बुद्धिमती

शशांक मिश्र ‘भारती’
शाहजहांपुर(उत्तरप्रदेश)

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देउलाख्य गांव में स्थित घर

उसमें बुद्धिमती रहती थी,

पति के साथ जीवन सुखमय

बच्चों से न डरो कहती थीl

एक दिन किसी कार्यवश

अपने पिता के घर चल दी,

दोनों पुत्रों को साथ लिया

घने जंगल के रास्ते बस्तीl

कुछ ही रास्ता चली होगी

सामने से आता बाघ दिखा,

तुरन्त बच्चों को जड़ा थप्पड़

बांटकर खाओ जो है मिलाl

बातें सुनकर बुद्धिमती की

वनराज पानी-पानी हो गए,

बाघमारी कहां से आ गई

सोचा नौ-दो ग्यारह हो गएl

भय से भागते देखा सिंह

गीदड़ जोर से लगा हँसने,

आप तो महाराज हैं फिर

क्यों डरते हम भी समझेl

अरे सियार तू भी ले भाग

बाघमारी जंगल में आयी है,

शास्त्रों में तो सुना ही था

बच्चों को खिलाने लायी हैl

मैंने देखा अपनी आँखों से

प्राण बचाने को हूँ भाग रहा,

तुम्हें भी यदि जीवन प्यारा है

मेरे साथ-साथ ही भाग जराl

धूर्त सियार बोला सिंह से

मैं वापस वहीं पर चलता हूँ,

कौन है बाघमारी आयी

खाने को साथ मचलता हूँl

बोला सिंह अरे मक्कार

तुझ पर विश्वास कौन करे,

मूर्ख के साथ ज्ञानी अक्सर

बिना मौत जाकर के मरेl

आपको भरोसा नहीं मुझ पर

यह रस्सी आपको देता हूँ,

आप बांधकर पीछे चलिए

मैं आगे गले डाल चल लेता हूँl

दूर आते देखा गीदड़ जब

बुद्धिमती ने शोर मचाया,

तीन लाने को बोला कल था

एक ही लेकर क्यों आयाl

अचानक ऐसी बातें सुनकर

शेर को बड़ा आश्चर्य हुआ,

यह तो बड़ा चालाक निकला

जंगल में करता हुआ-हुआl

वनराज पीछे मुड़कर के

जल्दी-जल्दी लगे भागने,

सियार की हालत पतली

घिसट के होंगे प्राण त्यागनेl

इसीलिए हे प्यारे बच्चों

बुद्धि को ही बल कहा गया,

धूर्त सियार भी मूर्खता से

अपने प्राणों से चला गयाll

परिचय-शशांक मिश्र का साहित्यिक उपनाम-भारती हैl २६ जून १९७३ में मुरछा(शाहजहांपुर,उप्र)में जन्में हैंl वर्तमान तथा स्थाई पता शाहजहांपुर ही हैl उत्तरप्रदेश निवासी श्री मिश्र का कार्यक्षेत्र-प्रवक्ता(विद्यालय टनकपुर-उत्तराखण्ड)का हैl सामाजिक गतिविधि के लिए हिन्दी भाषा के प्रोत्साहन हेतु आप हर साल छात्र-छात्राओं का सम्मान करते हैं तो अनेक पुस्तकालयों को निःशुल्क पुस्तक वतर्न करने के साथ ही अनेक प्रतियोगिताएं भी कराते हैंl इनकी लेखन विधा-निबन्ध,लेख कविता,ग़ज़ल,बालगीत और क्षणिकायेंआदि है। भाषा ज्ञान-हिन्दी,संस्कृत एवं अंगेजी का रखते हैंl प्रकाशन में अनेक रचनाएं आपके खाते में हैं तो बाल साहित्यांक सहित कविता संकलन,पत्रिका आदि क सम्पादन भी किया है। जून १९९१ से अब तक अनवरत दैनिक-साप्ताहिक-मासिक पत्र-पत्रिकाओं में रचना छप रही हैं। अनुवाद व प्रकाशन में उड़िया व कन्नड़ में उड़िया में २ पुस्तक है। देश-विदेश की करीब ७५ संस्था-संगठनों से आप सम्मानित किए जा चुके हैं। आपके लेखन का उद्देश्य- समाज व देश की दशा पर चिन्तन कर उसको सही दिशा देना है। प्रेरणा पुंज- नन्हें-मुन्ने बच्चे व समाज और देश की क्षुभित प्रक्रियाएं हैं। इनकी रुचि- पर्यावरण व बालकों में सृजन प्रतिभा का विकास करने में है।

 

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