माता-पिता का वयस्क बच्चों के साथ कैसा व्यवहार हो

डॉ.अरविन्द जैन
भोपाल(मध्यप्रदेश)
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माता-पिता को जितनी कठिनाई युवा बच्चों को संभालने में आती है,उतनी शायद किसी भी उम्र में बच्चों की परवरिश करने में नहीं आती। ये उम्र ही ऐसी होती है जहां सभी बच्चे एक बड़े बदलाव से गुजर रहे होते हैं। नए लोगों से मिलना,नई इच्छाएं,नई जगहों पर जाना और नए सपने देखना,ऐसे में मां-बाप जिस लाड़-प्यार से अपने बच्चे की परवरिश कर रहे होते हैं,उससे अलग वो अपनी किशोर अवस्था में बदल रहे होते हैं। इस उम्र में दोस्तों का,टीवी का और कई ऐसी चीजों का असर बच्चों के दिमाग पर पड़ता है,जो उनकी पहुंच से दूर होती है। उनका मन उसी ओर जाना जाता है जो उन्हें दिखाई देती है,लेकिन हाथ नहीं लग पाती। ऐसे में अभिभावक यही सोचते हैं कि,बचपन में समझदार और सुलझा हुआ हमारा बच्चा युवा होते-होते इतना अजीबो-गरीब व्यवहार क्यों करने लगता है ?
कई बार बच्चे के बदले व्यवहार को माता-पिता समझने और समझाने की कोशिश करते हैं,लेकिन ऐसा हो नहीं पाता है। अक्सर ऐसे हालात में माता-पिता और बच्चों के बीच दूरियां पैदा हो जाती है। आप कई बार सब-कुछ संभालने की कोशिश करते हैं,पर हालात आपके मुताबिक सुधर नहीं पाते। इस किशोर उम्र में आपका बच्चा खुद को आजाद समझने लगता है। इस उम्र में बच्चे अपने खुद के निर्णय लेना चाहते हैं। आपको अगर अपने बच्चे के साथ बेहतर रिश्ता बनाना है तो आपको अपने बच्चे को ठीक से समझना होगा। आइए जानते हैं कुछ नुस्खे जो किशोर और अभिभावकों के बीच एक अच्छा रिश्ता कायम करने में मददगार साबित हो सकते हैं।
इस उम्र में अक्सर ऐसा होता है कि,बच्चे आपकी कोई भी सलाह नहीं लेना चाहते। ये बुरा जरूर लगता है पर इस वक्त आपको बड़ी समझदारी दिखानी होगी। अपने बच्चे को वक्त दें, जब तक वो सही रास्ते पर है। अगर आपको लगे कि आपका बच्चा किसी गलत दिशा में जा रहा है तो तुरंत उसे सामने बिठाकर बात करिए।
इस उम्र में बच्चे अपने खाने-पीने, कपड़े,दोस्तों से लेकर सोने तक का समय तक खुद तय करना चाहते हैं। ऐसे समय में अपने बच्चे को कुछ बातों के निर्णय खुद लेने दें। कुछ बातों पर उन्हें प्यार से समझाएं कि उनका निर्णय लेने में आपका साथ कितना जरूरी है।
आज के समय में आपका बच्चा गलत आदतों का शिकार भी हो सकता है। उसे शराब,सिगरेट जैसी गलत आदत की लत भी लग सकती है तो ऐसे में जरूरी है कि आप उन्हें आजादी तो दें पर मर्यादा के अंदर। बाहर घूमने,देर रात घर आने जैसी बातों पर एक कड़ा नियम जरूर बनाएं। उसे अपनी जिंदगी में आजादी तो दें,पर अपनी पूरी देख-रेख में।
इस उम्र में अक्सर आपको और आपके बच्चे का विचार एक जैसा नहीं होता तो ऐसे में जरूरी है कि आप उन्हें किसी बात के लिए गलत तरीके से जबरदस्ती न करें। ध्यान से उनकी बात सुनें और उन्हें दोनों पहलूओं पर सोचने को कहें। उन्हें समझाने की कोशिश करें कि आप क्यों सही है और वो क्यों गलत।
ये बात ध्यान रखें कि वो अब छोटे बच्चे नहीं हैं,जिन पर आप अपनी मर्जी थोप सकें। उन्हें केवल तार्किक और भावनात्मक लगाव के साथ ही आप अपनी बातें समझा सकते हैं। मां-बाप बच्चे के सबसे पहले शिक्षक होते हैं। अगर आपका बच्चा गलत भी है तो भी आप उसे गुस्से में आकर नजरअंदाज न करें। उन पर अपनी नजर हमेशा बनाएं रखें। ऐसा करने से आप अपने बच्चे पर नजर भी बनाए रखेंगे और आपका
रिश्ता भी खराब नहीं होगा।
इस नाजुक उम्र में युवा वर्ग को जोश में होश नहीं होता और अनुभवहीनता के कारण कोई भी विवेकहीन निर्णय ले लेते हैं। जैसे आजकल विजातीय शादी का होना आम बात है। शादी पूर्व शारीरिक सम्बन्ध बनाना आम बात होती जा रही है। उसका कारण है कि आग और घी अधिक समय तक दृढ़ नहीं रहते,तो युवा वर्ग इतने नजदीक होने के कारण कब तक संयमित रह सकते हैं। दूसरा
मोबाइल और इंटरनेट संस्कृति ने उन्हें अब किसी भी बात या जानकारी से मुक्त नहीं रखा है। इस कारण जहाँ तक हो युवा भाई-बहिन को एक कमरे में न
सोने दें,और अधिक समय बाथरूम या अपने निजी कमरे में रहते हैं तो थोड़ा समय-समय पर उनकी गतिविधियों पर ध्यान रखना चाहिए। ध्यान रहे कि आर्थिक स्वतंत्रता के साथ स्वच्छंदता न हो पाए। संहेह न करें,पर गतिविधियों पर नज़र जरूर रखें। यदि उनका किसी के प्रति रुझान हो तो उस पर गंभीरता से विचार कर निर्णय में उनकी भागीदारी जरूर कराएं। उन पर कुछ थोपें नहीं, कारण आपका विरोध कोई भी गलत कदम पर उठाने को मजबूर कर सकता है। घर का वातावरण भी स्वस्थ्य रखें और उनको भाव व्यक्त करने का अवसर दीजिए,उन्हें दबाव में न रखें। याद रखिए-एक क्षण की भूल,जिंदगी भर के लिए गुनाहगार बना देती है।

