माँ के कर्जदार हैं हम

अजय जैन ‘विकल्प
इंदौर(मध्यप्रदेश)
विशेष वरिष्ठ संवाददाता-(दैनिक स्वदेश समाचार-पत्र, इंदौर)
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मातृ दिवस विशेष…………………….

 

`माँ` यानी ईश्वर का ही अंश कहिए,या रूप मान लीजिए। दुनिया में शायद ही ऐसी कोई माँ होगी,जिसे अपनी संतान से अधिक किसी वस्तु से स्नेह होगा। जी हाँ,इसी माँ या जन्म और परिवार की भी `धुरी` माँ को सम्मान देने के लिए हर वर्ष मई के महीने में `मातृ दिवस` मनाया जाता है। ये आधुनिक समय का बाजार से पैदा हुआ उत्सव है,जिसमें थोड़ा ढोंग भी है। माँ तो पहले भी पूजनीय रही है और सदैव रहेगी,लेकिन बाजारवाद ने इसके भी मायने बदल दिए हैं। इतिहास के पन्नों को पलटने पर पता लगता है कि,इस दिन विशेष की उत्पत्ति उत्तरी अमेरिका में माताओं को सम्मान देने के लिए हुई थी। माँ का प्रभाव और सम्मान बढ़ाने के लिए पूरे विश्व के विभिन्न देशों में अलग-अलग तारीखों पर इसे हर वर्ष `मातृ दिवस` के रूप में मनाया जाता है। भारत में इसे हर साल मई महीने के दूसरे रविवार को मनाना तय है। इसी कड़ी में यह दिन इस बार भारत में 13 मई रविवार को मनाया जाएगा,यानी माँ को उस दिन विशेष मान दिया जाएगा।
भारत में मातृ दिवस का इतिहास देखें तो पता लगेगा कि,प्राचीन काल में ग्रीक और रोमन द्वारा पहली बार इसे मनाने की शुरुआत हुई। हालाँकि,`ममता रविवार` के रुप में इसे यूके में भी मनाया गया था। कुल मिलाकर आज के आधुनिक समय में ये दिन यानि `मातृ दिवस` का उत्सव सभी जगह व्याप्त हो चुका है। जानकारी के अनुसार अलग-अलग तारीखों पर दुनिया के लगभग 46 देशों में इसे मनाया जाने लगा है।
ग्रीक के प्राचीन लोगों की वार्षिक वसंत ऋतु पर अपनी देवी माता के लिए अत्यधिक प्रेम और समर्पण से आया यह दिन विशेष सीबेल (अर्थात् एक देवी माता) के लिए समर्पित था। इसी कड़ी में कुँवारी मैरी (ईशु की माँ) को सम्मान देने के लिए चौथे रविवार को ईसाईयों द्वारा भी `मातृ दिवस` मनाया जाता है,जबकि वर्ष 1972 में जूलिया वार्ड हौवे (कवि, कार्यकर्ता और लेखक) के विचारों द्वारा आधिकारिक कार्यक्रम के रुप में यूएस में इसे मनाने का फैसला किया गया। इसका जनक अन्ना जारविस को कहना गलत नहीं होगा,क्योंकि यूएस में `मातृ दिवस` (मातृ दिवस की माँ के रुप में प्रसिद्ध) के संस्थापक यही हैं,के रुप में जाने जाते हैंl यह अविवाहित महिला थी,पर माँ के प्यार-परवरिश से वो अत्यधिक प्रेरित थी। उनकी मृत्यु के बाद दुनिया की सभी माताओं को सम्मान और उनके सच्चे प्यार के प्रतीक स्वरुप एक दिन माँ को समर्पित करने के लिए इन्हीं की भावना थी।
देश भारत हो या कोई और,यदि हम माँ सहित पिता को भी मान दें तो यकीनन हमें इश्वर का आशीर्वाद बराबर मिलता रहेगा। साल में एक दिन के इस पर्व को भले ही हम मनाएं या नहीं,पर सभी को कहें कि,सालभर ही अपनी माँ की पूरी फ़िक्र करें। हालांकि,जो लोग अपनी माँ को बहुत प्यार करते हैं,ख्याल रखते हैं,वो इस खास दिन को विशेष रुप से लेते हैं। 