माँ शारदे

केवरा यदु ‘मीरा’ 
राजिम(छत्तीसगढ़)
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मेरे ह्रदयांगन में माँ सरस्वती विराजती,
सुबह-शाम मैं माँ की उतारूँ आरती।
सुबह-शाम मैं माँ की उतारूँ आरती॥

नैनों से होकर आई मात मन मंदिर में,
गूँजे कविता गीत गज़ल मेरे आँगन में।
वरदहस्त सिर पर रख माँ है दुलारती॥
सुबह-शाम मैं माँ की उतारूँ आरती…

 

ज्ञानदायिनी सुख शान्ति प्रदायनी माँ अँबे,
वेद की माता विद्यादायिनी जगदम्बे।
जिव्हा मेरी बसी है माँ,गीतों को संवारती॥
सुबह-शाम मैं माँ की उतारूँ आरती…

 

मुझ अकिंचन पर हे मात कृपा करना,
प्रेम पुंज की स्वामिनी मात दया करना।
चरणों में आन पड़ी माँ दोऊ हाथ पसारती॥
सुबह-शाम मैं माँ की उतारूँ आरती…

श्वेत वर्णी माँ वागेश्वरी विमल मति दो,
चरणों में नित रहूँ अम्बिके वह गति दो।
दीन-हीन निबल विकलों को माँ उबारती॥
सुबह-शाम मैं माँ की उतारूँ आरती…

आँचल में अपने मुझे छुपा लो माँ,
जग की सताई हूँ मुझे अपना लो माँ।
तनया कहकर शारदे माँ पुकारती॥
सुबह-शाम मैं माँ की उतारूँ आरती…

 

मेरे ह्रदयांगन में माँ सरस्वती विराजती,
सुबह-शाम मैं माँ की उतारूँ आरती…॥

परिचय-केवरा यदु का साहित्यिक उपनाम ‘मीरा’ है। इनकी जन्म तारीख २५ अगस्त १९५४ तथा जन्म स्थान-ग्राम पोखरा(राजिम)है। आपका स्थाई और वर्तमान बसेरा राजिम(राज्य-छत्तीसगढ़) में ही है। स्थानीय स्तर पर विद्यालय के अभाव में आपने बहुत कम शिक्षा हासिल की है। कार्यक्षेत्र में खुद का व्यवसाय है। सामाजिक गतिविधि के तहत महिलाओं को हिंसा से बचाना एवं गरीबों की मदद करना प्रमुख कार्य है। भ्रूण हत्या की रोकथाम के लिए ‘मितानिन’ कार्यक्रम से जुड़ी हैं। आपकी लेखन विधा-गीत,ग़ज़ल सहित भजन है। १९९७ में श्री राजीवलोचन भजनांजली,  २०१५ में काव्य संग्रह-‘सुन ले जिया के मोर बात’,२०१६ में देवी भजन (छत्तीसगढ़ी में)सहित २०१७ में सत्ती  चालीसा का भी प्रकाशन हो चुका है। लेखनी के वास्ते आपने सूरज कुंवर देवी सम्मान,राजिम कुंभ में सम्मान,त्रिवेणी संगम साहित्य सम्मान सहित भ्रूण हत्या बचाव पर सम्मान एवं हाइकु विधा पर भी सम्मान प्राप्त किया है। केवरा यदु के लेखन का उद्देश्य-नारियों में जागरूकता लाना और बेटियों को प्रोत्साहित करना है। इनके जीवन में प्रेरणा पुंज आचार्यश्रीराम शर्मा (शांतिकुंज,हरिद्वार) व जीवनसाथी हुबलाल यदु हैं। 

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