,बुनियाद,असलियत आदि है।
    अखिलेश जी ने उनको काटते हुए कहा-आई विल एक्सप्लेन इट। देखिए-जड़ पौधों का वह भाग है,जो जमीन के अंदर रहकर पौधों के लिए जल,मिनरल्स वगैरह जमीन से लाकर देता है। यह तने से लगा होता है। अपने आकार के आधार पर इसकी बनावट अलग अलग भी होती है।जैसे-फ्यूजिफॉर्म,नेपिफॉर्म, कोनिकल,ट्युबेरस,न्यूमेटोफोर आदि।सपोर्ट के आधार पर ये प्रॉप रूट,स्टिल्ट रूट,क्लाइम्बिंग रूट,क्लिंगींग रूट आदि और कार्य के अनुसार सल्किंग रूट, एपिफाइट रूट,फ्लोटिंग रूट, असाइमिलेट्री रूट आदि होते हैं।
अब रामलाल जी से रहा नहीं गया। बोले-अखिलेश जी,यह आपके वनस्पति का ज्ञान हम लोगों के लिए बाउंसर हो गया।देखिए,बात आचार्या के प्रवचन से शुरू हुई। हम तो अल्पतम ज्ञानी हैं,जो हमारी समझ में आया वह यह है कि जड़ की तरह हमें धरती पर ही रहना चाहिए।बल्कि सही कहें तो धरती के अंदर। अंदर फूलते-फलते रहें। बाहर दिखाई भी नहीं देगा। किसी को कोई शक भी नहीं होगा।अपना कमाया सब छिपाकर रखना चाहिए। कोई छापे का चक्कर ही नहीं रहेगा। जमीन के ऊपर डाली लगे,न लगे बस जड़ मजबूत रहेगी तो डाली फूलती रहेगी। इसी तरह हर बात की जड़ तक जाना चाहिए। जो नेता जड़ तक यानी मतदाता तक जम जाता है, ‘मत’ उसी को मिलता है। जीतने के बाद जड़ की तरह भूमिगत..। देखिए सरकारी दफ्तरों में काम कराने का मेरा सफलतम अनुभव है। हम तो हर असम्भव काम भी करवा लेते हैं। सिद्धांत वही है-जड़ तक जाता हूँ। सबसे पहले चपरासी को पकड़ लेता हूँ। वही जड़ है,वह हमें बाबू,बड़े बाबू,छोटा साहब,बड़ा साहब तक के पास के काम करवाने का पिछला दरवाजा दिखा देता है,जिसका पता लगाना आम ईमानदार आदमी के लिए मुश्किल है। वह चपरासी उन पिछले दरवाजे के पास के की अदृश्य खिड़की भी दिखा देगा। उस खिड़की पर पर्ची कटती है। इधर पर्ची कटी,उधर आपकी फ़ाइल आगे बेझिझक बढ़ गई। इस तरह जड़ से फुनगी तक पँहुच जाता हूँ। सीधे फुनगी तक नहीं जाना चाहिए। जड़ से होकर ही फुनगी तक पंहुचना चाहिए।नहीं तो सीधे फुनगी पर जाने का मतलब सीधे बड़े साहब से मिलकर काम कराने की कोशिश में लचीली फुनगी या तो टूट जाती है या झुककर नीचे जड़ के पास गिरा देती है। गिरने से आप घायल हो सकते हैं। जितनी ऊंचाई पर फुनगी, उतनी ज्यादा चोट नीचे जड़ तक आने में। इससे बचने में ही भलाई है,इसलिए जड़ पकड़ना जरूरी है। जड़ से ही जड़ता दूर होगी। जड़ता का अपना सिद्धांत होता है। जड़ता से निकलने के लिए बाह्य बल लगाना पड़ता है। यह बल शारीरिक,आर्थिक या राजनीतिक किसी प्रकार का होना जरूरी है। जड़ता से आगे निकलकर गति प्राप्त करना चाहिए। फिर गतिशील रहें। फुनगी मिलेगी। बस सतर्कता रखनी है कि अकारण सदगति को न प्राप्त हों।
      इस तरह बहस खत्म हुई। सभी चले गए। कॉफी हाउस का प्रबंधक भ्रमित है कि बिल किसके नाम लिखा जाए।
परिचय : प्रशान्त करण की जन्मतिथि-छः जून उन्नीस सौ छप्पन तथा जन्म स्थान- मुज़फ़्फ़रपुर(बिहार)है। आप वर्तमान  में रांची स्थित रामेश्वरम कॉलोनी में भापुसे (अ.प्रा.)श्री राधेकृष्ण गार्डन के समीप निवासरत हैं। झारखण्ड राज्य के श्री करण ने स्नातक(प्रतिष्ठा),स्नातकोत्तर( वनस्पति शास्त्र)आरआई की भी शिक्षा (जमशेदपुर) प्राप्त की है। आपका कार्यक्षेत्र-पुलिस विभाग में सेवा और मौलिक हिंदी साहित्य लेखन है। सामाजिक क्षेत्र में आप बच्चों के लिए समर्पित भाव से कार्य करते हुए झारखण्ड इकाई के अध्यक्ष हैं। आपकी लेखन विधा-हिंदी काव्य और व्यंग्य लेख है। पुस्तक प्रकाशन में काव्य संग्रह-मत बाँध यहाँ अब तू मुझको(नई दिल्ली) आपके नाम है। बतौर सम्मान सराहनीय सेवा के लिए राष्ट्रपति पुलिस पदक एवं विशिष्ट सेवा के लिए राष्ट्रपति पुलिस पदक के साथ ही सराहनीय सेवा के लिए झारखण्ड पुलिस पदक-दो बार हासिल हो चुका है तो,विविध साहित्यिक मंचों से रचना प्रतिभा सम्मान,रजत रचना प्रतिभा सम्मान,शतकवीर सम्मान आदि भी प्राप्त हो चुके हैं।आपकी उपलब्धियाँ-स्नातक(प्रतिष्ठा)में स्वर्ण पदक और स्नातकोत्तर में विश्वविद्यालय के नए कीर्तिमान स्थापित करना है। प्रशांत करण के लेखन का उद्देश्य-समाज की समस्याओं-कुरीतियों को लेखन के माध्यम से समाज के सामने लाना और मिटाना है। 

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