माँ का बंटवारा

हेमेन्द्र क्षीरसागर
बालाघाट(मध्यप्रदेश)
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मातृ दिवस विशेष………………………………….

     माँ है तो हम हैं,हम हैं तो जहान है। माँ की छाँव से बड़ी  कोई दुनिया नहीं। माँ के चरणों में जन्नत है,और उस जन्नत की मन्नत सदा-सर्वदा हम पर आसीन है। माँ की बरकत कभी भेदभाव नहीं करती,वह समान रूप से सभी बच्चों पर बरसती है। माँ के लिए कोई औलाद तेरी-मेरी नहीं,बल्कि मेरी ही होती है। एक माँ के आंचल में सब बच्चे समा जाते हैं पर सब बच्चों के हाथों में एक माँ नहीं समा सकती, इसीलिए मेरी माँ-तेरी माँ की किरकिरी में माँ पराई हो जाती है। क्या माँ का भी बंटवारा हो सकता है! आज मेरी तो कल तेरी और परसों किसी की नहीं…। हालात तो बंटवारे की हामी भरते हैं, बानगी में वक्त के साथ-साथ खून का अटूट बंधन ममता के लिए मोहताज हो जाता है। माँ ‘बेटा-बेटा’ कहती है,और बेटा ‘टाटा-टाटा’ कहता है।
वाह! रे जमाना तेरी हद हो गई जिसने दुनिया दिखाई,वह सरदर्द होकर तोल-मोल के चक्कर में बेघर हो गई। यह एक चिंता की बात नहीं,वरन् चिंतन की बात है कि आखिर ऐसा क्यों और किसलिए हो रहा है ? इसका निदान ढूंढे नहीं मिल रहा है या ढूंढना नहीं चाहते हैं। चाहे जो भी,पर इस वितृष्णा में दूध का कर्ज मर्ज बनते जा रहा है,जो एक दिन नासूर बनकर मानवता को तार-तार कर देगा,तब हमें अहसास होगा कि माता,कुमाता नहीं हो सकती,अपितु सपूत कपूत हो सकते हैं।
बहरहाल,पूत के पांव जब पालने में होते हैं,तब से वो माँ-माँ की मधुर गुंजार से सारे जग को अलौकिक कर देता है। अपनी माँ  के लिए रोता है,बिलखता है और तड़पता है। माँ की गोद में बैठकर निवाला निगलता है। उसे तो चहुंओर मात्र दिखाई पड़ती है तो अपनी माँ,और माँ,माँ कहकर अपनी माँ पर अपना हक जताता है। यही ममतामयी माया माँ-बेटे के अनमोल रिश्ते का बेजोड़ मिलन है। लगता है यह कभी टूटेगा नहीं,पर काल की काली छाया इस पवित्र बंधन को जार-जार करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ती है। देखते ही देखते मेरी माँ,तेरी माँ और दर-दर की माँ बन जाती है।
दरअसल,जवान जब आधुनिक व भौतिकी उलझन में नफा-नुकसान का ख्याल करते हैं,तब बूढ़े माँ-बाप बेकाम की चीज बनकर बोझ लगने लगते हैं। जब इनसे कोई फायदा नहीं तो इन्हें पालने का क्या मतलब ? जिसने कोख में पाला,उसकी छाया बुरी है,इसी मानसिकता को अख्तियार किए तथाकथित बेपरवाह खुदगर्ज अपनी जननी को तेरी माँ-तेरी माँ बोलकर अपनी जिम्मेदारियों से छुटकारा चाहते हैं। वीभत्स चौथे पहर में पनाह देने के बजाय वृद्धाश्रम में ढकेल कर या कुढ़-कुढ़कर जीने के लिए हाथों में भीख का कटोरा थमा देते हैं। जहां वह बूढ़ी माँ मेरे बेटे-मेरे बेटे की कराहट में दम तोड़ने लगती है कि,कब मेरा बेटा आएगा और प्यार से दो बूंद पानी पिलाएगा।
हां! ऐसे कम्बखतों को फिक्र होगी भी कैसे! कि माँ के बिना जीना कैसा। जा के पूछे उनसे, जिनकी माँ नहीं है! वे तुम्हें बताएंगें कि माँ होती क्या है! और नसीब वाले भाई-भाई लड़ते हो कि माँ तेरी हैं,माँ तेरी है। यह कौन-सा इंसाफ है कि बचपन में माँ मेरी और जवानी में तेरी! तेरी नहीं तो फिर बूढ़ी माँ किसकी! अच्छा नहीं होगा कि माँ को हम अपनी ही रखें,क्योंकि माँ तो माँ  होती है,तेरी न मेरी। चाहे वह जन्म देने वाली हो,या पालने वाली कि वह धरती माँ हो। वह तो हमेशा बच्चों का दुःख हर लेती है और सुख देती है। तो क्या हम उस माँ को जिदंगी के अंतिम पड़ाव में बांट दें,या सुख के दो निवाले और मीठे बोल अर्पित कर दें। ये जिम्मेदारी अब हमारी है कि,पेट में सुलाने वाली माँ को पैरों में सुलाएं,या उसके पैरों को दबाएं। समर्पित, स्मरणित अभिज्ञान माँ के हिस्से नहीं होते,अपितु माँ के हिस्से में हम रहते हैं।

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