मां

सुरेश जजावरा ‘सुरेश सरल’
छिंदवाड़ा(मध्यप्रदेश)
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ज्यों गगन में चमके सूरज
ज्यों निशा में चंद्रमा,
जैसे नदिया निःस्वार्थ बहती
वैसे ही पावन मेरी माँ।

जैसे उपवन का हो माली
जैसे बागों में बहार,
जैसे फूलों की हो खुशबू
जैसे बारिश की फुहार,
वैसे ही महके,वैसे ही बरसे मेरी मां।
जैसे नदिया…॥

जैसे मेघों का बरसना
जैसे बहती है हवा,
जैसे गहरे घावों पर
कोई मले ठंडी दवा,
वैसी ही ठंडी,वैसी ही प्यारी मेरी मां।
जैसे नदिया…॥

है दवाई की वो पुड़िया
है मिठाई की डली,
जैसे गर्मी का वो शरबत
जैसे पुरवाई चली,
वैसे ही शीतल,वैसी ही मीठी मेरी मां।
जैसे नदिया निःस्वार्थ बहती,
वैसी ही पावन मेरी मां…॥

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