बाजारू रिश्ते

रणदीप याज्ञिक ‘रण’ 
उरई(उत्तरप्रदेश)
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श्यामदास अध्यापक अपने ९ साल के बेटे ‘प्रहलाद’ के साथ मेडिकल स्टोर पर खाँसी का सीरप लेने गए, जिससे प्रहलाद भी बाजार में लेन-देन के तौर-तरीके सीखे। मेडिकल स्टोर पर पहुँचने पर जब श्यामदास जी ने सीरप की कीमत सुनी तो उनके माथे पर
आश्चर्यभाव में रेखानुमा बल पड़ गया,जिसे प्रहलाद भी स्पष्ट देख सकता था। चूँकि,वह सीरप की कीमत पर सन्देह कर रहे थे तो श्यामदास जी ने सीरप के सही रुपए जानने हेतु सीरप की सीसी को उल्टा कर उसके नीचे लिखे ₹ जाँचे,पर सीरप में जो ₹ लिखे थे वह दुकानदार द्वारा लगाई गई कीमत से कम ही थे। इसकी शिकायत श्यामदास जी ने की तो दुकानदार ने श्यामदास जी की तरफ भौंहे चढ़ाते हुए कहा-“अरे मास्टर जी,ये दवाएं बहार से आती है। क्या भाड़े का खर्चा नहीं लगता! दुकान का खर्चा नहीं देना पड़ता! आखिर हम भी तो कमाएंगे!!” मास्टर जी तो उसूलों के पक्के ठहरे,उन्होंने उतने ही ₹ दिए,जो सीरप में लिखे थे। यदि वह भी दुकानदार की फर्जी बातों में आ जाते तो भला उनके अध्यापक होने का भी क्या मतलब। कुछ दिनों बाद श्यामदास जी अपने बेटे प्रहलाद के साथ अपनी बड़ी पुत्री के लिए दूसरे गाँव में विवाह हेतु लड़का देखने गए। वहाँ पहुँचने पर श्यामदास जी के लिए चाय और प्रहलाद के लिए मीठा शरबत लाया गया। जैसे ही विवाह की बात आगे बढ़ी तो लड़के के पापा अपने बेटे पर किए खर्चे गिनाने लगे कि बेटे जीतू को बाहर पढ़ाने में काफी खर्चा आया। वहाँ उसे मकान का किराया,खाना-पीना,छुट्टियों में घर आने-जाने में भी काफी खर्चा हो जाता था…आदि-आदि। इन बातों को सुन रहे श्यामलाल जी के माथे पर प्रहलाद ने पुनः  आश्चर्यभाव में पड़ा रेखानुमा बल देखा। कुछ समय बाद मास्टर जी लेन-देन की बात कर रिश्ते को पक्का कर वहाँ से विदा लेने लगे। जब श्यामदास जी ने प्रहलाद को चलने के लिए कहा तो श्यामदास जी ने प्रहलाद की टकटकी लगाए निगाहों को देखा,जो सिर्फ और सिर्फ राजू(वर) के शरीर के पीछे ही निहार रही थी,मानो वह कुछ लिखा हुआ देखना चाहती हो। शायद उसी सीरप की सीसी की भाँति…श्यामदास जी ने प्रहलाद की निगाहें मोड़ते हुए घर की ओर कदम बढ़ा दिए।
परिचय-रणदीप कुमार याज्ञिक की जन्म तारीख १३ मई १९९५ है। साहित्यिक नाम `रण` से पहचाने जाने वाले श्री याज्ञिक वर्तमान में वाराणसी में हैं,जबकि स्थाई बसेरा उरई(जालौन)है। वर्तमान में एम.ए (द्वितीय वर्ष) के विद्यार्थी और कार्यक्षेत्र भी यही है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत अपने लेखन के माध्यम से विचारों का सम्प्रेषण करते हैं। इनकी लेखन विधा-गीत,कविता, कहानी और लेख है। प्रकाशन के तहत वर्तमान में कार्य(बुन्देखण्ड से संबंधित इतिहास पर)जारी हैl रण की लेखनी का उद्देश्य-समाज में व्याप्त रूढ़ियों को तोड़ना,अंधविश्वास को दूर करना, नागरिक बोध की समझ विकसित कराने के साथ-साथ निष्पक्ष सोच की मानसिकता को पैदा कराने का प्रयास है। आपके लिए प्रेरणा पुंज-माता-पिता,शिक्षकगण तथा मित्रगण हैं।भाषा ज्ञान-हिन्दी,बुन्देलखण्डी एवं अंग्रेजी का रखते हैं। रुचि-लेखन,खेल और पुस्तकें पढ़ने में है।

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