माँ

लिली मित्रा
फरीदाबाद(हरियाणा)
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रोज़ की तरह शाम को नीलिमा,भाई के घर पहुंची। ‘डोर बेल’ बजाई।
दूसरी तरफ़ से मीरा ने दरवाजा खोला। वही भोली-सी चित-परिचित-सी मुस्कान लिए बोली-,’नमस्ते दीदी’,
नीलिमा ने भी जवाब देते हुए मुस्कुरा अंदर प्रवेश किया।
और सीधे माँ के कमरे की तरफ़ चल दी। माँ व्यस्त थी अलमारी से कुछ फाइलों के पुलन्दे में कुछ खोजने में।
नीलिमा ने पूछा-“क्या खोज रही हो माँ ?,,
एक ‘हूँ’ के स्वर के साथ वो फिर से लग गईं अपने खोज़ी अभियान में। नीलिमा ने फिर पूछा-“अरे! बता दो खोज क्या रही हो…?”
माँ ने खोजाई में धुत भाव में खोजती नज़रों से,उलट-पलट करते हाथों के साथ जवाब दिया-“एक एलआईसी की पाॅलिसी थी,जो जून १८ में पकनी है,उसको ही खोज रही हूँ।”
मैंने हंसते हुए कहा-“अभी कहाँ जून आ रहा ? बाद में खोज लेना”, और मीरा को आवाज़ देते हुए बुलाया,-ओ मीरा अच्छी वाली अदरक़ की चाय बना दो!!”
मम्मी चाय पी चुकी क्या ?”
मीरा बोली-“जी दीदी पी चुकीं।”
टाइम बंधा था एक मिनट भी टस से मस ना हो,चार बजते ही चाय का पानी चूल्हे पर चढ़ जाता था।
फिर ज्यों ही नीलिमा मम्मी से मुख़ातिब हुई,माँ बोल पड़ी-”
मिल गया!!!!!!!”
“आजकल कौन-सा समान कहाँ रख देती हूँ,याद ही नहीं रहता।” बोलकर परम इत्मीनान का भाव लिए ‘पालिसी’ के कागज को अलग-सी फ़ाइल में रख दिया। अलमारी बंद करके आकर बैठ गईं बिस्तर पर।
फिर बोलीं- “अब पता नहीं कितने दिन और जीना है ?
इस लड़के को तो कुछ पता है नहीं…
कहाँ-कौन-सा सामान रखा है ?
कहाँ खोजता फिरेगा…?
फिर मुझे काम सौंपते हुए बोलीं-
“ये एक एलआईसी पाॅलिसी है। जून में पकेगी,दादा को बता देना।”
और फिर अपनी फोन वाली डायरी लाकर उसमें से एक नम्बर निकाल बोली-”
ये नम्बर नोट कर लो,एक बार संजय अंकल(एलआईसी एजेन्ट) से तुम बात कर लेना,वो सब समझा देगें कैसे-क्या करना है ? तुम्हारे भाई से तो ये सब होगा नहीं। तुम बात करके समय से याद दिला देना।”
अलमारी खोलकर अपनी कुछ अच्छी साड़ियाँ दिखाते हुए बोलीं-“ये सब साड़ियाँ भी ले जाओ,यहाँ कोई नहीं पहनने वाला। तुम और मोनू(छोटी बहन) बाँट लेना,तुम्हारी भाभी को तो इन सब की कदर है नहीं।”
नीलिमा ने माहौल की गम्भीरता को थोड़ा कम करने के लिए,हँसते हुए बोला-
“क्यों मम्मी बात हो गई है क्या ऊपर से ??” बता दिया गया है क्या आपके जाने का समय ?”
और ज़ोर से हंस पड़ी…
माँ भी संग ठहाके मारते हुए बोली-“हाँ बस ज्यादा दिन नहीं हैं ?,जितना काम बोला है कर देना।”
नीलिमा फिर थोड़ा चुटकी लेते हुए बोली-“बाप रे! क्या मजाल हमारी जो आपके जाने के बाद आपका बताया काम ना करें!!!! आप छोड़ोगे क्या, सपने में आकर हड़काओगी-“क्यों लड़की काम नहीं किया अभी तक ?”
माँ भी ज़ोर से हंस पड़ी और बोलीं-“बड़ी नालायक हो तुम सब” और दोनों हँसने लगीं।
मीरा चाय ले आई थी तब तक।
नीलिमा चाय पीते हुए माँ के कार्यकलापों को देखती रही,और बातें चलती रहीं।
कुछ ना कुछ उनके हाथ करते ही रहते थे,खाली बैठना जैसे उन्हें आता ही नहीं था।
नीलिमा एक-डेढ़ घंटे बैठकर अपने बेटे को ट्यूशन से लेने चल दी।
जाते समय माँ सीढ़ी तक आती थीं और कल आने का वादा पक्का करवा कर वापस लौट जाती थीं।
यही हर रोज़ का नियम था। रोज़ नीलिमा के आने का इन्तज़ार,फिर कुछ काम सहेजे जाते थे। सारे दिन की उनकी दिनचर्या की बातें जिसमें उनके “हमारा सोमू”(उनका बेटा) की चिन्ता शामिल होती थी,के उनके ना रहने पर उसकी देखभाल कौन करेगा ?”
जिसे नीलिमा और मोनू उन्हें छेड़ते हुए कहते थे,-“मम्मी को तो बस “हमारा सोमू”ही नज़र आता है,हम दोनों बहन तो बाढ़ में बहकर आए हैं।”
आज चाय का कप लिए नीलिमा की आँखों से आंसू लुढ़क पड़े।
एक साल हो गए माँ को गुजरे,और सच में जून १८ की एलआईसी पाॅलिसी का जो काग़ज वो खोज रहीं थीं,उनका वो काम उसे ही करवाना पड़ा।
ऐसे ना जाने कितने कामों की लिस्ट उन्होंने पहले ही बना ली थी। नीलिमा और मोनू में काम का विभाजन भी कर दिया था। पोती की शादी में दिए जाने वाले गहने तक अलग कर वो मोनू को दे गईं थीं।
मीरा को भईया के नाश्ते से लेकर रात के खाने,उसके कपड़ों का रख-रखाव से लेकर रोज़मर्रा के हर उस काम के लिए ट्रेनिंग दे गईं थीं जो वे अपने रहते हुए खुद करती थीं।
सोच कर कभी-कभी नीलिमा हतप्रभ हो जाती थी। उनकी कर्त्तव्यपरायणता के बारे में,
“एक इंसान कैसे अपने सारे जीवन को व्यवस्थित कर,अपनी मृत्यु के बाद तक के अपने प्रियजन का जीवन भी व्यवस्थित कर जाने का भरसक और सफ़ल प्रयास कर जाते हैं!!”

