`बुद्धू बक्सा` बुद्धू बनाने के लिए या अभिनेताओं के रुदन के लिए ?

डॉ.अरविन्द जैन
भोपाल(मध्यप्रदेश)
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एक होशियार राजा जो बहुत चतुर,चालाक और बड़बोला था ,जिसने विश्वविजेता बनने की ख्वाहिश में अपना पूरा समय घूमने में गुजारा और घर में भी वह चैन से नहीं बैठता,यानि चैन या शांति तो उसके पास नहीं हैl उसने अपने पास चांडाल चौकड़ी बनाकर रखी,जिसमें कोई सेंध नहीं मार सकता,और राजा होने से अकल देने या लेने वालों की कमी नहींl इसे और अच्छे से समझ ले कि,जैसे नई बहू जब ससुराल में आती है तो वह अपने ससुराल के सगे-सम्बन्धियों के यहाँ जा-जाकर बताती है-मैं अब इस घर की नई बहू बन गई हूँ और उसे मुँह दिखाने का पैसा मिलता है। इस प्रकार बहू ने पुरानी परम्पराओं को तोड़ा और अपनी नई लकीर खींच दीl
हमारे देश के संविधान में चार स्तम्भ बताए गए हैं…जिसमें संचार माध्यम बहुत सशक्त माध्यम अंग्रेजों के समय से रहा,और आज तो उसने आपकी हदें तक लांघ लीl पहले समाचार किसी एक पक्ष का पक्षधर होता था तो वह अपने विपक्षी की बात को भी तवज्जो देता था,तथा भाषा संतुलित और शिक्षाप्रद होती थीl उसमें गाम्भीर्यता और विषय का प्रस्तुतीकरण विशद रहता था,जिससे ज्ञान और अनुभव मिलते थेl यहाँ तक कि विश्लेषण भी अर्थपूर्ण होते थे,जिससे देश की दशा और दिशा को बल मिलता थाl पत्रकारिता एक बुद्धिजीवी वर्ग और प्रबुद्ध वर्ग को जागृत करती थी,और उसमें आए विचार एक नए अर्थ में सोचने को मजबूर करता थाl
कुछ वर्षों में संचार क्रांति ने प्रकाशन मीडिया को नकार दिया है,जिस कारण अपने ज़माने की अनेक पत्र-पत्रिकाएं ख़त्म हो गई या बंद हो गईl आज भी छपाई वाले मीडिया का जो स्थान है,वह इलेट्रॉनिक मीडिया का नहीं हैl ऐसा नहीं कि,इलेट्रॉनिक मीडिया उपयोगी नहीं हैं,पर जो सुकून पत्र- पत्रिकाओं,पुस्तकों के पढ़ने में आता है,उतना इस टीवी ने नष्ट कर दिया हैl नई बहू यानि नई सरकार ने सबसे पहले मीडिया को अपने चंगुल में लिया,और इतना डराया कि,यह उनकी बात के अलावा कोई अन्य की बात नहीं कर सकता हैl आज से लगभग चार वर्ष से बिकी हुई टीवी संस्कृति ने देखने-सुनने का पूरा मजा ख़त्म कर दिया हैl मात्र एक-दो चेहरे और उनके गुणगान के अलावा कुछ नहीं देखने मिल रहा हैl यह तो हुई राजनीति की बात और उसके बाद बचा- खुचा समय इन दिनों फ़िल्मी दुनिया के हत्थे चढ़ गया हैl जैसे श्रीदेवी की मौत पर पूरे देश में ऐसी शोक की लहर में इन टीवी वालों ने डुबोया कि,इस देश में उसके अलावा अब कोई समस्या नहींl पूरे समय क्या हुआ,कैसे हुआ,क्यों हुआ और अब क्या होगा..? पत्रकार मरते हुए आदमी से पूछते हैं कि अब जब आप मरने जा रहे हैं,तब कैसा लग रहा है ? पूरे समाचार सम्भावनाओं पर आधारित हैंl
अब यही बात लीजिए कि,एक पूरा दिन सलमान खान के लिए रहाl अरे बाबा सलमान खान कोई अजूबा व्यक्ति तो नहीं हैl अरे वो एक अपराधी है,उसे अपने किए हुए
कर्मों की सजा मिली,पर उसको सजा मिलना यानि देश में पहली बार कोई जेल जा रहा हो या गया हो,इस प्रकार की घटनाओं से टीवी देखने की रूचि ख़त्म हो जाती हैl टीवी वाले समाचार को पहली कक्षा के छात्रों जैसे रटा देते हैं,और क्या हो रहा है,क्या होगा,क्यों होगा,उनके रिश्तेदार रो रहे हैं,घर में मातम बना हुआ है..आदि-आदिl ऐसा कोई समाचार इस देश में किसी दूसरे के लिए नहीं दिखाया जाता हैl
देश में अनंत मूल समस्याएं इतनी हैं उनकी ओर इन टीवी वालों का ध्यान नहीं जाता,बस अपराध,बलात्कार,
डकैती कांडों को दिखाने समय है,पर रोटी कपड़ा और मकान नौकरी,अकाल जैसी घटनाओं के लिए संभवतः इतना समय नहीं दिया जाता है। इसका मुख्य कारण ये बिके हुए हैं। अधिकांश
टीवी वाले,जिससे पैसा मिला उसके गुणगान गाना शुरू कर देते हैं। सनसनी समाचार का दूसरे दिन गायब हो जाना और किसी-किसी को बढ़ा-चढ़ाकार बताना,इससे अब समाचार पर से विश्वास उठता जा रहा है।
कोई भी अपराधी को इतना स्थान देना बताता है कि
भारतीय जनता को इनके द्वारा जो परोसा जा रहा है,खा या देखें,मात्र विज्ञापनों पर अधिक ध्यान देना..यानी टीवी के जो उदघोषक हजारपति थे,वे
करोड़पति हो गए। ब्लैकमेल करना और समाचार को दबाना,पीत पत्रकारिता का
होना है। पहले यह धारणा थी कि,जिसके पास कार नहीं, वह पत्रकार नहीं। आज जिसके पास विमान नहीं,वह टी.वी मालिक नहीं। ऐसा लगता है जैसे पैसा बहुमंजिला भवनों की छतों से आ रहा हो। अब समय आ गया है कि,जनता का मोह टीवी से कम होता जा रहा है,वहीं घिसे-पिटे समाचार,एक समाचार को कई बार दिखाकर रूचि को खत्म करना और एक ही घटना को दिनभर ऐसे दिखाना-जैसे सलमान खान के बिना फ़िल्मी या सामाजिक जीवन शून्य हो जाएगा। इससे अच्छा प्रिंट मीडिया वह ऐसी ख़बरों को एक कोने में देकर छुट्टी करता है। प्राथमिकता अन्य और भी होती है,जबकि सारे टीवी जनता को
मूर्ख समझते हैं और टीवी पर होने
वाली बहसें श्वान संस्कृति जैसी होती हैं। कोई किसी की बात नहीं सुनना
चाहता और न सुनते हैं। ऐसा लगता है जैसे नूरा कुश्ती लड़ते हों,या मिली-जुली लड़ाई। वे दिन के दो और रात के एक होते हैं और जनता को बुद्धू बनाकर अपना स्वार्थ पूरा करते हैं। अब टीवी वालों को अपना रवैय्या बदलना होगा, अन्यथा फिर से प्रिंट मीडिया हावी होने लगेगा। कुल मिलाकर इसे समझकर सुधारने की जरुरत है।

