महिलाओं का मंदिर-प्रवेश

डॉ.वेदप्रताप वैदिक
गुड़गांव (दिल्ली) 
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केरल के सबरीमाला मंदिर के देवस्वम बोर्ड ने अचानक शीर्षासन कर दिया है। जब देश के सर्वोच्च न्यायालय ने सितंबर २०१८ में हर उम्र की औरत को मंदिर में प्रवेश की इजाजत दे दी थी,तब इस संचालन-मंडल ने तो उस निर्णय का विरोध किया ही,उसके साथ केरल की भाजपा और कांग्रेस ने भी उसकी धज्जियां उड़ा दीं। इन राजनीतिक दलों ने बड़ी बेशर्मी से अदालत के फैसले का विरोध किया,धरने दिए, प्रदर्शन किए और सभाएं की। हिंदुत्व की रक्षा के नाम पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठन भी इस पाखंड में फंस गए। इनमें से कोई भी यह नहीं बता सका कि रजस्वला महिलाओं (१० से ५० साल) का मंदिर में प्रवेश निषिद्ध क्यों है ? यदि वह इसलिए है कि मंदिर के देवता आयप्पा ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ हैं तो मैं पूछता हूं कि क्या उनका ब्रह्मचर्य इतना कमजोर है कि पवित्र भाव लेकर मंदिर आई पुजारिनों की उपस्थिति से वह भंग हो जाता है ? ऐसा नहीं हैं। यह शुद्ध पाखंड है। पत्थर की मूर्ति को क्या पता कि कौन औरत रजस्वला है और कौन नहीं ? इस पाखंड का केरल की मार्क्सवादी सरकार ने डटकर विरोध किया। उसने मंदिर-प्रवेश के समर्थन में लाखों महिलाओं की मानव-श्रृंखला खड़ी कर दी थी,लेकिन देश की राजनीति में इतनी गिरावट आ गई है कि किसी भी उल्लेखनीय नेता ने इस महिला अधिकार का समर्थन नहीं किया। भारत की राजनीति सिर्फ मत  और नोट कबाड़ने का धंधा बनकर रह गई है। सर्वोच्च न्यायालय में ६० से भी ज्यादा याचिकाएं इसलिए लगा दी गईं कि वह अपने फैसले पर पुनर्विचार करे। सबरीमला मंदिर के बोर्ड के इस ताजा फैसले ने इन याचिकाओं को पंचर कर दिया है। दो बहादुर महिलाओं ने पहले ही मंदिर-प्रवेश करके दिखा दिया है। अब १२ फरवरी से शुरु होने वाले कुंभम् उत्सव के मौके पर सैकड़ों-हजारों महिलाएं मंदिर प्रवेश करेंगी। केरल सरकार को सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम करना होगा और आशा करता हूँ कि हमारे हिंदुत्ववादी संगठन और राजनीतिक दल अपने दुराग्रह से मुक्त हो जाएंगे।
परिचय-डाॅ.वेदप्रताप वैदिक की गणना उन राष्ट्रीय अग्रदूतों में होती है,जिन्होंने हिंदी को मौलिक चिंतन की भाषा बनाया और भारतीय भाषाओं को उनका उचित स्थान दिलवाने के लिए सतत संघर्ष और त्याग किया। पत्रकारिता सहित राजनीतिक चिंतन, अंतरराष्ट्रीय राजनीति और हिंदी के लिए अपूर्व संघर्ष आदि अनेक क्षेत्रों में एकसाथ मूर्धन्यता प्रदर्शित करने वाले डाॅ.वैदिक का जन्म ३० दिसम्बर १९४४ को इंदौर में हुआ। आप रुसी, फारसी, जर्मन और संस्कृत भाषा के जानकार हैं। अपनी पीएच.डी. के शोध कार्य के दौरान कई विदेशी विश्वविद्यालयों में अध्ययन और शोध किया। