मां की चांदनी

सीमा व्यास 
इंदौर(मध्यप्रदेश)

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`मां,अब्बू खां तो मुस्लिम थे ना ! फिर उन्होंने अपनी बकरी का नाम चांदनी क्यों रखा ? आपने कभी पढ़ी है चांदनी की कहानी ? अब्बू खां वाली चांदनी की ?’ शाला का बस्ता पीठ से उतारते ही चांदनी रोज की तरह मां के सामने प्रश्नों की झड़ी लगाकर खड़ी हो गई।
`हां,हां पढ़ी है। मैं जब तेरी उम्र की थी,तब मेरी किताब में भी थी। मेरी पसंद की कहानियों में से एक है डॉ.जाकिर हुसैन की कहानी-अब्बू खां की बकरी। और चांदनी का भी कोई जाति-मजहब होता है भला ? चंदा की चांदनी तो आकाश से धरती तक छाई रहती है। उसका धर्म तो जाति-पाति से परे हर इंसान के मन को शीतलता देने का होता है। जैसे तू आती है तो मेरे मन को कितनी ठंडक पहुंचती है। तभी तो तू मेरी चांदनी है। अब्बू खां की चांदनी से भी प्यारी।’ आभा ने बेटी की शाला की गणवेश निकालते हुए कहा।
`मां,आपने मेरा नाम चांदनी रखा तो बताओ न मेरा धर्म क्या है ?’ चांदनी ने मां का हाथ रोककर पूछा।
`हर इंसान की तरह तेरा धर्म भी इंसानियत ही है। मैं चाहती हूं तू अच्छी इंसान बने और अपना हर ख्वाब पूरा करे चांदनी की तरह।’ आभा चांदनी के चेहरे को देखते हुए बोली।
`मां,आपको ये कहानी बहुत पसंद थी न,तो क्या चांदनी की तरह आप भी पहाड़ पर जाने के ख्वाब देखती थीं ?’ चांदनी ने मां के और करीब जाकर पूछा।
`हो बेटा। ख्वाब तो रोज ही देखती थी,पर अब्बू खां की तरह मेरे पिताजी ने कभी बाड़े की खिड़की खुली छोड़ी ही नहीं,जो मैं ख्वाब पूरे कर पाती।’ कहते हुए आभा खिड़की से बाहर देखने लगी।
चांदनी समझ गई अब मां पुरानी यादों में खो जाएंगी,जो उसे पसंद नहीं। उसने मां को वर्तमान में रखते हुए पूछा-`मां, आप चाहती हो ना मैं ख्वाब देखूं और उन्हें पूरा करूं ? तो क्या आप मेरे लिए बाड़े की खिड़की खुली रखोगी ?’
`अरी बावली,तेरे लिए तो खिड़की नहीं,पूरा दरवाजा खोलकर रखूंगी मैं। चल अब बातें बाद में करना,पहले हाथ-मुंह धोकर सैंडविच खा ले। अभी ही बनाकर रखे हैं।’ आभा ने चांदनी को रसोई में भेज दिया और खुद ख्यालों में खो गई।
सिर्फ तीन दिन की लड़की को आभा की सहेली ने मरते समय उसके हाथों में सौंप दिया था। उसके ससुरालवाले लड़की होते ही उसे सरकारी अस्पताल में छोड़ चले गए। प्रसव के बाद किसी कारण जब सहेली की तबियत खराब होने लगी,तब उसने आभा को याद किया। और उसके हाथों में बेटी सौंप लंबी यात्रा पर चली गई। तब आभा एक बेटे पार्थ की मां थी। उसके पति नीरव किसी जिम्मेदारी को लेना नहीं चाहते थे। आभा दुविधा में पड़ गई,बहुत मनाया पति को उस नादां,भोली-सी जान की खातिर। आखिर में नीरव इस शर्त पर राजी हुए कि बेटी की परवरिश आभा अकेले करेगी। उनसे किसी प्रकार की उम्मीद न रहे। वे सिर्फ पार्थ के पिता हैं।
