भ्रष्टाचार-घटिया राजनीति भारत की ज्वलंत समस्या

डॉ.अरविन्द जैन
भोपाल(मध्यप्रदेश)
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गांव में धुआं मत करो शहजादे की आँखें आई! धूल से
एलर्जी है तो सड़कों पर मत निकालो,मरना एक दिन है तो जिओ मत,देश में समस्या है तो क्या मरना जरुरी है या उससे सामना करना जरुरी है…रोगी का बीमार होना यानी हमारी प्रतिरोधक क्षमता का अभाव या संक्रमण अधिक शक्तिशाली है..अपराध अधिक यानि पुलिस अक्षम या कम बल का होना या प्रतिरोगात्मक शक्ति का कम होना है!
स्वतंत्रता के पहले आज़ादी एक अंतहीन सुरंग जैसी लड़ाई थी,पर साहस और इच्छाशक्ति के कारण विजयी हुएl इसका मतलब हमारी शक्ति बढ़ी और अंग्रेजों की घटी,तब विजयी हुएl आज भी कुछ बातें हमें परेशान कर रही हैं,और हम ढिंढोरा पीटते जा रहे हैंl इलाज़ में वो दवा सबसे अच्छी मानी जाती है,जिससे नुकसान होने पर इलाज़ होl बिना कारण के कार्य नहीं होता,और संसार में न कोई ऐसी समस्या है जिसका इलाज न हो। जैसे संसार में प्रत्येक वस्तु औषधि है,इसके अलावा कुछ नहीं और कुछ ऐसी बीमारियां होती हैं,जिन्हें असाध्य बीमारी कहते हैं जिससे मृत्यु निश्चित होती हैं-जैसे अर्बुद्ध या कैंसर।
मनुष्य अपने जन्म के साथ अनेक पूर्वोपार्जित कर्म और कुछ उपार्जित कर्मों का फल भोगता है। इस प्रकार परिवार,समाज,देश और विश्व की संरचना हुई है। ऐसा कोई भी जीव य राज्य नहीं हुआ है,जिसमें बुराइयां या कमियां न हुई हों। उनकी अच्छाइयों का या बुराइयों का प्रभाव परिवार,समाज और देश पर पड़ता है। हमारा देश शताब्दियों से गुलामी की जंजीरों में रहा,उस पर अनेक शासक,विभिन्न विचारधाराओं के आए और उन्होंने हमारा खूब दोहन,शोषण किया और अपने सुख-सुविधाओं के लिए विकास किए,जो अचल रहे,न ले गए और न मरने के बाद छोड़ गए। सोना
चांदी,हीरा-जवाहरात अपने साथ लूटकर ले गए,पर उसको कहीं-न-कहीं छोड़ गए होंगे।
मुगल राजाओं,उसके बाद ईस्ट इंडिया फिर अंग्रेज आए और सब कुछ अत्याचार किए,खूब मारा-पीटा और अंत में भागे या गए,पर कुछ कलंक छोड़ गए। इसमें शिक्षा,चिकित्सा और हिन्दू-मुस्लिम विवाद है,जिससे देश बना कम टूटा अधिक। ये रोग बढ़ता जा रहा है और लगता है यह अंतहीन है। खैर,जैसा छोड़ गए उसके बाद की हमारी जिम्मेदारी बनी और बढ़ी पर,पर समस्या
कुछ प्राकृतिक और कुछ हमारे द्वारा बनाई गई। जो प्राकृतिक हैं उनका इलाज़ है,पर जो मानव निर्मित हैं वे लाइलाज होती हैं,यह बात सौ प्रतिशत सत्य है। मानव निर्मित बाँध जब फूटेंगे,तब अधिक नुकसान होता है और जो प्राकृतिक होती हैं,उनमें नुकसान कम होता है।
हमारा मुल्क-देश-राष्ट्र के कितने नाम हैं और किसमें सुधार करना है-आर्यावर्त,भारत,हिंदुस्तान,भारत वर्ष,इंडिया…जैसे
हाथी के पांव में सब पाँव समा जाते हैं,जैसे एक बुराई सब बुराई की जड़ है,वैसे ही लोभ पाप का बाप होता है। यदि हमारे जीवन में हिंसा,झूठ,चोरी,कुशील और परिग्रह जैसे पांच पाप हैं तो अन्य की कोई जगह नहीं हैं। मजेदार बात यह है कि,विश्व के समस्त देशों के जितने कानून हैं वे इन पांच पापों के लिए ही बने हैं।
कभी-कभी यह प्रश्न उठता है कि,भारत में जितना विकास होना चाहिए था,उतना क्यों नहीं हो पा रहा या नहीं हुआ ? उसके कारण क्या हैं ? उनकी सूची बहुत लम्बी हो सकती हैं पर सूत्र में कुछ बात कह सकते हैं-
