बौने लगें सुमंत्र

डाॅ.अचलेश्वर कुमार शुक्ल ‘प्रसून’ 
शाहजहाँपुर(उत्तरप्रदेश)
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कैसी है स्वाधीनता,कैसा है जनतंत्र।
राग-द्वेष के सामने,बौने लगें सुमंत्र॥
लोकतंत्र रक्षक करें,नित दूषित परिवेश।
मार दहाड़ें रो रहा,अपना भारत देश॥
जन नेता जपते सदा,द्वेष भाव का मंत्र।
जन के साथ स्व तंत्र का,हत्यारा जनतंत्र॥
बुनते हैं अलगाव का,जाल सभी हो मग्न।
सत्य अहिंसा बन्धुता,हैं अब केवल स्वप्न॥
आपाधापी है सतत्,अरु बस भागमभाग।
सत्यमेव जयते ‘अचल’,केवल थोथा राग॥
जनगणमन के स्वप्न सब,यहाँ हो गए खेत।
नीति नियंता तंत्र का,गला रहे हैं रेत॥
धनबल भुजबल से सतत्,करें अहर्निश चोट।
लोकतंत्र में लोक का,गला रहें हैं घोट॥
भारत माँ को दे रहे,ये असाध्यतम रोग।
सहन नहीं होते हमें,अब ये गन्दे लोग॥
अविवेकी हो कर रहे,मतदाता मतदान।
ना जाने इस देश का,क्या होगा भगवान॥
जगह-जगह पर चल रहा,चर्चाओं का दौर।
देखेंगे हम आप सब,बँधता किसके मौर॥
राजनीति ने रच दिया,कैसा यहाँ कुयोग।
राम-राम कहना सखे,भूल गए हैं लोग॥
राजनीति में लिप्त हो,भोग रहे हैं भोग।
राम-राम करते नहीं,अब भारत के लोग॥
परिचय-डाॅ.अचलेश्वर कुमार शुक्ल का साहित्यिक उपनाम-प्रसून है। जन्मतिथि ५ जुलाई १९७५ तथा जन्म स्थान-ककरौआ जप्ती,शाहजहाँपुर (उ.प्र.)है। वर्तमान में यहीं निवासरत हैं। उत्तर प्रदेश वासी डॉ.शुक्ल की शिक्षा एम.ए.(संस्कृत,हिन्दी)सहित पी.एच-डी.(हिन्दी)है। आपका कार्यक्षेत्र प्राध्यापक (महाविद्यालय) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप समय-समय पर विविध कार्यक्रमों के माध्यम से सामाजिक उन्नयन में सक्रिय रहते हैं। इनकी लेखन विधा-गद्य एवं पद्य में समान अभिनिवेश है। विविध पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन होने के साथ ही कई संस्थाओं से सम्मान प्राप्त हुआ है। आपकी लेखनी का उद्देश्य-सद्साहित्य का सृजन करना है।

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