भीड़ का चोर

सुनील जैन `राही`
पालम गांव(नई दिल्ली)

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रात के लगभग साढ़े बारह बजे होंगे,बच्‍चे सो गए थे। कुछ जग रहे थे,कुछ मोबाइल पर नए दोस्तों की तलाश में जुटे थे,जो रात में उनका साथ निभा सकें। कुछ सोने का नाटक कर रहे थे। कुछ दिनभर की भड़ास-कुंठा निपटाने में लगे थे। कुछ उसी भाव में कल की परियोजना में तो कुछ परी कल्‍पना में व्‍यस्‍त थे। कुछ पत्‍नी से सुबह हुई पाकिस्‍तान वार्ता को त्रिपक्षीय बनाने में जुटे थे, वे चाहते थे कि चीन रूपी बच्‍चे वार्ता सम्‍पन्‍न करवाएं,लेकिन पत्‍नी चीन की बजाय अमेरिका के माध्‍यम यानी बच्‍चों के मामा को साक्षी बनाकर किसी सार्थक निर्णय की तलाश में थी।
रात रोज होती है। ऐसी रात साल,दो साल में एक बार आती है और आज वही कृष्‍ण पक्ष की काली रात थी। गली संकरी,पहले मेटाडोर,मारुति ८०० आसानी से घुस आती थी,अब अब ई-रिक्‍शे वाला भी २-जी पैक की तरह नखरे मारता है,लेकिन एक या दो आदमी आने पर सड़क संसद मार्ग जैसी चौड़ी हो जाती और चलने वाला सांसद की तरह चौड़ा,लेकिन सामने से स्‍कूटर के आने से पार्षद द्वारा निर्मित नाली की तरह सिकुड़ जाता।
रात के ग्‍यारह बजे तक सभी काम निपटा लेने वाले गली के कुत्‍ते पूंछ चिपकाकर सोए पड़ गए थे। कुत्‍तों को नींद नहीं आती। आदमी सोना चाहता है। सोते हुए सोना पाना चाहता है। सोने के लिए उसे अलग से कमरा चाहिए। वह भीड़ में शामिल नहीं होना चाहता। अपनी इच्‍छापूर्ति के लिए भीड़ से अलग रहना चाहता है, लेकिन उल्‍लू सीधा करने के लिए भीड़ में शामिल होना अपना परम कर्तव्‍य समझता है। सभी भीड़ से अलग-थलग पड़े थे।
अचानक आवाज आई-`चोर-चोर।` चोर आदमी नहीं होता, चोर व्‍यवस्‍था नहीं होती,चोर भीड़ नहीं होता,चोर अकेला होता है, वह अपनी इच्‍छापूर्ति के लिए भीड़ से अलग होता है,इसलिए वह चोर होता है। कार्यालय में ईमानदार आदमी चोर है,घर में पति-पत्‍नी चोर है,बच्‍चे भी चोर हैं,लेकिन जब ये परिवार के रूप में आ जाते हैं तो भीड़ में शामिल हो जाते हैं। भीड़ चोर नहीं होती,भीड़ हत्‍यारी नहीं होती। भीड़ है-वोट तंत्र,धर्म-अनुष्‍ठान,इबादत,कवि सम्‍मेलनों की सफलता,नेता की लोकप्रियता,विभिन्‍न प्रांतीय-जातीय सेनाओं,विभिन्‍न राजनीतिक दल आदि।
भीड़ में शामिल वही होता है,जो अपनी रक्षा-सम्‍पत्ति की रक्षा-धर्म की रक्षा-मजहब की रक्षा-अपने अस्तित्‍व की रक्षा और परिवार की रक्षा करना चाहता है। भीड़ का उद़देश्‍य नहीं होता। उसे संगठित कर बताया जाता है,मारो। यह चोर है,यही वह चोर है,जो भीड़ के सरगना के लिए खतरा है।
आवाज गूंजने लगी,चोर-चोर। सभी बिस्‍तरों से अपना-अपना मत(वोट) देने चोर के विरोध में भीड़ जुटाने लग जाते हैं। भीड़ इकटठा हो गई तो नेतृत्‍व ने आव्‍हान किया-मारो। इससे आपकी (मेरी) जान-सम्‍पत्ति-वोट बैंक-आभासी धर्म-परिवार को खतरा है। यह आवाज भीड़ को हत्‍यारा बनाती है,नेता जी की रैली सजाती,जनता को भ्रमित करती,उर्स और मेलों की रौनक बढ़ाती है। खतरा कभी भी भीड़ से नहीं था,भीड़ ने कभी एक स्‍वर में नहीं कहा-मारो।
पहली आवाज नेता,धर्मगुरूओं की,आदेश देने वाले,उकसाने वाले,फतवा वाले असली हत्‍यारे हैं। भीड़ केवल पीछे चलती है,उसे नहीं मालूम वह राजपथ की ओर जा रही है या जनपथ या संहार पथ पर अग्रसर है।
घोड़े को काबू करने के लिए लगाम और भीड़ को काबू करने के लिए भीड़ सरगना को दबोचो।
चोर पिटा और खूब पिटा। एक आवाज आई,दूसरे मुहल्‍ले में फेंक दो। मेरा परिवार-घर सुरक्षित है। मेरा वोट बैंक सुरक्षित हो गया। लोकतंत्र बच गया,प्रजातंत्र की बलि होते-होते बची। बोलो जय हिन्‍द,और छोटी शंका का निवारण कर सुबह के लिए फिर से भीड़ में शामिल होने के लिए सो जाओ।
सोने में सोना पाने का आनंद लो। सरकारी नौकरी की तलाश में जुट जाओ और सरकारी नौकर की तरह सो जाओ। सरकारी नौकरी जैसे आराम की तलाश की सड़क पर भीड़ बन जाओ। चोर को सामूहिक रूप से पीट-पीटकर अपने कर्तव्‍य का निर्वाह करो और सो जाओ।