1ये मौका `दिन विशेष` की तरह ही अब भारत में एक पर्व का रूप ले चुका है,लेकिन ताज्जुब तब होता है जब आज के आधुनिक समय में इस उत्सव को मनाने के लिए कई परिवार यानी बेटे काफी ढोंग करते हैं। इस नाटक यानी तरीके में माँ को मान कम और व्यस्तता अधिक दिखाई देती है। जब इंटरनेट की तकनीक के चलते कई बेटे इसी से अपनी माँ को पूज लेते हैं तो तरस आता है कि,जिस माँ ने उन्हें इतना काबिल बनाया,उसके लिए इस बेटे के पास थोड़ा-सा वक्त ही नहीं है। जब आपके पास इस रिश्ते के लिए ही समय नहीं है तो आप अपने बाकी के छोटे-बड़े रिश्तों के लिए कितना समय निकालते होंगे,कहने-समझने की जरूरत नहीं है। अगर हम अपनी माँ यानी जननी और ईश्वर को सचमुच सम्मान-आदर देना चाहते हैं,तो उनकी चिंता दिल से करनी होगी,दिमाग से नहीं,क्योंकि दिमाग कह देगा कि,क्या है माँ ही तो है,नहीं गया तो क्या फर्क पड़ेगा,फ़ोन या नेट से ही शुभकामना दे दो। इसके उलट आप दिल से सोचेंगे तो पाएँगे कि,माँ को धन और सुविधा से कहीं अधिक रिश्ता यानी संतान से प्रेम होता है। यदि ऐसे दिन विशेष पर भी भारत जैसे संस्कृतिप्रधान और परंपराओं वाले देश में किसी के लिए अपनी माँ पहली प्राथमिकता नहीं है,तो यह हालत वाकई बुरी है। जब हम `मातृ दिवस` के दिन भी माँ के लिए समय नहीं दे सकते हैं तो यकीनन यह भी भल जाते हैं है कि,उसने हमें प्यार, देखभाल,कड़ी मेहनत से यहाँ पहुँचने तक काबिल बनाया है। वो बिना पढ़ी-लिखी है तो वो केवल एक अशिक्षित माँ नहीं है,बल्कि हमारे जीवन में आदर्श,पहली शिक्षक और महान इंसान है। यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि,जीवन में माँ नहीं होती तो शायद हम भी नहीं होते। ज़रा सोचिए कि क्या माँ के बिना आप जीवन की कल्पना कर सकते हैं ? अरे यही तो वह शानदार प्रेरणापुंज और अप्रतिम कृति है जिसने आपको चलना सिखाया है,पेट भरा है,भले ही फिर खुद भूखी रही या कोई और तकलीफ झेली होगी। ऐसे में आपके कहे गए कडवे बोल ही नहीं,वरन समय-समय पर आपकी ओर से दिखाई गई बेफिक्री भी उसके मन-मष्तिष्क को तोड़ती है,वहीं अगर हम माँ से दो पल प्यार से बोल लेते हैं तो उसके और हमारे जीवन में प्यार-दुलार के झरने फूट पड़ते हैं,जो ख़ुशी दोनों के चेहरे पर दिखती है। इसलिए,`मातृ दिवस` के इस उत्सव से हम पूरे साल में केवल एक दिन भी मां को ख़ुशी दे पाएं तो उससे जन्म लेने की मानवीय संवेदनात्मक सार्थकता सिद्ध हो सकेगी। सालभर और इस दिन भी अपनी माँ के प्रति आभार जताकर उनके महत्व को समझाने से परिवार में संस्कारों का ऐसा बीज रोपिए,जिससे आदर और सम्मान के फल ही बरसें। सच मानिए,अगर आपने माँ की पूजा-सेवा कर ली और भगवान को छोड़ भी दिया तो उन्हें बुरा नहीं लगेगा,क्योंकि माँ भगवान् या किसी देवी की तरह है,जो अपने बच्चों को आशीष और स्नेह देकर भूल जाती है।इन्हें आपसे बदले में कोई सुविधा नहीं चाहिए,बस प्रेम ही पर्याप्त होगा। उनकी नजर में आप केवल बेटा-बेटी ही हो,वो हमसे केवल जिम्मेदार और अच्छा इंसान बनने की चाहत रखती हैं। जीवन में किसी को भी यदि स्वीकारना है तो मां को मत भूलिए। हमारी माँ हमारे लिए प्रेरणादायक और पथप्रदर्शक शक्ति का रुप है,जो हमें हमारी मंजिल की तरफ साहस और दुलार से आगे भेजती है,तब भी जब भले ही संतान मां की तरफ से मुंह फेर ले। यही अनुरोध करूंगा कि,आप भारत में हों तो कम-से-कम इस दिन का अपना समय माँ को समर्पित कीजिए,और बाहर हैं तो माँ से मिलने आ जाएं,क्योंकि-
`माँ ही संसार है,माँ ही प्यार है,
इसके बिना अधूरे हैं हम
ये न होती तो नहीं होता जन्म,
ये तो ईश्वर का उपहार है
यह नहीं मिलती दुबारा,
इसके कर्जदार हैं हम।`

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