परिचय- डॉ.अरविन्द जैन का जन्म १४ मार्च १९५१ को हुआ है। वर्तमान में आप होशंगाबाद रोड भोपाल में रहते हैं। मध्यप्रदेश के राजाओं वाले शहर भोपाल निवासी डॉ.जैन की शिक्षा बीएएमएस(स्वर्ण पदक ) एम.ए.एम.एस. है। कार्य क्षेत्र में आप सेवानिवृत्त उप संचालक(आयुर्वेद)हैं। सामाजिक गतिविधियों में शाकाहार परिषद् के वर्ष १९८५ से संस्थापक हैं। साथ ही एनआईएमए और हिंदी भवन,हिंदी साहित्य अकादमी सहित कई संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। आपकी लेखन विधा-उपन्यास, स्तम्भ तथा लेख की है। प्रकाशन में आपके खाते में-आनंद,कही अनकही,चार इमली,चौपाल तथा चतुर्भुज आदि हैं। बतौर पुरस्कार लगभग १२ सम्मान-तुलसी साहित्य अकादमी,श्री अम्बिकाप्रसाद दिव्य,वरिष्ठ साहित्कार,उत्कृष्ट चिकित्सक,पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी() आदि हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-अपनी अभिव्यक्ति द्वारा सामाजिक चेतना लाना और आत्म संतुष्टि है।

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