जैसे आबादी बढ़ने से विकास की गति कम हो जाती हैं या हो गई। वर्ष १९७५ में नसबंदी से परिवार नियोजन का कार्यक्रम किया गया,उसमें कुछ जबरदस्ती हुई और उसके बाद सरकार गिरी। उसके परिणाम सुखद रहे और मंहगाई,रहने का स्थान सीमित, आमदनी निश्चित,पढ़ाई मंहगी,और देश में प्रजातंत्र होने से एक पक्ष द्वारा विरोध करने से और एक जाति मुसलमानों द्वारा अपनी आबादी को बढ़ाने का धरम के नाम पर बचाव करना, जिससे असंतुलन होना स्वाभाविक है। इसके पीछे मात्र कुंठित राजनीति का होना है,जिससे विकास की गति बहुत अधिक अवरुद्ध हो चुकी है।  हमारा बजट बजट मात्र जनता के ऊपर खर्च होता है। विकास
कम हो पा रहा है,आबादी का विस्फोट सरकार के साथ परिवार पर भी प्रभाव डालता है। वो तो चीन जैसा देश है,जहाँ एकाधिकार है। नियम का पालन सख्त है,तो वहां आबादी पर अंकुश लगा हुआ है। इधर तो देश में नियमों का पालन तौहीन समझते हैंl एक वर्ग नहीं चाहता हैl मुस्लिम अपनी आबादी को दूरगामी राजनीति का हिस्सा मानकर चल रहे हैं,जिससे देश की हालत उनकी कौम जैसी हैl जैसे अशिक्षा,तंगदिली से रहना और आपराधिक प्रवृत्ति अधिक होने का कारण आर्थिक असमानता हैl ये हमारे देश का कैंसर हैं,कोढ़ हैl आबादी का नियंत्रण करके देश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देना होगाl
भ्रष्टाचार का अर्थ सुविधा शुल्क या अधिक लाभ लेने कुछ लालच देने से हैl इस रोग ने भारत को गर्त में ला दिया है l यह परम्परा बहुत प्राचीन हैlराजाओं को नजराना देने का चलन रहा,उसके बाद उनका दूसरा रूप अफसर हैं और फिर हमारा घर भी इसका केन्द्र हैl बच्चों को भी लालच देकर काम करवाते हैंl भ्रष्टाचार का एक सूत्र है सरकारी या असरकारी,कार्यालय में दिए  गए आवेदन पर सबसे पहले आपत्ति लगाओ,उससे सामने वालों
पर विपत्ति आती है,जिससे संपत्ति देना उससे संतुष्टि होती थी सामने वाले को और वही हुई सफलताl इस देश में भ्रष्टाचार शुरू से रहा है और आज भी है पर रूप बदल गए,लेकिन अर्थ एक ही है l इसने हमारे चरित्र को बहुत अधिक गिरा दियाl इसके लिए सबको धन चाहिए बड़े बनने के लिए,चाहे चपरासी  से
मंत्री और और मजदूर से उद्योगपति,सब संसार की सब सामग्री को भोगना चाहते हैं और उसकी कोई सीमा नहीं हैl पेट के लिए करना ठीक है,पर पेटी की मांग असीमित हैl हम क्यों अपने संस्थान को मर्यादित-इकाई-सीमित क्यों बनाते हैं ? क्यों हम असीमित खाना खाते हैं ? हम क्यों असीमित कार नहीं चलाते हैं ? ऐसे ही यह सुविधा शुल्क सीमित रहा होता तो शायद पचनीय होता,पर ये अब अजीर्ण हो चुके और अब दस्त और उलटी के समान सरकार उनसे निकलवा रही हैl पानी का धन पानी में और नाक कटी बेईमानी मेंl इसका इलाज गंगोत्री से होगा,क्योंकि उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार है और निचले स्तर से सुधार की अपेक्षा… असंभव ? जब राष्ट्रपति,प्रधानमंत्री,मंत्री,मुख्यमंत्री,राज्यपाल ,मुख्य सचिव,सचिव,कलेक्टर,पुलिस कहाँ-कहाँ नहीं
देख सकते,तब निम्न स्तर से क्या अपेक्षाl इस राशि का उपयोग जनकल्याण में न होकर एक स्थान पर रुका रहता है और कुछ लोग उसका उपभोग करते हैं,जबकि उसको उपयोगी होना चाहिए l इसको हटाने का मुख्य इलाज़ संतोष,नैतिकता,परस्पर प्रतिस्पर्धा,अपनी आकांक्षा को सीमित रखना हैl धन सुख
