बुरारी काण्ड:अन्धविश्वास की पराकाष्ठा

डॉ.अरविन्द जैन
भोपाल(मध्यप्रदेश)
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जगत में ऐसा कोई भी जीव नहीं हैं,जो दुःख चाहता हो,सब सुख की आंकाक्षा करते हैं और दुःख से दूर रहते हैंl जीवन में सुख-दुःख अधिकतर हमारी मानसिकता पर निर्भर करता हैl गुलाब का फूल बहुत कोमल होता है,पर उसे लगातार आपके गाल पर रगड़ा जाए तो वह त्वचा को जख्मी बना देता हैl अधिकता को हमेशा निषेध किया गया है,वैसे सबको अपने मन का कभी नहीं मिलताl जो भी हमें मिलता है,यदि हम पूर्व जन्म पर विश्वास करते हैं तो जमा किया होता है,उसी के आधार पर हमें प्राप्ति होती हैl यदि हम पुनर्जन्म में विश्वास नहीं करते हैं तो जैसा हम बोएंगे, वैसा पाएंगेl जैसे बैंक में जो जमा किया है,उसी का आहरण कर सकते हैंl
आज तक सुख-दुःख की परिभाषा और उसकी व्याख्या कोई नहीं कर पायाl
`दाम बिना निर्धन दुखी,तृष्णावश धनवानl
कहूं न सुख संसार में,सब जग देखो छानll`

