बड़े साहब

प्रखर दीक्षित 
फर्रूखाबाद (उत्तर प्रदेश)
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इधर इलाहाबाद जाने के लिए गोविंद बाबू के घर  सामान बंध रहा था,साढ़े ग्यारह बजे वाली पैसेंजर गाड़ी का समय घड़ी की सुई टिक-टिक करते हुए बताकर आगाह कर रही थी। गोविंद बाबू बड़बड़ाने में गाफिल थे। इस परेशानी और आपा-धापी का पूरा ठीकरा वह राजो भौजी पर फोड़ रहे थे।
इसी बीच लोई का पता पूछना राजो भौजी को गोविंद बाबू के लिए ग़ज़ब हो गया-“भुल्लन की माई कहे देते हैं…..हमरा माथा ई बेरा तमतमाय रहा है। ई सब दो दिन पहिले कर लेती तो हमें काहे आज हपड़-धपड़ करना पड़ता।”
भौजी बिफरी-“देखो जी….अपना सामान खुद ही संभारौ..तुम्हार का ठिकाना,…..हमें  स्टेशन पर ही छोड़ के चले जाव।”
“राम करै जाह जात्रा सकुशल निपट जाय।”
गोविंद बाबू ने तुरुप मारा-“तुम्हार संग कुशलता।……..कोढी मरै संगाती चहाय।”

