भारत भाषा प्रहरी डॉ. जोगा सिंह

डॉ.एम.एल.गुप्ता ‘आदित्य’ 
मुम्बई (महाराष्ट्र)

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पिछले कुछ समय से जो एक प्रवृत्ति देखने में आ रही है,वह यह कि भारतीय भाषाओँ के अनेक शिक्षक,पत्रकार,लेखक, फिल्मकार आदि अपनी भाषा और भाषाओँ के प्रति निष्ठा के बजाए अपने को अंग्रेजीमय दिखाने और अपनी भाषा के अंग्रेजीकरण पर उतारू दिखते हैं। इसीलिए,हिंदी सहित भारतीय भाषाओँ के अनेक अखबार व चैनल अपनी भाषा में भी अँग्रेजी परोसते दिखते हैं। ऐसे माहौल में अगर कोई शख़्स अपनी भाषा के लिए सड़क पर खडे होकर इश्तिहार बांटता दिखाई दे तो लोगों को शायद कुछ अज़ीब-सा लगेगा। वह भी एक ऐसा व्यक्ति,जो विश्विद्यालयों व अकादमियों के उच्च पदों पर आसीन रह चुका है। भाषा की राजनीति करनेवालों की तरह वह भाषाई विद्वेष नहीं फैलाता। हर स्तर पर अपनी मातृभाषा ही नहीं,देश के हर व्यक्ति की मातृभाषा और राष्ट्र की भाषा के लिए साथ खड़ा दिखाई देता है। वह जो भारत- भाषा प्रहरी बनकर मातृभाषा और भारत-भाषा की अलख जगाता देश-दुनिया में भटकता है,उसका नाम है-डॉ. जोगा सिंह।
डॉ.सिंह उन व्यक्तियों में से हैं जिन्होंने जीवन के हर क्षेत्र में भारतीय भाषाओं का वर्चस्व स्थापित करने के लिए शिक्षा, भाषा विज्ञान,अंतर्राष्ट्रीय भाषा व्यवहार और आर्थिक विकास आदि क्षेत्रों से विश्व भर की खोजों और व्यवहार का अध्ययन किया है और भारतीय जीवन के हर क्षेत्र में मातृभाषाओं का वर्चस्व स्थापित करने के लिए अकाट्य तर्क और तथ्य प्रस्तुत किए हैं। उनकी पुस्तिका `भाषा नीति के बारे में अंतरराष्ट्रीय खोज` तथा ‘मातृभाषा खोलती है शिक्षा,ज्ञान और अंग्रेजी सीखने के दरवाज़े` हिंदी,पंजाबी,तमिल,तेलुगू,कन्नड़,मराठी, मैथिली,डोगरी,नेपाली,उर्दू और अंग्रेजी भाषाओं में उपलब्ध है। इस पुस्तिका ने भारतीय भाषाओं के लिए संघर्ष को जो वैचारिक बल प्रदान किया है,वह शायद ही किसी और पुस्तक या पुस्तिका ने किया होगा। डॉ.सिंह का मत है कि भारतीय कुलीन वर्ग का अंग्रेजी भाषा के ज़रिए सत्ता के स्थानों पर स्वार्थमय एकाधिकार,भाषा के मामलों के बारे में भारतीय राजनीतिक और अफसरशाही क्षेत्रों में भयावह अज्ञानता,भारतीय लोगों में अपनी भाषाओं के प्रति स्वाभिमान की कमी,और विदेशी गुलामी के कारण अंग्रेजी भाषा के साथ जु़ड़ी हुई बहुत-सी मिथ्या धारणाएं आदि कुछ कारण हैं जिनसे भारतीय भाषाओं की आपराधिक किस्म की अनदेखी हुई हैl इस अनदेखी ने भारतीय शिक्षा,ज्ञान-विज्ञान,संस्कृति, प्रशासन,कारोबार,और सामान्य संचार आदि क्षेत्रों में भारत को जितना नुकसान पहुंचाया है,उनका आकलन करना भी संभव नहीं है। उनके अनुसार तीन मिथ्या धारणाएँ इस अनदेखी का विशेष रूप से आधार बनी हुई हैं-पहली यह कि अंग्रेजी ही उच्च स्तरीय ज्ञान,विज्ञान और तकनीक की भाषा है और इन क्षेत्रों में अंग्रेजी के बिना विकास संभव नहीं है;दूसरी यह कि अंग्रेजी ही अंतर्राष्ट्रीय भाषा है और इसके बिना अंतर्राष्ट्रीय कारोबार और आदान-प्रदान संभव नहीं है;और तीसरी यह कि भारतीय भाषाओं में यह सामर्थ्य नहीं है कि वे उच्च स्तरीय ज्ञान,विज्ञान और तकनीक आदि की वाहक बन सकें। डॉ.सिंह ने उपरोक्त प्रकार की मिथ्या धारणाओं को निम्न प्रकार के तथ्यों और तर्क से ध्वस्त किया है। उनके तर्क हैं-

