माँ की ममता-विशेषताओं से परिपूर्ण

अवधेश कुमार ‘अवध’
मेघालय
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पुस्तक समीक्षा…………………………………. 

दक्षिण भारत में हिन्दी साहित्य का क्षेत्र प्राय: संकुचित माना जाता रहा है। डॉ. जयसिंह अलवरी जी जैसे अदम्य साहसी साधक कम ही मिलेंगे जो अभाव एवं विरोध के दो मुहाने के बीच दो-दो हाथ करते हुए भी साहित्य के चिराग को न सिर्फ जलाए रखते हैं,बल्कि उजाला भी विखेरते हैं। ऐसी ही असीमित श्रृंखला की एक दैदीप्यमान कड़ी हैं सशक्त कथाकार श्रीमती सरिता सुराणा। राजस्थान से मेघालय और फिर हैदराबाद के प्रगाढ़ अनुभव से अभिसिंचित इस लेखनी ने पन्द्रह कालजयी कथाओं का संग्रह ‘माँ की ममता’ के रूप में साहित्य जगत में अपनी प्रथम उपस्थिति दर्ज कराई है।
कहानी उस विमल सरिता की तरह होती है जिसमें उसके द्वीप का अक्स स्पष्ट देखा जा सके। सामाजिक विकृतियाँ, नैतिक गिरावट एवं विदूषकीय पक्ष सदैव जल तरंग बनकर अक्स की अस्मिता व अस्तित्व के साथ छेड़खानी करेंगे, जिनको नियन्त्रित करके ही वास्तविक छवि देखी जा सकती है।
पन्द्रह कहानियों का संग्रह ‘माँ की ममता’ एक नारी की पन्द्रह भूमिकाओं से जीवन्त है। वह नारी ही है जो माँ,बेटी, पत्नी,प्रेमिका,परित्यक्ता,परिवार की धुरी,वंश की संवाहिका,चाची,बुआ,नानी, दादी,भाभी,ननन्द,अबला एवं सबला आदि होती है। इन तमाम रूपों में दुरूह परीक्षा से आजीवन गुजरना पड़ता है दिन-प्रतिदिन। श्रीमती सुराणा की कहानियाँ हमारे घर, परिवार व समाज में नारी केन्द्रित भूमिकाओं से सरोकार रखती हैं।
अपनी आवश्यकताओं का गला घोंटकर माता-पिता बच्चों को महँगे कॉन्वेंट स्कूलों में पढ़ाते हैं,विदेश में भेजकर महँगी एवं उच्चस्तरीय शिक्षा देते हैं किन्तु संस्कार के अभाव में यही बच्चे घर को भूल जाते हैं। ‘स्नेह दीप’ एवं ‘कॉन्वेंट का बुखार’ कहानी की विषयवस्तु इसी पर आधारित है। ‘नई जिन्दगी’ में बिगड़ैल घर का बेटा दुर्घटना होने के बाद पत्नी को सखेद अपनाता है तो ‘चर्चा का विषय’ कहानी में एड्स पीड़ित प्रेमी के कुचक्र को जगजाहिर करती है उसकी प्रेमिका,  और ‘माँ मर गई’ में नशेड़ी के कुकर्मों से पूरा परिवार बिखर जाता है। पति और पुत्र रूपी दो पुरुषों के स्वार्थ एवं अहम के बीच फँसी लाचार औरत की कथा-व्यथा है ‘परित्यक्ता’,जबकि ‘सिन्दूर की कीमत’ देकर दहेज के दानवों को गिरफ्तार कराकर अपनी विधवा माँ को सम्हालती है एक नारी। ‘माँ की ममता’ कहानी उस औरत की है जिसे बेटा न पैदा करने के कारण घर से निकाल दिया जाता है,जबकि शादी से पूर्व माँ बनने की सजा माँ के साथ उसकी संतान भी भुगतती है जिसे समाज ‘नाजायज’ नाम देता है। ‘आतंकवाद की भेंट’ कहानी में एक सैनिक की लाचार विधवा का चरित्र है जिसे पूरा परिवार भी चलाना होता है और ‘नन्हा अंकुर’ आतंकवाद की सामाजिक परिणति है,जिसमें एक विद्यालयीन बच्चा जब घर आता है तो कुछ भी और कोई भी नहीं बचा होता। ‘तवायफ़’ कहानी में तवायफ कहलाने के लिए एक औरत तैयार नहीं है,क्योंकि पुरुष वर्ग बलात्कार भी करता है और औरतों पर तवायफ होने का ठप्पा भी लगाता है। एक संयुक्त परिवार में एक छोटी बहू,जिसका पति सीधा-सच्चा है,की नारियों द्वारा प्रताड़ना की कहानी  ‘अन्तर्द्वन्द्व’ है और ‘मुक्ति’ कहानी में एक नारी को दूसरी नारी ने ही बँधुआ मजदूरन बना रखा है,जिसकी मुक्ति भी एक नारी ही कराती है। आज की अन्तरराष्ट्रीय समस्याओं में धर्मान्तरण की समस्या भी प्रमुख है। ‘संशय के बादल’ कहानी में पृथक धर्मों के पति-पत्नी सिर्फ इसलिए संतान सुख से वंचित हैं कि बच्चा किस धर्म का होगा!