अपने-अपने पुण्य-पाप से मिलता है,और इसे दौलत कहते हैंl `दौलत` में दो लात होती है,इसका आशय जब दौलत आती है तब हमारी छाती बाहर निकल आती है और जब जाती है,तब कमर पर लात मारकर झुका देती हैl दूसरा `कितना इकठठा करके ले जाएंगे` को लेकर गया है-सिर्फ आत्मसंतुष्टि के लिए
हम दूसरे से भीख मांगकर नीची निगाह करते हैं,और देने वाले का हाथ हमेशा ऊपर होता है और मांगने वाले का हाथ नीचे होता हैl भ्रष्टाचारी व्यक्ति इतना ढीठ हो जाता है कि,वह अपनी निजीयों से यानी अपनी माँ तक के स्तन काट लेता हैl इस नासूर को मिटाना बहुत जरुरी हैl
आरक्षण एक ऐसा विकृत रोग है,जिसने हमारी सामाजिक ,शैक्षणिक,प्रशासनिक व्यवस्थाओं को चकनाचूर-ध्वस्त कर दिया l इससे कुछ जाति-वर्ग को राहत मिली,पर अन्यों को धराशाई कर दिया हैl योग्यतम का स्थान शून्य और अयोग्य को लाभ देने की कोई सीमा नहीं हैl ठीक है,वर्षों से दबे रहे पर अब ६० वर्षों में दूसरी पीढ़ी में सुधार आ गया किन्तु अब भी लाभ जारी हैl इसके कारण सामने का वर्ग इनको पाल रहा है और इसके साथ योग्यता को
कुंठाग्रस्त कर दिया है,जबकि सबको एक माना जाना चाहिएl जब सबको एक-सा कर नहीं देना पड़ता तो सबको एक-सा लाभ नहीं हैl कोई जरुरत नहीं है इस देश को आरक्षण की,सब अपनी
योग्यता से पढ़ें,लिखें और आगे बढ़ेंl बड़ी परेशानी है,क्योंकि अब  यह रोग असहनीय होता जा रहा हैl इसको तत्काल प्रभाव से ख़तम कर सबको एक मानकर एक जैसा व्यवहार करेंl क्या औचित्य रहा है अब इस आरक्षण का,जिसके कारण योग्यतम लोगों को आत्महत्या करना पड़ीl इससे निराशाजनक माहौल मिला और देश को कोई विशेष लाभ नहीं मिला हैl कारण योग्यता का अभाव,उनकी कार्यशैली पर दिखता-पड़ता हैl अब इस बिंदु पर पुनर्विचार बहुत जरुरी हैl
देश के संचालन के लिए राजनीति का स्थान प्रजातंत्र में
जरुरी हैl राजनीति की जरुरत है,पर वह दलगत न हो,लेकिन  हमारे देश में राजनीति तो गर्भ से शुरू हो जाती है-लड़का होगा या लड़की,गोरा या काला,इतने वज़न का..आदिl उसके बाद जन्म के साथ आजकल शिशु एक हाथ में झंडा और एक हाथ में डंडा लेकर पैदा हो रहे हैंl उसके बाद उसके प्रवेश कराने में राजनीति का सहारा,पढ़ाई के बाद नौकरी के प्रवेश में और फिर नौकरी में शासक बनने में राजनीति जरुरी…यानी पद एक और चाहने वाले अनेक,इससे ही शुरुआत होती है राजनीतिl पहले देश,फिर समाज, उसके बाद परिवार की जगह अब पहले परिवार,उसके बाद
समाज और देश जाए भाड़ मेंl इतने अधिक राजनीतिक दलों की
जरुरत क्यों है,क्योंकि सब एक पद पर बैठना चाहते हैं,और इसके कारण गलाकाट प्रतियोगिता शुरू हैl जो बीच में आता है,उसे हटाने में कोई मुरब्बत नहीं हैl
पद वाले पदोभलब्धि हेतु पाप-पाखंड करते हैं,इससे समाज,परिवार में तनाव-दुश्मनी का भाव पनपने लगा हैl और एक परिवार के दो सदस्य दो दल में क्यों ? पहले समाज के लोग नेता का चयन करते थे,अब नेता समाज से कहते हैं-मैं नेता हूँ और इस पद पर आने के बाद नेता नेता नहीं होकर-मंत्री,पैसे वाले हो जाते हैं उसके कारण राजनीति में लगाव होता
हैl लोग कहते हैं-ये काँटों का ताज है और काँटों भरी कुर्सी है,तो