पूरा भरोसा था खुद पर आभा को। उसने इस सहयोग के लिए भी आंखों में आंसू भरकर नीरव को धन्यवाद दिया और बेटी की आंखों में आंखें डालकर धीरे से कहा-‘मेरी चांदनी।` बस, उसी में अपना हर ख्वाब देखना जैसे आभा की आदत बन गई।
साल बीतते रहे,आभा दोनों बच्चों की जी-जान से परवरिश करती रही। चांदनी का महाविद्यालय का पहला साल था और सब सहेलियों ने शिमला जाने की योजना बनाई। चांदनी कई सालों से शिमला देखने की चाहत लिए थी। वहां की हरी-भरी वादियों में घूमना,पहाड़ों पर चढ़ना-उतरना,शीतलता को भीतर तक महसूस करना और भी कई सपने देखे थे उसने, पर घर में बात चली तो बड़े भाई पार्थ ने साफ मना कर दिया, `लड़कियां भी कहीं घूमने जाती हैं ? उन्हें तो घर में ही रहना चाहिए।`
`क्यों ? लड़कियां क्यों नहीं जाती घूमने ? वे नहीं जा सकती ऐसा कहां लिखा है ? और वे जाएंगी तो क्या उन्हें कोई भूत ले जाएगा ? लड़के दुनिया भर में घूमें और लड़कियां घर में रहें?` बिफर पड़ी चांदनी।
आखिर मां ने दोनों को समझाया,और चांदनी से वादा किया उसका ख्वाब पूरा करने में मदद करेगी। उसे शिमला भेजेगी, पूरी तैयारी के साथ।
पूरे एक हफ्ते चांदनी ने सब सहेलियों के साथ खूब सैर की। बर्फ से खेला,पहाड़ों पर उछल-कूद की। हरी-भरी वादियों में गाने गाए और बहुत सारी तस्वीरें खींची। तरह-तरह के स्वाद चखे। कई नए लोगों से मिली। कुछ अच्छे,कुछ बुरे,कुछ बहुत बुरे। रोज फोन पर मां को बताती,आज कितनी मस्ती की,किससे मिली,कहां घूमे। जी भरकर खरीददारी भी की।
लौटते समय उसे लगा सात दिन में सात साल की जिंदगी जीकर लौट रही है। तरोताजा हो गई है जीवन की अगली पारी खेलने के लिए।
लौटते समय ट्रेन की आरक्षित बोगी में भी कुछ लड़के जबरिया घुस आए। लड़कियों ने आपत्ति ली तो वे सीधे बन कुछ देर बैठने की अनुमति मांगने लगे। एक ने कहा-‘गलती से चढ़ गए हैं। अगले स्टेशन पर उतर जाएंगे।` लड़कियों ने इंसानियत के नाते बैठने दिया। शाम का समय था। ट्रेन के गति पकड़ते ही लड़कों ने छेड़छाड़ शुरू कर दी। वे लड़कियों की देह पर फब्तियां कसने लगे। जोर-जोर से अश्लील बातें करने लगे। विरोध करने पर भी नजदीक आकर बैठ गए। बोगी के अन्य यात्रियों ने भी उन्हें मना किया,पर वे धमकी देने लगे। दो लड़कों ने चाकू भी बताए। चांदनी साहसी थी,पर इन दुष्टों से कैसे निपटा जाए,उसे समझ नहीं आ रहा था।
उसने चलायमान(मोबाईल)से कुछ संदेश भेजा। लड़कों में से एक ने कहा-`यहां दूर-दूर तक कोई तुम्हारी आवाज सुनने वाला नहीं है। अच्छा होगा चुपचाप हमारी बात मान लो।` चाकू देखकर अन्य यात्री भी सहम गए थे। वे अब कुछ नहीं बोल रहे थे। चांदनी की सहेलियां तो रोने लग गई। चांदनी फुस-फुसाकर उन्हें समझा रही थी। हिम्मत रखो,कुछ नहीं होगा,पर उन लड़कों की हरकतें बर्दाश्त के बाहर थीं।