पिछले दस सालों में शाला स्तर पर चोटी के देश विज्ञान की शिक्षा अंग्रेजी में नहीं,बल्कि अपनी मातृभाषाओं में दे रहे हैं। भारत समेत दक्षिण एशिया का एक भी विश्वविद्यालय एशिया के पहले पचास विश्वविद्यालयों में नहीं आता,बावजूद इसके दक्षिण एशिया में उच्च शिक्षा मुख्यत: अंग्रेजी भाषा में दी जाती है,जबकि दक्षिण एशिया को छोड़कर पूरे एशिया में शिक्षा मातृभाषाओं में होती है। वाणिज्य के क्षेत्र में भी अंग्रेजी से कोई लाभ प्राप्त नहीं हो रहा लगता। १९५० में भारत का अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में हिस्सा १.७८ प्रतिशत था जो अब घटकर १.५० रह गया है,बावजूद इसके कि १९५० के मुकाबले अब कहीं ज्यादा भारतीय अंग्रेजी भाषा जानते हैं। सभी अंतर्राष्ट्रीय खोजें और सभी मान्यताएँ भी यही दर्शाती हैं कि शिक्षा केवल और केवल मातृभाषा में ही सफलतापूर्वक दी जा सकती है। आज के युग में, किसी भाषा के जीवन और विकास के लिए भी आवश्यक है कि उसका प्रयोग शिक्षा के माध्यम के रूप में अवश्य हो। भाषा के साथ परम्परा,इतिहास और संस्कृति जैसे महत्वपूर्ण सवाल भी अन्तरंग रूप से जुड़े हुए हैंl यह एक भ्रम है कि अंग्रेजी पूरी तरह अंतर्राष्ट्रीय भाषा है। पिछले सालों में दुनिया भर में अंग्रेजी भाषा के प्रचलन में कमी आई है;दक्षिण एशिया को छोड़कर पूर्व उपनिवेशों में भी जहां पहले शालेय शिक्षा अंग्रेजी माध्यम में होती थी अब या तो मातृभाषाओं में हो चुकी है या इस ओर बढ़ रही है। उपरोक्त धारणाओं के लिए डॉ.सिंह ने अपने दस्तावेजों में अनेक तथ्यों और तर्कों को इस प्रकार सटीक रूप से प्रस्तुत किया कि अभी तक किसी ने इन्हें लिखित रूप में झुठलाने की जुर्रत नहीं कीl