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त करके आप भारत के ऐसे पहले विद्वान हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय राजनीति का शोध-ग्रंथ हिन्दी में लिखा है। इस पर उनका निष्कासन हुआ तो डाॅ. राममनोहर लोहिया,मधु लिमये,आचार्य कृपालानी,इंदिरा गांधी,गुरू गोलवलकर,दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी सहित डाॅ. हरिवंशराय बच्चन जैसे कई नामी लोगों ने आपका डटकर समर्थन किया। सभी दलों के समर्थन से तब पहली बार उच्च शोध के लिए भारतीय भाषाओं के द्वार खुले। श्री वैदिक ने अपनी पहली जेल-यात्रा सिर्फ १३ वर्ष की आयु में हिंदी सत्याग्रही के तौर पर १९५७ में पटियाला जेल में की। कई भारतीय और विदेशी प्रधानमंत्रियों के व्यक्तिगत मित्र और अनौपचारिक सलाहकार डॉ.वैदिक लगभग ८० देशों की कूटनीतिक और अकादमिक यात्राएं कर चुके हैं। बड़ी उपलब्धि यह भी है कि १९९९ में संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। आप पिछले ६० वर्ष में हजारों लेख लिख और भाषण दे चुके हैं। लगभग १० वर्ष तक समाचार समिति के संस्थापक-संपादक और उसके पहले अखबार के संपादक भी रहे हैं। फिलहाल दिल्ली तथा प्रदेशों और विदेशों के लगभग २०० समाचार पत्रों में भारतीय राजनीति और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर आपके लेख निरन्तर प्रकाशित होते हैं। आपको छात्र-काल में वक्तृत्व के अनेक अखिल भारतीय पुरस्कार मिले हैं तो भारतीय और विदेशी विश्वविद्यालयों में विशेष व्याख्यान दिए एवं अनेक अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। आपकी प्रमुख पुस्तकें- ‘अफगानिस्तान में सोवियत-अमेरिकी प्रतिस्पर्धा’, ‘अंग्रेजी हटाओ:क्यों और कैसे ?’, ‘हिन्दी पत्रकारिता-विविध आयाम’,‘भारतीय विदेश नीतिः नए दिशा संकेत’,‘एथनिक क्राइसिस इन श्रीलंका:इंडियाज आॅप्शन्स’,‘हिन्दी का संपूर्ण समाचार-पत्र कैसा हो ?’ और ‘वर्तमान भारत’ आदि हैं। आप अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों और सम्मानों से विभूषित हैं,जिसमें विश्व हिन्दी सम्मान (२००३),महात्मा गांधी सम्मान (२००८),दिनकर शिखर सम्मान,पुरुषोत्तम टंडन स्वर्ण पदक, गोविंद वल्लभ पंत पुरस्कार,हिन्दी अकादमी सम्मान सहित लोहिया सम्मान आदि हैं। गतिविधि के तहत डॉ.वैदिक अनेक न्यास, संस्थाओं और संगठनों में सक्रिय हैं तो भारतीय भाषा सम्मेलन एवं भारतीय विदेश नीति परिषद से भी जुड़े हुए हैं। पेशे से आपकी वृत्ति-सम्पादकीय निदेशक (भारतीय भाषाओं का महापोर्टल) तथा लगभग दर्जनभर प्रमुख अखबारों के लिए नियमित स्तंभ-लेखन की है। आपकी शिक्षा बी.ए.,एम.ए. (राजनीति शास्त्र),संस्कृत (सातवलेकर परीक्षा), रूसी और फारसी भाषा है। पिछले ३० वर्षों में अनेक भारतीय एवं विदेशी विश्वविद्यालयों में अन्तरराष्ट्रीय राजनीति एवं पत्रकारिता पर अध्यापन कार्यक्रम चलाते रहे हैं। भारत सरकार की अनेक सलाहकार समितियों के सदस्य,अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विशेषज्ञ और हिंदी को विश्व भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए कृतसंकल्पित डॉ.वैदिक का निवास दिल्ली स्थित गुड़गांव में है।

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