फिर उसमें बैठने को इतने लालायित क्यों होते हैं ? हमारे देश के नेताओं का चरित्र वर्तमान में इतना गिरा हुआ है कि,वर्तमान में राजनीति का दूसरा नाम गाली हैl जो जितना लुच्चा-लफंगा,गुंडा, बदमाश,हत्यारा हो वही सफलतम राजनीतिज्ञ होता या माना जाता हैl इस दौर में राजनीति में जनता का विश्वास ख़तम होता जा रहा है और अन्य व्यवस्था हमारे देश को स्वीकार्य नहीं हैl अब परिवर्तन की जरुरत है और होना चाहिए,तानाशाही या हिटलरशाही प्रजातंत्र में संभव नहीं हैlकारण कि,केकड़ा पद्धति होने से कोई भी सफल नहीं होगाl इस देश में भय के शासन के बिना विकास होना संभव नहीं है,और नेताओं का आचरण नैतिकता के साथ होना चाहिएl बोलने में नहीं,कृतित्व में भी
होना चाहिएl मन,वचन और कर्म में एकता होना अनिवार्य है,न कि `पर उपदेश वचन बहुतेरे`,किन्तु आज की स्थिति में सत्तारूढ़ दल भी इससे अछूता नहीं हैlकारण कि,उनको चुनाव जीतना  और अपनी समृद्धि को बढ़ाना हैl इतना ईमानदार नहीं हैं कोई भी दल वर्तमान में,सब `चोर-चोर मौसेरे भाई` हैं,इसलिए देश
को राजनीतिविहीन होना चाहिए या राजनीतिज्ञों को अधिकारविहीन होना चाहिएl वैसे वर्तमान शासक राष्ट्रपति प्रणाली को अपनाने की तैयारी में हैl इस समय सर्वोच्च पद पर ऐसे लोगों को आसीन किया गया,जो प्रधानमंत्री की
आज्ञा का पालन करने को बाध्य होंगे,अन्यथा उनका पदासीन रहना असंभव हैl
इसके अलावा शिक्षा का अवमूल्यन होना,स्वास्थ्य व्यवस्था
दुरूह,बिजली,सड़क,न्याय व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह,कृषक दुखी और उद्योगपति की विलासिता दिन-दूनी रात-चौगुनी बढ़ रही हैl गरीब और गरीब हो रहा है,तथा आत्महत्याएं बढ़ रही है,जिसले लिए सामूहिक प्रयास जरुरी हैंl देश इस समय चारों तरफ से अव्यवस्थाओं से घिर चुका हैl आबादी बढ़ाने का कुचक्र चल रहा है,और एक जाति अपना तर्क दे रही है तो दूसरी दूसराl भ्रष्टाचार अब शिष्टाचार बन गया है,और अब कहते हैं-लाओ  और आदेश ले जाओl
आरक्षण एक ऐसा कोढ़ है,जिससे योग्य मर रहे और धूल सर पर चढ़ रही हैl राजनीति का घिनौना खेल ऐसा है,जिसमें सबकुछ निंदनीय कार्य समाहित हैlशिक्षा,स्वास्थ्य,सड़क,बिजली,पानी, न्याय,साहित्यकार,वैज्ञानिक आज अपने भाग्य पर रो रहे हैंl दोगली नीति या बहरूपियापन अधिक दिन नहीं टिकता हैl
चूँकि देश विस्तृत है,इसलिए क्रांति-बगावत मुश्किल है,क्योंकि
यहाँ जयचंद,गौरी की कमी नहीं हैl विवेकानंद जी,सुभाष बोस,और पटेल के देश में अब राजनेताओं से अपेक्षा है कि,समस्याओं के सुधार के लिए काम करें,वरना चुनाव में सबका दम्भ चूर हो जाएगाl

परिचय- डॉ.अरविन्द जैन का जन्म १४ मार्च १९५१ को हुआ है। वर्तमान में आप होशंगाबाद रोड भोपाल में रहते हैं। मध्यप्रदेश के राजाओं वाले शहर भोपाल निवासी डॉ.जैन की शिक्षा बीएएमएस(स्वर्ण पदक ) एम.ए.एम.एस. है। कार्य क्षेत्र में आप सेवानिवृत्त उप संचालक(आयुर्वेद)हैं। सामाजिक गतिविधियों में शाकाहार परिषद् के वर्ष १९८५ से संस्थापक हैं। साथ ही एनआईएमए और हिंदी भवन,हिंदी साहित्य अकादमी सहित कई संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। आपकी लेखन विधा-उपन्यास, स्तम्भ तथा लेख की है। प्रकाशन में आपके खाते में-आनंद,कही अनकही,चार इमली,चौपाल तथा चतुर्भुज आदि हैं। बतौर पुरस्कार लगभग १२ सम्मान-तुलसी साहित्य अकादमी,श्री अम्बिकाप्रसाद दिव्य,वरिष्ठ साहित्कार,उत्कृष्ट चिकित्सक,पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी() आदि हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-अपनी अभिव्यक्ति द्वारा सामाजिक चेतना लाना और आत्म संतुष्टि है।

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