परिचय- डॉ.अरविन्द जैन का जन्म १४ मार्च १९५१ को हुआ है। वर्तमान में आप होशंगाबाद रोड भोपाल में रहते हैं। मध्यप्रदेश के राजाओं वाले शहर भोपाल निवासी डॉ.जैन की शिक्षा बीएएमएस(स्वर्ण पदक ) एम.ए.एम.एस. है। कार्य क्षेत्र में आप सेवानिवृत्त उप संचालक(आयुर्वेद)हैं। सामाजिक गतिविधियों में शाकाहार परिषद् के वर्ष १९८५ से संस्थापक हैं। साथ ही एनआईएमए और हिंदी भवन,हिंदी साहित्य अकादमी सहित कई संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। आपकी लेखन विधा-उपन्यास, स्तम्भ तथा लेख की है। प्रकाशन में आपके खाते में-आनंद,कही अनकही,चार इमली,चौपाल तथा चतुर्भुज आदि हैं। बतौर पुरस्कार लगभग १२ सम्मान-तुलसी साहित्य अकादमी,श्री अम्बिकाप्रसाद दिव्य,वरिष्ठ साहित्कार,उत्कृष्ट चिकित्सक,पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी() आदि हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-अपनी अभिव्यक्ति द्वारा सामाजिक चेतना लाना और आत्म संतुष्टि है।

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