भावपुंज है ‘पूजा के पुष्प’ 

अवधेश कुमार ‘अवध’
मेघालय
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पुस्तक समीक्षा…………………………..
बालाघाट(मध्यप्रदेश) की उर्वर भूमि ने समय-समय पर मानसिक तृप्ति के लिए साहित्य,संगीत और कला के क्षेत्र में प्रवीण सपूत दिए हैं,जिन्होंने न सिर्फ खानदान बल्कि सूबे की इज्जत में चार चाँद जड़े हैं। इसी श्रृंखला की नवीन कड़ी बनकर एक कलमकार उभरा है राकेश सिहांसने,जिसके परदादा श्रद्धेय भैयालाल सिहांसने ‘गवेया’ गायकी के सुपरिचित हस्ताक्षर थे,तथा पिता अशोक सिहांसने ‘असीम’ साहित्य के वटवृक्ष हैं।
साहित्य के क्षेत्र में प्रतिष्ठित मासिक पत्रिका का सम्पादन एवं प्रकाशन के प्रबन्ध सम्पादन का गुरुतर दायित्व इतनी छोटी आयु में समुचित सम्हाल पाना इनकी दक्षता का ही परिचायक है,साथ ही कविता सृजन करना बहुमुखी प्रतिभा से सम्पन्न होना परिलक्षित करता है। वरिष्ठजनों से आशीष,सहयोग व स्नेह प्राप्त कर लेने में इनकी सरसता व सौम्यता स्वयमेव सिद्ध है। ‘पूजा के पुष्प’
(कविता संग्रह)पुस्तक इन्हीं विशेषताओं का समग्र दस्तावेज है।


रत्नगर्भा वसुन्धरा के गर्भ में बीज विश्राम पा सकता है पर नष्ट नहीं हो सकता, बल्कि सही अवसर देखकर वसुधा बीज को अंकुरित कर संसार के समक्ष लाती है। यही एक कलमकार का बीज कवि के भीतर कहीं छुपा हुआ था जो वाणिज्यिक बंधन को तोड़कर अंकुरित हो उठा और आज हमारे समक्ष ‘पूजा के पुष्प’ लिए उपस्थित है।
कवि ने बाल्यावस्था के उपरान्त क्रमश: किशोरावस्था और फिर युवावस्था में रहते हुए उम्र के तीसरे दशक के उत्तरार्द्ध में ‘पूजा के पुष्प’ को अर्पित कर दिया किन्तु अवचेतन में कविताओं का सृजन कवि की तीनों विगत अवस्थाओं में हुआ है जिसे लेखनीबद्ध कालान्तर में किया गया। कुल छप्पन कविताओं के इस संग्रह में प्रारम्भिक तेईस कविताओं के सृजन में सर्जनकार बालक होता है,क्रमांक चौबीस से छियालीस तक की कविताओं में कवि किशोर रहता है और अंतिम दस कविताओं में कवि युवक होता है। कवि की अवस्था के अनुसार क्रमश: बाल सुलभता,विद्रोह और प्रेम तथा व्यवस्था परिवर्तन की व्याकुलता परिलक्षित है।
यद्यपि काल के अनुसार अवस्था विभाजन होता है तथापि चिंतनशील कवि हृदय नि:बंध होकर कभी भी और कहीं भी विचरण कर लेता है, परिणाम स्वरूप उपरोक्त विभाजन के बीच प्रक्षेपण का होना भी स्वाभाविक लगता है। ‘पानी बचाओ’ बाल कविता में कवि की लेखनी एक शिक्षक बन जाती है-
‘सारे जग की एक कहानी,
पानी-पानी-पानी-पानी।
घर-घर संदेशा है देना,
व्यर्थ न इसको बहने देना।’
नवोदित कवि के दिल में एक कसक है जो ढूँढ रही है पुरानी गौरवशाली विरासत को-
‘और साथ लेकर जाना,
मेरा मनुहार/प्यार भरा,
मेरे भाई के नाम/मेरे पड़ोसी के नाम,
मेरे दुश्मन के नाम/मेरे दोस्त के नाम,
वसुधैव कुटुम्बकम का।’
हिन्दी की बुनियाद पर अंग्रेजी का हवाई महल खड़ा करने के दुष्प्रयास पर कवि नामानुरूप शीतल व्यंग्य की छौंक लगाता है-
‘भारतीय स्टेट बैंक जाएँ
एटीएम खाता खोलवाएँ
क ख ग को दूर भगाएँ
एबीसीडी रटते जाएँ
आओ हिन्दी मास मनाएँ।’
‘रावण वध’ कविता में कवि व्यवस्था से असन्तुष्ट हो भक्त बनकर इंतजार करने लगता है-
‘इन्तजार है
भारत माता को
फिर एक राम का।’
‘पूजा के पुष्प’ कवि के हृदय के समग्र भाव का वह पुंज है जिसे वह कभी राष्ट्र,कभी शहीद,कभी अतीत कालीन गौरव,कभी परिवर्तनशील क्रान्ति,कभी आशातीत भविष्य तो कभी मानवता को सादर समर्पित करता है। गरीब की कुटिया से होकर एड्स पीड़ित राजनीति एवं हिन्दी की दुर्दशा उसे चैन से रहने नहीं देते। नैराश्य की बजाय संतोष का चयन कवि कर लेता है किन्तु उम्मीद के साथ क्रान्ति के बीज को मरने नहीं देता।
गुणों के वृहद पहाड़ में दोषों की राई अवश्यम्भावी है। अनुनासिक (ँ) की जगह अर्द्ध ओ (ऑ) का प्रयोग अनुचित है। कविता के बीच अंकों (15 अगस्त, 26 जनवरी आदि) का प्रयोग त्रुटिपूर्ण है। छंदों के रूप में अतुकान्त कविता,तुकान्त कविता एवं दोहे का प्रयोग विविधता द्वारा आकर्षण बढ़ाता है। शब्द आम बोलचाल से चयनित हैं। ‘उपमान मैले हो गए हैं’ को ध्यान में रखते हुए कवि ने नए उपमान गढ़ लिए। ‘जुल्फें जैसे जन्नत की टेढ़ी-मेढ़ी गलियाँ’ तथा ‘षोडस वर्षीय प्रस्फुटित यौवना जैसे कच्चे नारियल का मीठा पानी’ बरबस ही पाठक को रस निमग्न कर देते हैं।
‘पूजा के पुष्प’ को पढ़ते हुए हर वय का पाठक अपने लिए कुछ-न-कुछ पा लेता है। खानदानी कवि राकेश सिहांसने को पढ़ते हुए सहज ही लगता है कि भविष्य निराश नहीं करेगा। प्रथम कृति से ही सपूत के पाँव पालने में समझ में आने लगे हैं।