परिचय- ब्लॉग पर भी लेखन में सक्रिय लिली मित्रा का निवास फरीदाबाद (हरियाणा)में है। आपने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर(राजनीति शास्त्र) किया है एवं लेखन तथा नृत्य के प्रति विशेष लगाव से कार्य निष्पादन करती हैं। लिली मित्रा की रचनाएं कई ऑनलाइन पत्रिकाओं में श्रेष्ठ रुपक एंव श्रेष्ठ ब्लाॅग के रुप में चुनी गई हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन काव्य,बाल कविताएं,कहानियां एवं लघुकथा के रुप में हो चुका है। श्रीमती मित्रा हिन्दी भाषा के प्रति स्वाभाविक आकर्षण रखती हैं। इनके अनुसार भावनाओं की अभिव्यक्ति साहित्य एवं नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत करने का यह आरंभिक सिलसिला है। इनकी रुचि नृत्य,लेखन,रसोई और साहित्य पाठन विधा में भी है। कुछ समय पहले ही लेखन शुरू करने वाली श्रीमती मित्रा बतौर गृहिणि शौकिया लेखक हैं। आपकी विशेष उपलब्धि में एक समूह द्वारा आयोजित काव्यलेखन स्पर्धा में दिल्ली के ‘एवान-ए-ग़ालिब’ में ‘काव्य शिखर’ सम्मान,ऑनलाइन वेबसाइट पर कई लेख ‘बेस्ट ब्लाॅग’ एंव ‘फीचर्ड’ सहित एक वेबसाइट पर दो बार ‘शीर्षस्थ कवि’ सूची में नाम आना है। लेखन विधा-स्वतंत्र सृजन,आलेख,बाल रचनाएं है। आपकी लेखनी का उद्देश्य हिन्दी भाषा के प्रति अनुराग है।

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