माँ का सपना

रितिका सेंगर 
इंदौर (मध्यप्रदेश)
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उसका जन्म भी पिंजरे में ही हुआ था,क्योंकि उसकी माँ के पंख बहुत सुन्दर थे,इसलिए उसे एक सैयाद नें पिंजरे में कैद कर लिया था। नन्हीं चिरैया ने हमेशा माँ को आसमान को निहारते देखा। नन्हीं-नन्हीं आँखें मटकाते पूछा-‘माँ वो क्या है ?’
माँ की आँखों में आँसू भर आए बोली-‘तुम्हारा आसमां बच्चे। तुम उड़ सकती हो खुले आसमां में। तुम्हारा शरीर अभी छोटा-सा है,मैं तुम्हें धक्का देकर बाहर निकालूंगी, खुले आसमां में सैर करने,पर बच्चे मेरी कुछ बात ध्यान से सुन। अपने- आप पर विश्वास रखना,अपना दाना खुद चुनना किसी के दानों के लालच में नहीं फंसना,वरना मेरी तरह उम्रभर की कैदी बन जाओगी।’
 ‘माँ…मुझे नहीं जाना बाहर…’ नन्हीं चिड़िया ने माँ की चोंच से चोंच मिलाकर कहा,लेकिन माँ अपनी बच्ची को आजाद परिंदा बनाना चाहती थी। उसका सपना खुले आसमां में उड़ना अपनी बच्ची को देना चाहती थी। ‘बस ध्यान रखना मेरी बात,नहीं आना किसी के प्रलोभन में…’ कहते-कहते आँखों में आँसू लिए धकेल दिया पिंजरे के बाहर। नन्हीं चिड़िया गिरी नहीं,  उड़ान भरना तो था उसका जन्मजात गुण..फुर्र करके उड़ गई और माँ आकांक्षाभरी नजरों से देखती रहीं।

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