बेचारा ! ………..वाला

दुर्गेश कुमार मेघवाल ‘डी.कुमार’
बूंदी (राजस्थान)
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हाँ ! जी साहब,उसकी बड़ी बड़ी मूंछें थी, और वो जब उसका मन करता,उनको सहलाता भी सही और कभी कभी गर्व से बहलाता भी सही। आज के फैशन के दौर की होड़ में वह मुंछमुंडा तो नहीं रहना चाहता था।
       आज बात भी ऐसी हो गई कि मूँछ की तान कुछ ज्यादा ही बढ़ गई तो दे दी चुनौती छोटी मूंछों वाले को और चल दिए जनाब मूँछ को ऊँची कर मूँछ की शान रखने,पर यह थोड़ी पता था कि मूँछ का ताव रखने के चक्कर में आजादी से भी हाथ धोना पड़ सकता है और फंस गए श्रीमान पिंजरे में। छोटी मूंछ वाले अब उन्हें बाहर से देख हँसी भी उड़ा रहे थे और मूंछे भी चिढ़ा रहे थे।
         पर होनी तो हो चुकी थी। पिंजरा बन्द हो चुका था।  कुण्डी स्प्रिंग के दबाव से तन के अड़ी हुई थी और मूंछें अब भी ऊँची तो थी,परन्तु पिंजरे में दौड़-दौड़कर थकी-सी नजर आ रही थी। उन पर न तो पिंजरे को दया आ रही थी और न ही कुण्डी को। दांत भी अपना कार्य निरन्तर कर रहे थे और मन ही मन अपने को ही काट पा रहे थे कि, आज तो मूंछों ने तुड़वाने का पूरा प्रबन्ध कर लिया लगता है। मूंछों को ताव दिलवा और झाड़ पर चढ़ाने वालों का तो अब कोई अता-पता ही नहीं था।
          शुक्र था कि शरीर भी मूंछों के हिसाब से ही अच्छा खासा था तो अपनी कार्य क्षमता के अनुसार पिंजरे को पार पाने का तो प्रयास निरन्तर होता रहा। पिंजरा भी था आखिर पिंजरा,एकदम सीमा प्रहरी की तरह पूर्णतः कर्तव्यनिष्ठ।
लालच और रुतबा न जाने कहाँ हवा हो चुका था लेकिन फिर भी एक आशा मन में थी कि शायद आजादी वापस मिल जाए और पिंजरा कुछ रहम कर दे,पर पिंजरा कर्त्तव्यनिष्ठा पर पूर्णतः खरा उतरने का प्रणधारी था। उसने न तो मूंछों का मान रखा और न ही बल की शान।
         वफादारी जो उसमें कूट कूट के भरी हुई थी, इसीलिए तो उसके फौलाद से इरादों को न तो मूंछें डिगा पाई और न ही पुष्ट शरीर का बल हिला पाया।
         वफादारी के पुतले पिंजरे ने भी अपनी कर्तव्यनिष्ठा पूरी होते ही जोर से मालिक को आवाज लगा दी।
              मालिक तो थे ही इसी इंतजार में कि कार्य कब अपने अंजाम तक पहुँचे। तुरन्त दौड़कर पिंजरे के पास आए और पिंजरे की कर्त्तव्यनिष्ठता पर शाबाशी देते हुए संतुष्टि के भाव से मूंछों वाले पर कुटिल हंसी हँसते हुए बोले,-“हूँउउउ,आज आया है ऊंट पहाड़ के नीचे।”
           मूंछें और मूंछों वाला बेचारा दोनों अपनी स्थिति अनुसार कुछ प्रतिक्रिया देनें की स्थिति में नहीं थे।
           मालिक ने पिंजरे को गर्व से उठाया और चल दिए वीरान स्थल की और..। मन ही मन सन्तुष्टि थी कि आज समस्या का समाधान हो ही गया। एक सुनसान जगह देख कर उन्होंने स्प्रिंग वाली कुण्डी को ऊँचा किया तो उसमें से लम्बी-लम्बी मूंछों वाला मोटा तगड़ा चूहा जिसकी मूंछ अब भी तनी तो थी पर अब केवल सन्तुष्टि से ही कि-,” चलो आजादी वापस मिल तो गई” और वह तुरन्त कूद कर मन ही मन धन्यवाद कहता हुआ कचरे में समाहित हो गया।
परिचय-आप लेखन क्षेत्र में डी.कुमार के नाम से पहचाने जाते हैं। दुर्गेश कुमार मेघवाल की जन्मतिथि-१७ मई १९७७ तथा जन्म स्थान-बूंदी (राजस्थान) है। आप राजस्थान के बूंदी शहर में इंद्रा कॉलोनी में बसे हुए हैं। हिन्दी में स्नातकोत्तर तक शिक्षा लेने के बाद शिक्षा को कार्यक्षेत्र बना रखा है। सामाजिक क्षेत्र में आप शिक्षक के रुप में जागरूकता फैलाते हैं। लेखन विधा-काव्य और आलेख है,और इसके ज़रिए ही सामाजिक मीडिया पर सक्रिय हैं।आपके लेखन का उद्देश्य-नागरी लिपि की सेवा,मन की सन्तुष्टि,यश प्राप्ति और हो सके तो अर्थ प्राप्ति भी है। २०१८ में श्री मेघवाल की रचना का प्रकाशन साझा काव्य संग्रह में हुआ है। आपकी लेखनी को बाबू बालमुकुंद गुप्त साहित्य सेवा सम्मान-२०१७ सहित अन्य से सम्मानित किया गया है|

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