मंचीय कविता और गम्भीर साहित्य

      पप्पू की पान की दुकान पर दोपहर को भीड़ नहीं थी। खाली समय में वह पान के पत्ते की टोकरी से पान के पत्ते निकाल कर उन्हें फेर रहा था। सड़े और दागदार पत्ते अलग छांट रहा था। जब सभी दागदार और सड़े पत्ते निकल गए तो अच्छे पत्तों को भीगे कपड़े में लपेटकर बड़े करीने से टोकरी में सजा कर रख दिया। पप्पू फिर सड़े और दागदार पत्तों को काट-छांट करने लगा। ये पत्ते कटने-छंटने के बाद पीले और देखने में सुंदर लग रहे थे। उन पर केवड़ा-जल छिड़ककर अपनी दुकान के बाहरी हिस्से की टेबल पर बिछे भीगे कपड़े पर बड़े करीने से सजा दिया।सजाने का तरीका इतना मौलिक और लाजबाब था कि,ग्राहकों को उन पत्तों के शानदार होने का सहज विश्वास हो जाए।मैं पप्पू के इस कार्य-कलाप को दूर से बड़े गौर से देख रहा था। मुझे नज़दीक जाकर उन्हें देखने की प्रबल इच्छा उबल पड़ी। मैं चलने वाला ही था कि तीन लम्बी और मंहगी गाड़ियां पप्पू की दुकान पर आकर लगी। मैं रुक गया और दुकान खाली होने की प्रतीक्षा करने लगा,पर इतनी दूरी पर अवश्य था कि पूरा मामला साफ-साफ दिखाई और सुनाई पड़ रहा था। उन गाड़ियों से कुल एक दर्जन लोग उतरकर दुकान के पास खड़े हो गए।उनमें से एक नेता जैसे बुजुर्ग ने पप्पू से कहा-‘बढ़िया पान लगाओ। सभी में गीली सुपारी,पिपरमिंट,किमाम और बढ़िया सुरती देना’। पप्पू ने जैसे ही उन कटे-छंटे पत्तों के ऊपर से कपड़ा हटाया तो पीले- सफेद होते उन पत्तों को उस नेता जैसे आदमी ने देखा। वह पूछ बैठा-‘पत्ता तो बड़ा बढ़िया मालूम होता है’। पप्पू को तो मानो इसी की प्रतीक्षा थी। पप्पू बोला-‘मालिक,खालिस बनारसी पत्ता है। हुज़ूर महीने भर सेंका है। पत्ते बड़े थे,इसलिए काटकर छोटा कर दिया है ताकि छोटी नज़ाकत भारी खिल्ली बनाई जा सके’।सभी लोग पान खाकर सफर के लिए पर्याप्त मात्रा में पान की खिल्लियाँ बंधवाकर साथ ले गए। उन लोगों से अच्छे और नायाब पान के पत्तों का जिक्र कर पप्पू चार गुना अधिक कीमत वसूल कर चुका था। उनके जाने के बाद मैं पप्पू की पान की दुकान पर आ धमका।देखा,सारे सड़े-गले पत्तों के काटे-छांटे टुकड़े उन लोगों के पान बनाने में खत्म हो गए थे। मैंने पप्पू से सहज भाव से पूछा-‘पप्पू,तुमने उन सड़े-गले पत्तों के टुकड़ों का इतना दाम क्यों लिया’? पप्पू ने भी बड़ी सरलता से उत्तर दिया-‘हुज़ूर, इन लोगों को देखते ही मैं समझ गया था कि ये लोग शौकिया पान खाने वाले हैं और इन लोगों को पान की तहजीब नहीं मालूम है। वे सब बड़े मालदार थे। धनी व्यक्ति कम कीमत लेने से पान को घटिया समझ जाता। कीमत से वह पान की गुणवत्ता खोज रहा था। इसी में मेरा सारा सड़ा माल भी निकल गया,लेकिन हुज़ूर,आप तो हर दिन हमारे यहां पान खाने वाले पुराने ग्राहक हैं।आपको पान खाने की,पत्ते की पूरी तहजीब और बातें मालूमात हैं,इसलिए आपसे झूठ नहीं बोल सकता’। मैं चुप रहा। पप्पू अब खालिस अच्छे और पुराने पान के पत्ते टोकरी से छाँटकर मेरे लिए पान लगाने लगा। तभी रामलाल जी आ गए। आते ही रामलाल जी ने कहा-‘क्या जी,दोपहर में अकेले आकर पान खा रहे हैं’! मैंने छूटते ही कहा-‘रामलाल जी,आप तो ऐसे ही वक्त के इंतज़ार में रहते हैं कि कोई परिचित पान की दुकान पर दिख जाए तो फौरन बिना समय गंवाए तेजी से पप्पू की दुकान की ओर लपक लेते हैं’।रामलाल जी खिलखिलाकर हंसने लगे।