माँ कल्याणी

अवधेश कुमार ‘अवध’
मेघालय
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माँ दुर्गा,माँ सरस्वती है,माँ कल्याणी,काली।
दुश्मन जब भी आँख दिखाये हो जाती मतवाली॥
माता के पैरों में जन्नत,दिल है नेह समन्दर।
शिव बनकर वह भर लेती जग का दु:ख अपने अन्दर॥
पन्ना बन वह मातृभूमि पर,अपना लाल लुटाती।
राजवंश की रक्षा में,बेटा चंदन कटवाती॥
जब राधा ने दरिया में बहते बच्चे को पाया।
वात्सल्य की चरम शक्ति से ही पयपान कराया॥
अपरिणीता कुंती को कोई कैसे बिसराये।
सामाजिक मर्यादा पर अपनी संतान भुलाये॥
अवधपुरी की माताओं के,सम्मुख सभी अधूरे।
वन में भेज पुत्र को माँ ने,वचन किये सब पूरे॥
दोनों सुत को त्याग हुईं वो,बिना पुत्र की माता।
मातु सुमित्रा के सम्मुख श्रद्धा से सिर झुक जाता॥
जीजाबाई की शिक्षा है,वीर शिवा की थाती।
कहकर सुनकर सब माताएँ,आदर से इठलातीं॥
मातु हिडिम्बा ने सुपुत्र को,ऐसा पाठ पढ़ाया।
‘कमजोरों का साथ निभाना’,अद्भुत धर्म निभाया॥
पुतलीबाई ने मोहन से कहा कि,झूठ न बोलो।
बंदर-त्रय की उपादेयता,आओ मिलकर तौलो॥
परशुराम ने माता का सिर,क्षण भर में ही काटा।
पितृभक्ति माँ ने सिखलाई,माँ का सिर धड़ बाँटा॥
ध्रुव माता से अनुमति पाकर,की साधना ऐसी।
ईश्वर ने आ गोद उठाया,जग हो गया हितैषी॥
दुर्योधन माँ के कहने पर,अमल नहीं कर पाया।
केशव की लीला में उसने,अपने को मरवाया॥
माता की आज्ञा सुन अर्जुन,बाँट दिये निज नारी।
सकल ग्रंथ में नहीं मिलेगी,ऐसी पत्नी प्यारी॥
धन्य मातु जो मातृभूमि पर,अपनी गोंद लुटाती।
पाल पोसकर अपने सुत की,कुर्बानी करवाती॥
नमन शहीदों की माता को,नमन मातु की महिमा।
नमन यशोदा,गांधारी,सिय,नमन मातु की गरिमा॥
ईश्वर की अनुपम कृति होती,जग के भीतर नारी।
अपना सर्व समर्पण करके,बनती है महतारी॥
महतारी को सम्मुख पाकर,होता धन्य विधाता।
महतारी से मिलने वह सौ बार धरा पर आता॥
महतारी अनुसुइया ने तो तीन देव को पाला।
बच्चे की खातिर देती माता ही प्रथम निवाला॥
दुनिया की विपदा हर ठोकर,सह करके मुस्काती।
बच्चे की किलकारी में ही,स्वर्गिक सुख वो पाती॥
माता नर की हो या हो पशु-पक्षी,देव-निशाचर।
माता की महिमा के आगे,नत हैं सब सचराचर॥
अपनी सुध-बुध को खोकर ही,अपना सर्व लुटाकर।
नाम,रूप,वय खो देती है,अपना बच्चा पाकर॥
जाग-जाग गीले बिस्तर पर,बच्चा पाला करती।
बच्चे पर खुद को अर्पित कर,वह जीती या मरती॥
माता का पर्याय नहीं जग में है कोई दूजा।
सभी तीर्थ माँ के पग-तल में,माँ की कर लो पूजा॥
माँ ही गीता,माँ कुरान है,माँ ही गुरु की बानी।
‘अवध’ कहे कर जोड़ मातु ही,गुरु शिव शक्ति भवानी॥
हर साँस के साथ जपो माता का नाम सुहावन।
कट जाये त्रय ताप मातु का नाम ईश सम पावन॥
परिचय-अवधेश कुमार विक्रम शाह का साहित्यिक नाम ‘अवध’ है। आपका स्थाई पता मैढ़ी,चन्दौली(उत्तर प्रदेश) है, परंतु कार्यक्षेत्र की वजह से गुवाहाटी (असम)में हैं। जन्मतिथि पन्द्रह जनवरी सन् उन्नीस सौ चौहत्तर है। आपके आदर्श -संत कबीर,दिनकर व निराला हैं। स्नातकोत्तर (हिन्दी व अर्थशास्त्र),बी. एड.,बी.टेक (सिविल),पत्रकारिता व विद्युत में डिप्लोमा की शिक्षा प्राप्त श्री शाह का मेघालय में व्यवसाय (सिविल अभियंता)है। रचनात्मकता की दृष्टि से ऑल इंडिया रेडियो पर काव्य पाठ व परिचर्चा का प्रसारण,दूरदर्शन वाराणसी पर काव्य पाठ,दूरदर्शन गुवाहाटी पर साक्षात्कार-काव्यपाठ आपके खाते में उपलब्धि है। आप कई साहित्यिक संस्थाओं के सदस्य,प्रभारी और अध्यक्ष के साथ ही सामाजिक मीडिया में समूहों के संचालक भी हैं। संपादन में साहित्य धरोहर,सावन के झूले एवं कुंज निनाद आदि में आपका योगदान है। आपने समीक्षा(श्रद्धार्घ,अमर्त्य,दीपिका एक कशिश आदि) की है तो साक्षात्कार( श्रीमती वाणी बरठाकुर ‘विभा’ एवं सुश्री शैल श्लेषा द्वारा)भी दिए हैं। शोध परक लेख लिखे हैं तो साझा संग्रह(कवियों की मधुशाला,नूर ए ग़ज़ल,सखी साहित्य आदि) भी आए हैं। अभी एक संग्रह प्रकाशनाधीन है। लेखनी के लिए आपको विभिन्न साहित्य संस्थानों द्वारा सम्मानित-पुरस्कृत किया गया है। इसी कड़ी में विविध पत्र-पत्रिकाओं में अनवरत प्रकाशन जारी है। अवधेश जी की सृजन विधा-गद्य व काव्य की समस्त प्रचलित विधाएं हैं। आपकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी भाषा एवं साहित्य के प्रति जनमानस में अनुराग व सम्मान जगाना तथा पूर्वोत्तर व दक्षिण भारत में हिन्दी को सम्पर्क भाषा से जनभाषा बनाना है। 

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