एक मजदूर-किसान के रूप में अपनी जिंदगी का सफर शुरू करने वाले डॉ.जोगा सिंह का जन्म हरियाणा राज्य के एक छोटे से गाँव अच्छनपुर (जिला करनाल) में नवम्बर-दिसम्बर १९५३ में एक निम्नवर्गीय किसान परिवार में हुआ। प्राथमिक शिक्षा उन्होंने अपने गाँव की शाला से प्राप्त कीl बाद में इनका झुकाव सामाजिक मुद्दों की ओर हो गया और उन्होंने बी.ए. प्रथम वर्ष में मानविकी विषयों को चुन लिया। औपचारिक शिक्षा उनके जिज्ञासु मन को शांत न कर पाई तो १९७२ में घर छोड़कर ज्ञान की तलाश में निकल पड़े। स्वामी विवेकानंद से प्रभावित होने के कारण इनकी इस यात्रा का पहला पड़ाव रामकृष्ण आश्रम( नागपुर)बना। वहां से विनोबा भावे जी के आश्रम पवनार (वर्धा) जा पहुंचे। विनोबा भावे जी उन दिनों मौन व्रत पर थे। उनके साथ कुछ लिखित वार्तालाप हुआl वहां से ये सिक्खों के धर्मस्थल हज़ूर साहिब(नांदेड़) जा पहुंचे। वहां भी सन्तुष्टि प्राप्त नहीं हुई तो वास्तविक जीवन में वापस घर आ गए। कुछ महीने बाद पारिवारिक कारणों की वजह से पैतृक धंधे खेती में लग गए। इन सालों में चाहे वे औपचारिक शिक्षा से बाहर रहे हों पर किताबें ही उनका इश्क बनी रही। राजनीतिक दर्शन,साहित्य, और सामाजिक और आर्थिक शोषण के विषय इन दिनों उनके अध्ययन का केंद्र-बिंदु रहे। दक्षिण गुजरात विश्वविद्यालय( सूरत) के भाषा विज्ञान विभाग में व्याख्याता का पद प्राप्त होने के बाद १९९० में कॉमनवेल्थ वजीफा प्राप्त कर बर्तानिया के यार्क विश्वविद्यालय चले गए। वहां ‘हिंदी में कारक और समता: अधिकार और बंधन सिद्धांत के सन्दर्भ में’ विषय पर शोध प्रबंध प्रस्तुत किया। डॉ.जोगा सिंह २०१३ में सेवानिवृत हुए और आजकल पुनर्नियुक्त प्राध्यापक के रूप में पंजाबी विश्वविद्यालय में कार्यरत हैंl

इनकी पुस्तिका ‘भाषा नीति के बारे में अंतर्राष्ट्रीय खोज’ और ‘मातृभाषा खोलती है शिक्षा,ज्ञान और अंग्रेज़ी सीखने के दरवाज़े’ के २०१३ में प्रकाशन ने उनको भारतीय मातृभाषाओं के लिए राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चल रहे वैचारिक संघर्ष में सबसे अग्रणी योद्धाओं में शामिल कर दिया है। भारतीय प्रशासनिक सेवाओं की परीक्षा में अंग्रेजी भाषा के स्थान को और बढ़ा दिए जाने के विरुद्ध दिल्ली में चला छात्र आन्दोलन इस पुस्तिका को लिखने का तात्कालिक कारण था। इस पुस्तिका का ही प्रभाव था कि गत अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस २१ फरवरी २०१५ को जब कर्नाटक सरकार का एक प्रतिनिधिमंडल राष्ट्र्पति प्रणब मुखर्जी को मिला था तो उन्हें उस प्रतिनिधिमंडल में विशेष रूप से शामिल किया गया था। पिछले साल ही कई भारतीय प्रदेशों में हुए सम्मेलनों में वे मातृभाषाओं के हक़ में वैचारिक आवाज़ बुलंद कर चुके हैं,जिससे मातृभाषाओं के लिए चल रही सरगर्मी को नया बल मिला है मातृभाषाओं के हक़ में अखबारों और पत्रिकाओं में लगातार लिखना,हर तरह के संचार माध्यम का प्रयोग,सम्मेलनों का आयोजन,सार्वजनिक स्थानों पर इश्तिहार तक बांटना डॉ.जोगा सिंह की भारतीय मातृभाषाओं के प्रति प्रतिबद्धता का मुंह बोलता प्रमाण है। इनको पूरा विश्वास है कि कुछ ही सालों में भारतीय मातृभाषा संग्रामी भारतीय मातृभाषाओं का वर्चस्व स्थापित करने में अवश्य कामयाब होंगे। उनका कहना है कि भारतीय मातृभाषाओं का सवाल केवल भाषा का सवाल नहीं है, बल्कि यह भारत के भविष्य को सुनिश्चित करने का सवाल है। वैश्विक हिंदी सम्मेलन पंजाब के इस सपूत,मातृभाषा-प्रेमी और भारत-भाषा प्रहरी का अभिनन्दन करती है।

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