    इस वाक् बाण ने अपना पूरा काम किया। दोनों चुप। पैकिंग पूरी,सवारी पकड़ी और स्टेशन पर हाज़िर। जीवन पर्यंत यही नोक-झोंक तो टानिक का काम कर रही है। अब न गिला और न  शिकवा। राजो भौजी को बस एक ही चिंता-संगम स्नान और मंदिर दर्शन की तो वहीं गोविंद बाबू अपने अनुज सुनिकेत से मिलने के लिए व्यग्र थे। होते भी क्यों न,पिताजी के निधन के बाद अनुज सुनिकेत को पुत्रवत स्नेह दिया था। माध्यमिक शाला की मास्टरी की तनख़्वाह में पहले खर्चों की लम्बी फेहरिस्त थी,फिर भी येन-केन प्रकारेण अपना पेट काटकर और अपनी इच्छाओं का दमन करके अच्छी तालीम दिलायी। पढ़ाई के लिए कोई अड़चन बाधा न बन सकी। सुनिकेत आज इलाहाबाद में राजस्व विभाग का बड़ा अधिकारी बन गया था।
राजो भौजी ने देवरानी सुलोचना और बच्चों के लिए गन्ना,सत्तू,भूजा,मकई का भुट्टा और हाँ खेत की शकरकंदी अपने साथ बांध ली थी।
स्टेशन पर गाड़ी आयी। दोनों लोग अपनी-अपनी सीट पर जम गये। गाड़ी अपने गन्तव्य की ओर सरपट दौड़ पड़ी। रात के अंधेरे ने नींद को अपने आगोश में ले लिया।
पौ फटी। सूर्यदेव पूरब में चमकने लगे। डिब्बे की चहलकदमी और शोर-शराबे से पता लगा कि इलाहाबाद आ रहा है। गोविंद बाबू ने समान सरियाया भौजी को ताकीद दी-“संभल कर उतरिए।” कुली किया। स्टेशन से बाहर आए तो एक कार के पास खड़े युवक के हाथ में गोविंद सिंह बहराइच की तख्ती को  लिखा देखा। उस युवक को अपने पास बुलाया। बोले-“हम हीं हैं भइया गोविंद सिंह। सुनिकेत बबुआ ने भेजा है!”
“सुनिकेत साहब ने भेजा है,बैठिए।” ड्राइवर बोला।
“ऐ लल्ला तुम्हार नाम का है औउर कौन जिला हौऊ…..?? का अपने साहब के डिराईभर हो।” भौजी का वात्सल्य हिलोर मारने लगा।
‘जी……’  ड्राइवर ने हामी में सिर हिलाया।
झिक-झिकाके भौजी बोली-“टका भरे की ज़बान नाहीं हिलत औउर पसेरी भरे का मूढ़ हिला दीये हो।”
ड्राइवर मंद-मंद मुस्कराया बोला-“अम्माँ….हमारा नाम बनवारी लाल है और नखलऊ जिला है।”
“लला बहुतै नीक लगा। ईसुर तुमैहि औउर परिवार का सुखी राखै।” भौजी ने ढेरों दुआओं का आशीर्वाद दे दिया।
कार शहर के सड़कों-चौराहों से गुजरते हुए भव्य इमारतों के दर्शन कराती अपनी गति से सरपट दौड़ रही थी। जाम,गंदगी,शोर,आधुनिकता और फैशनपरस्ती को देखकर गोविंद बाबू को लगा अपना गाँव आज भी बहुत अच्छा है। गाँव की ताजगी,स्नेह ,जाम से निजात और सादगी शहर पर भारी लगे।
खैर अंततोगत्वा भारी-भरकम बंगलानुमा इमारत के सामने कार रुकी। गेट पर खड़े दरबान ने बाबू जी और भौजी को प्रणाम किया। सभी लोग अंदर दाख़िल हुए। अर्दली ने कार से सामान निकालकर अंदर पहुँचाया।
गाँव से भौजी का लाया उपहार देख सुनिकेत और उसकी पत्नी सुलोचना के तेवर चढ़ गये। “भइया यह सब क्यों उठा लाए हो। इससे तो मेरा स्टेटस् मिट्टी में ही मिल जायेगा। क्या हम अब गन्ना,गुड,सत्तू खायेंगे। ………(सुलोचना ने बीच में बात काटी)। हमारे बच्चे इसे हाथ भी नहीं लगायेंगे।”
खान-पान के दौरान सुनिकेत ने पूरा सामान अर्दली को दे दिया। यह दृश्य बाबू जी और भौजी से देखा न गया। गोविंद बाबू का चेहरा क्रोधाग्नि से तमतमा रहा था। राजो भौजी भी सन्न थी।
दोनों लोगों ने मिलकर तुरंत धर्मशाला में रुकने का फ़ैसला किया। जब यह खबर सुनिकेत और सुलोचना ने सुनी तो उनके पाँव तले ज़मीन खिसकते जान पड़ी। दोनों पैर पकड़कर क्षमा मांगने लगे,लेकिन बहुत देर हो चुकी थी। पानी सिर से ऊपर जा चुका था। गोविंद बाबू ने सामान समेटा,लम्हों में गेट पर राजो भौजी चुपचाप पीछे खड़ी थी। रिक्शा को हांक लगायी। मारवाड़ी  धर्मशाला ……..दो सवारी।
“कौन मोहाल बाबू साहेब!”
“अरे भइया,पल्टन  बाजार के लगै है वो बही नगर पालिका वाली पानी की टंकी कै तीर।”
“हाँ-हाँ बैठौ,समुझ गयन बाबू साहेब।”
गोविंद बाबू और भौजी के आँखों आँसू छलक  आए। सुनिकेत बहुत प्रयास किया,किंतु सभी विफल।गोविंद बाबू बोले-“बेटा……जो शख्स अपनी जड़ों से कट जाता है तो वह पंख विहीन पक्षी की तरह होता है। संस्कार हमारी थाती हैं और जीवनचर्या व  खान-पान संस्कृति। यह हमें सबल बनाते हैं। हम चाहे  कितने ही ऊपर उठ जाएं,लेकिन याद रहे अपनी औकात,थाह पता रहे। तुम बड़े साहब बेशक बन गये  लेकिन तुम्हारे पाँव ज़मीन पर नहीं रहें। तुम कुशल से रहो। ख़ुश रहो। मैं धर्मशाला में रुकूंगा। मेरे पास अनुज बनकर आना,तुम्हें सब कुछ वैसा ही मिलेगा।  ………………..और हाँ गाँव की देहरी तुम्हारा इंतज़ार कर रही है। आशीर्वाद,ख़ुश रहो” कहते-कहते अश्रुधार अविरल बह चली। उधर रिक्शा अपनी मंज़िल की ओर चल पड़ा।

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