बातें करते हैं यादों से..

करणसिंह यादव
अलवर (राजस्थान)
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मैं और मेरी तन्हाई अक्सर ये बातें करते है यादों से…
उन्हें खबर ही न थी दिल मैं उनके नाम जलते दीए से।

यूं तो गुजरा था उनके घर के सामने से कई बार…
न जाने कब उनका घर के सामने यूँ ही हो गया दीदार।

दिल को खबर न थी कि पहला प्यार हो गया…
अब बस गुजरता था उस रास्ते से कि कहीं उनको मेरे आने की आहट हो जाये।

जो दरवाजा नहीं खुलेगा कभी,
फिर भी उस दरवाजे पर खटखटाहट हो जाये।

उस प्यार में डर भी था,
इज्जत,जिम्मेदारियों,संस्कारों और माँ से मिली तालीम थी…
और कहीं ये भी था कि हम पसंद उन्हें करते हैं,
जिन्हें खबर भी नहीं थी।

वो चिट्ठियों,संदेशों,पैगामों का दौर था…
मैं तब भी उनका रातों में छत पर,
रेडियो सुनकर चाँद में चेहरा ढूंढा करता था।

वो प्यार भी अजीब था…
दिल को पता है जिसे पसंद करता है वो न कभी करीब था।

फिर भी चाह थी उनके मिलने की, उनको न दिखकर दिल भरकर देखने की।

न कभी आँखों से गुस्ताखियाँ हो पाई हमसे…
न कभी इजहारे मोहब्बत हो पाई हमसे।

हो भी जाता तो क्या पहाड़ तोड़ देता…
जो नदी मिलने जा रही थी समंदर से, क्या उसका रुख मोड़ देता।

वो चेहरा न भूला हूँ न भूलूंगा कभी…
वो एक तरफ़ा प्यार था और है अभी,
अपने ही बनाये प्यार के झूले झूलता था…
और झूलता हूँ अभी।

दिल खुश है उनका खुशियों भरा संसार देखकर…
परिवार से उनका प्यार देखकर।

आज तन्हाई से बात हो गई यूँ ही…
उड़ गई यादों से धूल यूँ ही।

वो जहाँ भी रहें,खुश और आबाद रहें हमेशा…
आशीर्वाद दें गुरु जी उनको हमेशा।
मैं और मेरी तन्हाई अक्सर…
ये बातें करते हैं यादों से…॥

परिचय –करणसिंह यादव की जन्म तारीख ७ जून १९८२ और जन्म स्थान -गण्डाला है। वर्तमान में जिला अलवर (राजस्थान)के गण्डाला में स्थाई रुप से बसे हुए हैं। राजस्थान वासी करण सिंह यादव ने कला विषय में स्नातक की शिक्षा हासिल की है। इनका कार्यक्षेत्र-सूचना प्रौद्योगिकी का है। लेखन विधा-लेख और काव्य है। हिन्दी भाषा का ज्ञान रखने वाले श्री यादव की लेखनी का उद्देश्य-लिखना मन को अच्छा लगना है। आपके लिए प्रेरणा पुंज-गुरुजी हैं

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