आज हम भौतिक सम्पदा के पीछे दौड़ रहे हैं और वह अनंत है,असीमित हैl असीमित होना दुःख का कारण है,और सीमित होना सुख का कारण हैl आज क्यों कंपनियां लिमिटेड-सीमित-मर्यादित बनाती है ? हम असीमित खाना क्यों नहीं खाते ? हम गाड़ी की सीमा असीमित क्यों नहीं रखते ? असीमित का इलाज संतुष्टि हैl सबसे बड़ा संतोष धन हैl मनुष्य इन शब्दों को गौर से समझे और गुनें `बस` एवं `और `हम खाना खाते समय बस` का उपयोग क्यों करते हैंl कारण हम अपनी सीमा को पा चुके हैं `और` एक अंतहीन सुरंग हैl
वर्तमान में मानव समाज मानसिक,शारीरिक, आर्थिक रोगों से ग्रस्त है,और रोगों का स्थान शरीर और मन होता हैl यदि मन दुखी है,तो उसका प्रभाव शरीर पर पड़ता है,और शरीर दुखी होने पर उसका प्रभाव मन पर पड़ता हैl दोनों एक-दूसरे के पूरक हैंl फिर भी आदमी आर्थिक,पद-प्रतिष्ठा, बल,कुल-जाति,रूप के कारण भी दुखी होता हैl मनुष्य यह सब जानता है कि,जन्म के समय कुछ लेकर नहीं आए थेl मात्र अपने पूर्वजन्मकृत और अंतिम समय भी कुछ नहीं ले जाते मात्र अपने द्वारा किए गए कर्म,पर हम जीवन की वास्तविकता को न समझकर मात्र मृग मरीचिका में भाग रहे हैंl दौड़ रहे हैं और जिनका संचित पुण्य, पुरुषार्थ और किए जाने वाले कर्मों का फल ही मिलता हैl
एक बात और है कि,मनुष्य इस भरम में रहता है कि हम ही परिवार का भरण-पोषण करने वाले हैंl मेरे न होने से परिवार का लालन-पालन कौन करेगा ? जब किसान खेत में बीजारोपण करता है,तब प्रत्येक बीज अपनी स्वतंत्र सत्ता में रहता है,वह किसी से कोई अपेक्षा नहीं करताl जैसे आपकी बगिया में लगाए गए फूल स्वयं अपनी शक्ति से फलते-फूलते हैं,पर हम इस धोखे में रहते हैं कि मेरे या हमारे न होने से परिवार में बीबी-बच्चों का क्या होगा ? आपके न होने पर भी वे अपना जीवन यापन करते हैंl
मानवीय स्वभाव अपने वर्तमान से कभी खुश नहीं रहता है,और वह अनंत चाह में,छोटे रास्ते से अपनी चाहत की उपलब्धि चाहता है,उसके लिए वह पुरुषार्थ भी करता हैl जब उसे अपनी मेहनत के अनुरूप फल या लक्ष्य नहीं मिलता है,तब वह हताशा के दौर में आ जाता हैl इसी समय वह एक ऐसे गुरु-साथी-मार्गदर्शक की तलाश में निकलता हैl कोई-कोई किसी पर पूर्ण समर्पित होकर अपने पुरुषार्थ के कारण कुछ उपलब्धियां प्राप्त कर उन पर अंधविश्वास करने लगता है,यदि वह किसी गुरु के पास न भी जाता तो समयानुकूल उसे वह उपलब्धि मिलती ही,पर गुरु का निमित्त मानकर उन पर पूर्ण विश्वास करता हैl यही विश्वास, अंधविश्वास में परिवर्तित हो जाता हैl इसका फायदा गुरु उठाते हैंl
आधुनिक समाज में हम आधुनिकता चाहते हैं,पर अभी भी हम अंधविश्वास में उलझे हैंl हर मनुष्य किसी न किसी को अपना इष्ट मानता है,और उसके प्रति पूर्णतः समर्पित न होकर अन्य शीघ्र लाभ देने वाले गुरु,पाखंडी, धूर्त के चक्कर में फंस जाते हैंl यहाँ अपना सर्वस्य निछावर कर देते हैं,जबकि वे गुरु खुद दूसरों से अपनी समृद्धि की याचना करते हैंl
फ़क़ीर राजा के पास अपनी भिक्षा के लिए गया तो पाया कि राजा खुद भगवान-अल्लाह से भीख मांग रहा है। इसका मतलब हम भौतिक सम्पदा के लिए कुछ भी करने को तैयार होते हैं। बुरारी कांड में भी अंधविश्वास की बू आ रही है,जिसकी परिणति ११ परिवारजनों की मौत है। जानकारी के अनुसार पूरा परिवार धार्मिक अनुष्ठान में भरोसा करता था और और अचानक पूरा परिवार मोक्ष की प्राप्ति के लिए स्वयं आत्महन्ता बन गया।
हमें जब तक सम्यक दर्शन,ज्ञान,चारित्र का ज्ञान नहीं होगा और हम मिथ्यात्व में रहकर अपने इष्ट के अतिरिक्त अन्य देवी देवता पर भरोसा कर या गुरुओं के चक्कर में शीघ्रता से मनोवांछित फल की प्राप्ति के लिए कुछ भी करके सुख पाना चाहते रहेंगे,तो यह भरम होता रहेगा।
‘जे कुगुरु कुदेव कुधर्म सेव,पोषें चिर दर्शन मोह एव।
अन्तर रागादिक धरैं जेह ,बाहर धन एम्बर तैं सनेह॥
धारें कुलिंग लहि महत-भाव ,ते कुगुरु जन्म जल-उपल आव।
जे राग द्वेष -मल करि मलिन ,वनिता -गदादिजुत चिन्ह चीन॥
इसका आशय यह है कि जो व्यक्ति धूर्त-धोखेबाज़-जालसाज़ गुरुओं के चक्कर में फंसकर,वह गुरु जिस प्रकार पत्थर की नाव में बैठकर स्वयं नदी पार करना चाहता है,और वह स्वयं डूबता है,और अपने साथ सवारी को भी डुबो देता है। वर्तमान में यह चलन बहुत बढ़ गया है,और ऐसे गुरु स्वयं पद भ्रष्ट होकर अपने अनुनायियों को कष्ट में डालते हैं,जिसका दुष्परिणाम बुरारी काण्ड की परिणति है। इतनी अधिक जागरूकता के बाद भी हम इस प्रकार के धोखे में फंस जाते हैं,यानि ऎसा व्यक्ति हमारी कमजोरी का फायदा उठाकर गर्त में डाल देता है। यह स्थिति सोंचनीय है।
‘सद्भावप्रतिपन्नानां वंचने का विदग्धता ?’ सरल परिणामी मनुष्य को ठगने में कोई चतुराई नहीं है।
‘मोहो हि चेतनां हरेत।’ मोह चेतना को ही हर लेता है।
यह यदि आत्मघात है,तो निंदनीय है।

परिचय- डॉ.अरविन्द जैन का जन्म १४ मार्च १९५१ को हुआ है। वर्तमान में आप होशंगाबाद रोड भोपाल में रहते हैं। मध्यप्रदेश के राजाओं वाले शहर भोपाल निवासी डॉ.जैन की शिक्षा बीएएमएस(स्वर्ण पदक ) एम.ए.एम.एस. है। कार्य क्षेत्र में आप सेवानिवृत्त उप संचालक(आयुर्वेद)हैं। सामाजिक गतिविधियों में शाकाहार परिषद् के वर्ष १९८५ से संस्थापक हैं। साथ ही एनआईएमए और हिंदी भवन,हिंदी साहित्य अकादमी सहित कई संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। आपकी लेखन विधा-उपन्यास, स्तम्भ तथा लेख की है। प्रकाशन में आपके खाते में-आनंद,कही अनकही,चार इमली,चौपाल तथा चतुर्भुज आदि हैं। बतौर पुरस्कार लगभग १२ सम्मान-तुलसी साहित्य अकादमी,श्री अम्बिकाप्रसाद दिव्य,वरिष्ठ साहित्कार,उत्कृष्ट चिकित्सक,पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी आदि हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-अपनी अभिव्यक्ति द्वारा सामाजिक चेतना लाना और आत्म संतुष्टि है।

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