‘ब’ से बकरी या बालिका

सुनील जैन `राही`
पालम गांव(नई दिल्ली)

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बकरी का सबसे बड़ा योगदान बकरे पैदा करना है। बकरी की सुरक्षा को खतरा पैदा हो गया है। अब किसकी सुरक्षा ज्‍यादा जरूरी है,बकरी या बालिका की। बालिका,गृह में सुरक्षित नहीं और बकरी कहीं भी।
बकरी ने देश को इतने बकरे दिए। बकरे किसी ने किस्‍तों में काट लिए तो किसी ने झटके से,तो किसी ने हलाल कर दिए। बकरे का काम है मिमियाना। बकरे वफादार नहीं होते,बकरों से धार्मिक उन्‍माद नहीं बढ़ता। बकरा धर्म निरपेक्षता का सबसे बड़ा उदाहरण है। हिन्‍दू और मुसलमान दोनों समान रूप से बकरे काटते हैं। बकरा एक धर्मभाव प्राणी है। इसके मंदिर या मस्जिद में घुसने से किसी का धर्म भ्रष्‍ट नहीं होता। इसकी टांग नहीं उठती। यह प्रजातंत्र का मूल है। इससे किसी भी सम्‍प्रदाय के वोट बैंक पर प्रभाव नहीं पड़ता। बकरे से किसी सभ्‍यता का ज्ञान नहीं होता। इसके पैदा होने-काटे जाने पर विवाद-हिंसा नहीं होती। बकरा काटा भी जाता है,बनाया भी जाता है,परोसा भी जाता है,तो प्रसाद के रूप में बांटा भी जाता है।
व्‍यंग्‍यकार भी बकरा दाढ़ी रखने में गर्व महसूस करते हैं। कभी-कभी बकरे की तरह काट भी दिए जाते हैं। बकरे की तरह हलाल भी कर दिए जाते हैं। बकरे से कभी देश एकता और अखण्‍डता को खतरा नहीं हुआ। बकरे का कोई रंग विशेष नहीं होता। यह सभी रंगों में पाया जाता है। बकरे से संस्‍कृति को कोई खतरा नहीं है। खतरा कैसे हो सकता है, जिसके पैदा होते ही मरने का दिन तय हो जाता है। घर में शादी-ब्‍याह या फिर जश्‍न कोई सा भी,कटेगा बकरा ही।
खैर बकरा गर्दन झुकाकर घास खाने में लगा था। पेट भर चुका था,लेकिन उसके आंसू थम नहीं रहे थे। मेरी बकरे से दोस्‍ती नहीं थी,लेकिन उसकी बात समझ में आती है। संगीत और भावों की भाषा के लिए किसी लिपि या बोली की आवश्‍यकता नहीं होती। बकरे से संक्षिप्‍त वार्ता का मन हुआ, उसके आंसू देखकर उसने भावों की भाषा में बोलना शुरू किया,मैंने संगीत की भाषा में समझना।
हमारा बलिदान किसी देश भक्‍त से कम नहीं हो। हो सकता है इस शब्‍द पर आपत्ति हो,लेकिन सेना के लिए भी हमने कोई कम योगदान नहीं किया। हमारे बलिदान को आज तक किसी ने नहीं सराहा। हम सत्‍ता में नहीं, उसके गलियारे में नहीं,उसकी कुर्सी के आसपास नहीं,हमारा केवल एक ही योगदान है बकरे बने रहें,कटते रहो,आम का नहीं खास का निवाला बनते रहें।
इस पर भी मुझे कोई दु:ख नहीं था,लेकिन अब इच्‍छा करती है आत्‍महत्‍या कर लूं। मेरी बकरी ने इन कमीनों का क्‍या बिगाड़ा था ? इतनी बालिकाओं के शोषण से इनका पेट नहीं भरा,इतनी हत्‍याओं से मन नहीं अघाया। हमारे साथ कभी ऐसा व्‍यवहार नहीं हुआ। अब तो बालिका गृह में और बकरी कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। हमारा तो लिंगानुपात भी सही है फिर बकरी के साथ दरिंदगी क्‍यों?
बकरी देश का सबसे निरीह प्राणी है। यह परोक्ष रूप से हर स्‍थान पर पाया जाता है। कुछ लोग इसे बालिका भी कहने लगे हैं। कुछ जनता के नाम से,कुछ उपभोक्‍ता के नाम से और तो और कुछ इसे करदाता के नाम से भी पहचानते हैं। सहानुभूति उसी से होती है, जिससे वोट बैंक,सत्‍ता,शासन-प्रशासन प्रभावित होता है।
हममें ये गुण व्‍याप्‍त नहीं हैं। हम बकरे हैं हमारा काम कटना है। क्‍या संसद में बकरी के शील भंग और हत्‍या के लिए फांसी की सजा का कानून बनेगा…?

परिचय-आपका जन्म स्थान पाढ़म(जिला-मैनपुरी,फिरोजाबाद)तथा जन्म तारीख २९ सितम्बर है।सुनील जैन का उपनाम `राही` है,और हिन्दी सहित मराठी,गुजराती(कार्यसाधक ज्ञान)भाषा भी जानते हैं।बी.कॉम.की शिक्षा खरगोन(मध्यप्रदेश)से तथा एम.ए.(हिन्दी,मुंबई विश्वविद्यालय) से करने के साथ ही बीटीसी भी किया है। पालम गांव(नई दिल्ली) निवासी श्री जैन के प्रकाशन खाते में-व्यंग्य संग्रह-झम्मन सरकार,व्यंग्य चालीसा सहित सम्पादन भी है।आपकी कुछ रचनाएं अभी प्रकाशन में हैं तो कई दैनिक समाचार पत्रों में लेखनी का प्रकाशन होने के साथ आकाशवाणी(मुंबई-दिल्ली)से कविताओं का सीधा और दूरदर्शन से भी कविताओं का प्रसारण हो चुका है। राही ने बाबा साहेब आम्बेडकर के मराठी भाषणों का हिन्दी अनुवाद भी किया है। मराठी के दो धारावाहिकों सहित करीब १२ आलेखों का अनुवाद भी कर चुके हैं। इतना ही नहीं,रेडियो सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में ४५ से अधिक पुस्तकों की समीक्षाएं प्रसारित-प्रकाशित हो चुकी हैं। आप मुंबई विश्वविद्यालय में नामी रचनाओं पर पर्चा पठन भी कर चुके हैं। कुछ अखबारों में नियमित व्यंग्य लेखन करते हैं। एक व्यंग्य संग्रह अभी प्रकाशनाधीन हैl नई दिल्ली प्रदेश के निवासी श्री जैन सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रीय है| व्यंग्य प्रमुख है,जबकि बाल कहानियां और कविताएं भी लिखते हैंl आप ब्लॉग पर भी लिखते हैंl आपकी लेखनी का उद्देश्य-पीड़ा देखना,महसूस करना और व्यक्त कर देना है।

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