बोले-‘आपसे अच्छा मुझे कौन जानता है’। पप्पू तब तक हमदोनों के लिए पान लगा चुका था। हम लोग पान को थाली में सजा देख रहे थे। तभी रामलाल जी बोले-‘रामपुर में जो कोलियरी है न,उसके जीएम साहब सुबह मिले। वे कोलियरी में कवि सम्मेलन करवाना चाहते हैं,क्योंकि उनके मुख्य अतिथि उनके इडी साहब आने वाले हैं। उनकी पत्नी को कवि सम्मेलन पसन्द है। उन्होंने कहा कि मनोरंजन हो जाए। वे लोग पाँच लाख का बजट रखे हैं। टेंट,माइक,सजावट का ठेका मुझे मिल गया है। कवि-सम्मेलन के लिए अब सिर्फ दो लाख बचे हैं। हमने बीरेंद्र बाबू से सम्पर्क कर लिया है। वे कुछ चुटकुलेबाजी और तुकबन्दी वाले कवियों की व्यवस्था कर देंगे। उनको इसमें पच्चीस हजार खर्च होगा। बाकी हम दोनों आपस में बांट लेंगे। गम्भीर साहित्य न इन लोगों की समझ में आएगा और न मजदूर श्रोता-समूह को,इसलिए आपको नहीं बताया था’।
   मुझे तुरन्त ही पप्पू के पान छाँटने का दृश्य याद आ गया। रामलाल जी चले गए। साहित्य के लिए विषय छोड़ गए हैं।मैंने माधव बाबू से शाम को इस विषय पर चर्चा की। माधव बाबू ने गम्भीर मुद्रा में कहा-‘गम्भीर साहित्य पर कोई चर्चा नहीं करता। जो साहित्य के प्रति रुचि रखने-कहे जाने वाले आयोजकों को साहित्य मनोरंजन का साधन दिखाई देता है। उन अमीर लोगों को अपने धंधे के अलावा अन्य प्रकार के मनोरंजन के साधन चाहिए,जिससे उनकी मान्यता समाज में साहित्य के प्रति रुचि रखने वालों में हो,उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा की कुर्सी के आगे वाले दोनों पाँव साहित्य पर टिक जाए। बाकी गम्भीर साहित्य से उन्हें क्या लेना देना ? वे बीरेंद्र बाबू और उनके चेले-चपाटियों को ही साहित्य का पुजारी मानते हैं क्योंकि वे उनका मनोरंजन फूहड़ तरीके से ही सही,कर तो रहे हैं’।
       मेरी समझ में कुछ नहीं आया। मैं माधव बाबू की बातों पर सोच रहा था तभी बीरेंद्र बाबू आए। बोले-‘दादा,चलिए पान खाने चलते हैं’। मैंने बीरेंद्र बाबू को कहा-‘आज मन नहीं है’। बीरेंद्र बाबू चुपचाप चले गए। अब फिर से नए सिरे से माधव बाबू की बातों पर चिंतन कर रहा हूँ।
प्रशान्त करण
रांची(झारखण्ड)
परिचय : प्रशान्त करण की जन्मतिथि-छः जून उन्नीस सौ छप्पन तथा जन्म स्थान- मुज़फ़्फ़रपुर(बिहार)है। आप वर्तमान  में रांची स्थित रामेश्वरम कॉलोनी में भापुसे (अ.प्रा.)श्री राधेकृष्ण गार्डन के समीप निवासरत हैं। झारखण्ड राज्य के श्री करण ने स्नातक(प्रतिष्ठा),स्नातकोत्तर( वनस्पति शास्त्र)आरआई की भी शिक्षा (जमशेदपुर) प्राप्त की है। आपका कार्यक्षेत्र-पुलिस विभाग में सेवा और मौलिक हिंदी साहित्य लेखन है। सामाजिक क्षेत्र में आप बच्चों के लिए समर्पित भाव से कार्य करते हुए झारखण्ड इकाई के अध्यक्ष हैं। आपकी लेखन विधा-हिंदी काव्य और व्यंग्य लेख है। पुस्तक प्रकाशन में काव्य संग्रह-मत बाँध यहाँ अब तू मुझको(नई दिल्ली) आपके नाम है। बतौर सम्मान सराहनीय सेवा के लिए राष्ट्रपति पुलिस पदक एवं विशिष्ट सेवा के लिए राष्ट्रपति पुलिस पदक के साथ ही सराहनीय सेवा के लिए झारखण्ड पुलिस पदक-दो बार हासिल हो चुका है तो,विविध साहित्यिक मंचों से रचना प्रतिभा सम्मान,रजत रचना प्रतिभा सम्मान,शतकवीर सम्मान आदि भी प्राप्त हो चुके हैं।आपकी उपलब्धियाँ-स्नातक(प्रतिष्ठा)में स्वर्ण पदक और स्नातकोत्तर में विश्वविद्यालय के नए कीर्तिमान स्थापित करना है। प्रशांत करण के लेखन का उद्देश्य-समाज की समस्याओं-कुरीतियों को लेखन के माध्यम से समाज के सामने लाना और मिटाना है। 

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