परिचय-आपका जन्म स्थान पाढ़म(जिला-मैनपुरी,फिरोजाबाद)तथा जन्म तारीख २९ सितम्बर है।सुनील जैन का उपनाम `राही` है,और हिन्दी सहित मराठी,गुजराती(कार्यसाधक ज्ञान)भाषा भी जानते हैं।बी.कॉम.की शिक्षा खरगोन(मध्यप्रदेश)से तथा एम.ए.(हिन्दी,मुंबई विश्वविद्यालय) से करने के साथ ही बीटीसी भी किया है। पालम गांव(नई दिल्ली) निवासी श्री जैन के प्रकाशन खाते में-व्यंग्य संग्रह-झम्मन सरकार,व्यंग्य चालीसा सहित सम्पादन भी है।आपकी कुछ रचनाएं अभी प्रकाशन में हैं तो कई दैनिक समाचार पत्रों में लेखनी का प्रकाशन होने के साथ आकाशवाणी(मुंबई-दिल्ली)से कविताओं का सीधा और दूरदर्शन से भी कविताओं का प्रसारण हो चुका है। राही ने बाबा साहेब आम्बेडकर के मराठी भाषणों का हिन्दी अनुवाद भी किया है। मराठी के दो धारावाहिकों सहित करीब १२ आलेखों का अनुवाद भी कर चुके हैं। इतना ही नहीं,रेडियो सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में ४५ से अधिक पुस्तकों की समीक्षाएं प्रसारित-प्रकाशित हो चुकी हैं। आप मुंबई विश्वविद्यालय में नामी रचनाओं पर पर्चा पठन भी कर चुके हैं। कुछ अखबारों में नियमित व्यंग्य लेखन करते हैं। एक व्यंग्य संग्रह अभी प्रकाशनाधीन हैl नई दिल्ली प्रदेश के निवासी श्री जैन सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रीय है| व्यंग्य प्रमुख है,जबकि बाल कहानियां और कविताएं भी लिखते हैंl आप ब्लॉग पर भी लिखते हैंl आपकी लेखनी का उद्देश्य-पीड़ा देखना,महसूस करना और व्यक्त कर देना है।

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