माँ तो देना जाने है बस…

वकील कुशवाहा `आकाश महेशपुरी`
कुशीनगर(उत्तर प्रदेश)

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माँ कहती रहती है जिसको फूल फूल,बस फूल,
पंख निकल आए हैं जबसे,बना हुआ है शूलl

पेट काटकर जिसको पाला
जिसकी बांहें माँ की माला,
कितना बदल गया है देखो
माँ पर प्यार लुटाने वालाl
माँ के सारे उपकारों को समझे आज फिजूल-
पंख निकल आए हैं जबसे बना हुआ है शूलll

आलीशान महल है भाई
घरवाले भी झूम रहे हैं,
धुले-धुलाए फर्नीचर भी
इक-दूजे को चूम रहे हैंl
लेकिन माँ के मुखड़े पर तो जमी हुई है धूल-
पंख निकल आए हैं जबसे बना हुआ है शूलll

अंत समय में सपने सारे
तिल-तिल पल-पल टूट रहे हैं,
माँ के मधुर हृदय से लेकिन
शब्द दुआ के फूट रहे हैंl
माँ तो देना जाने है बस,करती कहाँ वसूल-
पंख निकल आए हैं जबसे,बना हुआ है शूलll

परिचय-वकील कुशवाहा का साहित्यिक उपनाम आकाश महेशपुरी है। इनकी जन्म तारीख २० अप्रैल १९८० एवं जन्म स्थान ग्राम महेशपुर,कुशीनगर(उत्तर प्रदेश)है। वर्तमान में भी कुशीनगर में ही हैं,और स्थाई पता यही है। स्नातक तक शिक्षित श्री कुशवाहा क़ा कार्यक्षेत्र-शिक्षण(शिक्षक)है। आप सामाजिक गतिविधि में कवि सम्मेलन के माध्यम से सामाजिक बुराईयों पर प्रहार करते हैं। आपकी लेखन विधा-काव्य सहित सभी विधाएं है। किताब-‘सब रोटी का खेल’ आ चुकी है। साथ ही विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन हो चुका है। आपको गीतिका श्री (सुलतानपुर),साहित्य रत्न(कुशीनगर) शिल्प शिरोमणी सम्मान(गाजीपुर)प्राप्त हुआ है। विशेष उपलब्धि-आकाशवाणी से काव्यपाठ करना है। आकाश महेशपुरी की लेखनी का उद्देश्य-रुचि है। 

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