परिचय-अवधेश कुमार विक्रम शाह का साहित्यिक नाम ‘अवध’ है। आपका स्थाई पता मैढ़ी,चन्दौली(उत्तर प्रदेश) है, परंतु कार्यक्षेत्र की वजह से गुवाहाटी (असम)में हैं। जन्मतिथि पन्द्रह जनवरी सन् उन्नीस सौ चौहत्तर है। आपके आदर्श -संत कबीर,दिनकर व निराला हैं। स्नातकोत्तर (हिन्दी व अर्थशास्त्र),बी. एड.,बी.टेक (सिविल),पत्रकारिता व विद्युत में डिप्लोमा की शिक्षा प्राप्त श्री शाह का मेघालय में व्यवसाय (सिविल अभियंता)है। रचनात्मकता की दृष्टि से ऑल इंडिया रेडियो पर काव्य पाठ व परिचर्चा का प्रसारण,दूरदर्शन वाराणसी पर काव्य पाठ,दूरदर्शन गुवाहाटी पर साक्षात्कार-काव्यपाठ आपके खाते में उपलब्धि है। आप कई साहित्यिक संस्थाओं के सदस्य,प्रभारी और अध्यक्ष के साथ ही सामाजिक मीडिया में समूहों के संचालक भी हैं। संपादन में साहित्य धरोहर,सावन के झूले एवं कुंज निनाद आदि में आपका योगदान है। आपने समीक्षा(श्रद्धार्घ,अमर्त्य,दीपिका एक कशिश आदि) की है तो साक्षात्कार( श्रीमती वाणी बरठाकुर ‘विभा’ एवं सुश्री शैल श्लेषा द्वारा)भी दिए हैं। शोध परक लेख लिखे हैं तो साझा संग्रह(कवियों की मधुशाला,नूर ए ग़ज़ल,सखी साहित्य आदि) भी आए हैं। अभी एक संग्रह प्रकाशनाधीन है। लेखनी के लिए आपको विभिन्न साहित्य संस्थानों द्वारा सम्मानित-पुरस्कृत किया गया है। इसी कड़ी में विविध पत्र-पत्रिकाओं में अनवरत प्रकाशन जारी है। अवधेश जी की सृजन विधा-गद्य व काव्य की समस्त प्रचलित विधाएं हैं। आपकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी भाषा एवं साहित्य के प्रति जनमानस में अनुराग व सम्मान जगाना तथा पूर्वोत्तर व दक्षिण भारत में हिन्दी को सम्पर्क भाषा से जनभाषा बनाना है। 

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