महात्मा गांधी-`सच्ची शिक्षा`

निर्मलकुमार पाटोदी

इन्दौर(मध्यप्रदेश)

*****************************************************

सच्चा शिक्षित तो वही मनुष्य कहा जा सकता है,जो अपने शरीर को अपने वश में रख सकता हो…सच्चा शिक्षित वही है जिसकी बुद्धि शुद्ध हो,जो शान्त हो,जो न्यायदर्शी हो…जो दूसरों को आत्मवत समझता हो। अक्षर-ज्ञान की हमें मूर्ति-पूजा,अन्धपूजा नहीं करनी चाहिए। बहुत से लोग शिक्षा का सच्चा अर्थ ही नहीं समझते।

जो विद्या हमें मुक्ति से दूर भगा ले जाती हो वह त्याज्य है, राक्षसी है,अधर्म है।

शिक्षा को आजीविका का साधन समझकर पढ़ना नीच वृत्ति कही जाती है। आजीविका साधन तो शरीर है। पाठशाला तो चरित्र संगठन का स्थान है। विद्यार्थियों को यह पहले से ही जान लेना चाहिए कि हमें अपनी आजीविका को अपने बाहुबल से ही प्राप्त करना हैl देशी भाषा का अनादर राष्ट्रीय अपघात है।

माता का दूध पीने से लेकर ही जो संस्कार और मधुर शब्दों द्वारा जो शिक्षा मिलती है,उसके और पाठशाला की शिक्षा के बीच संगत होना चाहिए। परकीय भाषा से वह श्रंखला टूट जाती है और उस शिक्षा से पुष्ट होकर हम मातृद्रोह करने लग जाते हैं।

सन् १८६० से हमारा समय वस्तु-तत्वों को गृहण करने के बदले अँग्रेजी भाषा के अपरिचित शब्द और उनके उच्चारणों को रटने में ही नष्ट होता जा रहा है।

माता-पिता से हमें जो कुछ शिक्षा प्राप्त होती है,उसको आगे बढ़ाने के बदले हम उसे लगभग भूलते ही जा रहे हैं। इतिहास में इसका दूसरा उदाहरण ही नहीं मिलता। यह तो राष्ट्र के लिए भारी आफ़त है। सारे संसार भर में देख आइए,आपको यही दिखाई देता है कि,हर एक राष्ट्र में बच्चों को शिक्षा ऐसी ही दी जाती है,जिससे राज्यतंत्र आसानी के साथ चलाया जा सके। आज-कल तो ग़ुलाम और और नौकर ढालने के लिए शिक्षा दी जाती है। बालकों को स्वावलम्बी और जवानी में ही स्वश्रमी बनाने के लिए तो राष्ट्रीय शिक्षा ही देनी चाहिए। उच्च शाला,महाविद्यालय आदि में आरोग्य-वर्धक स्थानों पर सुशिक्षित,साहसी और नीतिमान शिक्षकों द्वारा प्राथमिक शिक्षा बालकों को दी जाने का प्रबन्ध किया जाए तो मुझे विश्वास है कि हम बहुत महत्व-पूर्ण काम करके दिखा सकते हैं। भारत में तो प्रत्येक घर विद्यालय नहीं,महाविद्यालय है। माता-पिता आचार्य हैं। इन आचार्यों ने अपना यह काम छोड़कर अपना धर्म ही छोड़ दिया है। बाहरी संस्कृति हम पहचान नहीं सकते। उसके गुण-दोष ठीक-ठीक रीति से नहीं जाने सकते। उसे तो हमने किराए पर लिया है,पर हम किराया कुछ भी नहीं देते,अर्थात हमने उसे चुरा लिया है। इस चुराई हुई संस्कृति से भारत का उद्धार कैसे हो सकता है! उपाधियाें के मोह से परीक्षा उत्तीर्ण करने को ही हमने आधार रखा। विद्यालय के विद्यार्थियों की परीक्षा उनके पुस्तक ज्ञान से नहीं,धर्माचरण से ही होगी।

        (सौजन्य-निकुपा)

Hits: 26

आपकी प्रतिक्रिया दें.