तभी ट्रेन धीमी होकर एक स्टेशन पर रूकी। वे दरवाजा बंद करना चाहते थे,तभी धड़ाधड़ पुलिस के जवान बोगी में चढ़े और कोई कुछ समझ पाता उससे पहले ही उन लड़कों को पकड़ लिया। उन पर हाथ साफ करते हुए उनसे चाकू जब्त किए। एक पुलिस अधिकारी ने पूछा-`आपमें से चांदनी कौन है ? उसी ने हमें `हेल्पलाइन` पर सन्देश किया था। संदेश मिलते ही हमने इन्हें पकड़ने की योजना बनाई।’
सबने चांदनी को आगे कर दिया। चारों तरफ से यात्री तालियां बजा रहे थे। पुलिस की गिरफ्त में लड़के चांदनी को हारे हुए भेड़िए की तरह दिख रहे थे। कुछ देर बाद ट्रेन फिर से चल पड़ी। अब सबकी जुबां पर चांदनी के साहस की बातें थीं। दूसरी बोगियों से यात्री आ-आकर चांदनी को बधाई दे रहे थे।
अपना शहर आने तक तो थाने से चांदनी के साहस की खबर मीडिया को भी लग गई थी। स्टेशन पर कई लोग हार लेकर चांदनी का सम्मान करना चाह रहे थे। चांदनी साधारण-सी लड़की से अचानक खास बन गई थी। मां उसे लेने स्टेशन आई,पर इतनी भीड़ हार लेकर किसका इंतजार कर रही है नहीं जान पाई।
ट्रेन के रूकते ही उसकी बोगी के सामने भीड़ लग गई। कोई उसे हार पहना रहा था,कोई आशीर्वाद दे रहा था। मां बहुत पीछे से देख रही थी। वह कुछ समझती,तभी एक मीडियाकर्मी ने माइक चांदनी के हाथ में पकड़ाते हुए पूछा- `चांदनी कैसे कर पाई उन गुंडों की मौजूदगी में इतने साहस का काम ?’
चांदनी ने पीछे खड़ी मां की ओर हाथ उठाते हुए कहा-`मेरी मां के कारण। मेरी मां ने अपनी चांदनी को ख्वाब देखना और उन्हें पूरा करना तो सिखाया ही,साथ ही राह के भेड़ियों को चकमा देना भी सिखाया है। मां की सीख के कारण ही आज मैं साहस का काम कर पाई।`
सब चांदनी को हार पहना रहे थे। मां के पास आते ही चांदनी ने मां के चरण छूकर एक हार उन्हें पहना दिया।

परिचय-सीमा व्यास की शिक्षा स्नातकोत्तर (हिन्दी, समाजशास्त्र )है। आपको सभी स्तरों के प्रशिक्षण मेन्युअल का निर्माण व विभिन्न विभागों व संस्थाओं में प्रशिक्षक के रूप में कार्य का २४ वर्ष का अनुभव है। पुस्तक प्रकाशन में कहानी संग्रह-‘क्षितिज की ओर’ आपके नाम है तो राष्ट्रीय स्तर के पत्र-पत्रिकाओं में ३०० आलेख व कहानियों का प्रकाशन हो चुका है। ४२ पुस्तिकाओं का प्रकाशन,आकाशवाणी द्वारा रूपक,कहानियों व १२ नाटकों का प्रसारण,तीन पटकथाओं पर लघु फिल्मों का निर्माण,किशोर-किशोरियों हेतु विशेष लेखन व उस पर फिल्म निर्माण,सिंहस्थ पर जानकारी हेतु फिल्म का पटकथा लेखन,दूरदर्शन हेतु नुक्कड़ नाटक की पटकथा लेखन सहित एक धारावाहिक में ५२ कड़ियों में सहलेखक के रूप में कार्य भी आपके अनुभव-उपलब्धि में शामिल है। सीमा जी को पुरस्कार में उत्तर प्रदेश से २ कहानियाँ पुरस्कृत होना है। सम्प्रति से आप इंदौर में कार्यक्रम अधिकारी हैं। मध्यप्रदेश के इंदौर स्थित योजना क्र. १४० में आपका निवास है।

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