इन कहानियों में लेखिका कहीं भी नवोदित नहीं नजर आई। हर कहानी में लेखिका के स्थापित,अनुभवी व सजग रूप का आभास हुआ। स्त्री से सम्बंधित अति सूक्ष्म पहलू पर भी लेखिका की नजर पहुँची है और बहुत ही मखमली तरीके से व्यंग्य करना इस संग्रह की विशेषता है। कुछ कहानियों में समस्याओं का समाधान लेखिका ने आदर्श तरीके से निकाला है जिसे व्यावहारिक धरातल पचा नहीं पाता और नीति तथा उपदेश का पुट ज्यादा है और कथोपकथन यदा- कदा कुछ बड़े हो गए हैं। हर कलमकार अपनी ओर से सर्वोत्तम देना चाहता है और देता भी है किन्तु तय पर चले तो नयापन नहीं होता और ढर्रे से हटकर चलने में तय ही अछूता रह जाता है। इन दोनों के साथ एक साथ न्याय नहीं हो पाता,इसके बावजूद भी लेखिका की पैनी नज़र काफी हद तक न्याय करती दिखाई देती है। अधिकांश कहानियाँ स्त्री विमर्श से जुड़ी हैं,  किन्तु विशेषता यह है कि स्त्री के नकारात्मक पक्ष को भी नजरअंदाज नहीं किया गया है। पुरुषों को भी नायक के रूप में दिखाया गया है जो कि एक लेखिका की लेखनी से स्त्री विमर्श पर कम ही देखने को मिलता है। माता-पिता को समर्पित कहानी संग्रह ‘माँ की ममता’ लेखिका के स्व प्रकाशन में तेलंगाना से प्रथम संस्करण के रूप में २०१७ में प्रकाशित हुआ है। श्रीमती सुराणा की ‘माँ की ममता’ पुस्तक आधुनिक हिन्दी कहानियों में प्रथम पंक्ति में स्थान बनाने की सारी विशेषताओं से परिपूर्ण है। बस मेरा,आपका और हम सबका स्नेह अपेक्षित है ।
परिचय-अवधेश कुमार विक्रम शाह का साहित्यिक नाम ‘अवध’ है। आपका स्थाई पता मैढ़ी,चन्दौली(उत्तर प्रदेश) है, परंतु कार्यक्षेत्र की वजह से गुवाहाटी (असम)में हैं। जन्मतिथि पन्द्रह जनवरी सन् उन्नीस सौ चौहत्तर है। आपके आदर्श -संत कबीर,दिनकर व निराला हैं। स्नातकोत्तर (हिन्दी व अर्थशास्त्र),बी. एड.,बी.टेक (सिविल),पत्रकारिता व विद्युत में डिप्लोमा की शिक्षा प्राप्त श्री शाह का मेघालय में व्यवसाय (सिविल अभियंता)है। रचनात्मकता की दृष्टि से ऑल इंडिया रेडियो पर काव्य पाठ व परिचर्चा का प्रसारण,दूरदर्शन वाराणसी पर काव्य पाठ,दूरदर्शन गुवाहाटी पर साक्षात्कार-काव्यपाठ आपके खाते में उपलब्धि है। आप कई साहित्यिक संस्थाओं के सदस्य,प्रभारी और अध्यक्ष के साथ ही सामाजिक मीडिया में समूहों के संचालक भी हैं। संपादन में साहित्य धरोहर,सावन के झूले एवं कुंज निनाद आदि में आपका योगदान है। आपने समीक्षा(श्रद्धार्घ,अमर्त्य,दीपिका एक कशिश आदि) की है तो साक्षात्कार( श्रीमती वाणी बरठाकुर ‘विभा’ एवं सुश्री शैल श्लेषा द्वारा)भी दिए हैं। शोध परक लेख लिखे हैं तो साझा संग्रह(कवियों की मधुशाला,नूर ए ग़ज़ल,सखी साहित्य आदि) भी आए हैं। अभी एक संग्रह प्रकाशनाधीन है। लेखनी के लिए आपको विभिन्न साहित्य संस्थानों द्वारा सम्मानित-पुरस्कृत किया गया है। इसी कड़ी में विविध पत्र-पत्रिकाओं में अनवरत प्रकाशन जारी है। अवधेश जी की सृजन विधा-गद्य व काव्य की समस्त प्रचलित विधाएं हैं। आपकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी भाषा एवं साहित्य के प्रति जनमानस में अनुराग व सम्मान जगाना तथा पूर्वोत्तर व दक्षिण भारत में हिन्दी को सम्पर्क भाषा से जनभाषा बनाना है। 

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