मानसिक प्रदूषण ही पर्यावरण प्रदूषण

डॉ.अरविन्द जैन
भोपाल(मध्यप्रदेश)
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एक सर्वेक्षण के अनुसार हमारे देश में कई शहर विश्व में सबसे प्रदूषित हैंl यह हमारे विकास-प्रगति का द्योतक है और होना भी चाहिएl विकास मनुष्य के विनाश पर आधारित होना क्या जरुरी है,कौन नियमों का पालन कराएगाl देश में नियम -कानून का राज नहीं है,हां यहाँ `लाओ और आदेश ले जाओ`का पाल हो रहा हैl जैसे माचिस की तीली पहले खुद जलती है,फिर दूसरे को जलाती हैl दूसरा जले या न जले,पर वह स्वयं जलता हैl हम इतिहास पुरुष कालिदास की परम्परा का निर्वाह कर रहे हैं, जिस डाली पर बैठे हैं उसी को काट रहे हैंl इस प्रकार हमारा भविष्य दूषित,प्रदूषित,विकलांग और बीमार निश्चित ही होगाl
सब जानवर और पशु-पक्षी आराम से अपना जीवन यापन कर रहे थे,और जिसका जहाँ निवास था,रह रहे थेl न उनमें कुछ संचय करना,न वाहन और न खाने की चिंता-रखने की चिंता ,न बैंक,न लेन-देन की झंझट थीl मनुष्य भी बुद्धिमान जानवर है, कारण ईश्वर ने बुद्धि दी हैl इस बुद्धि के कारण ही हमारे ऋषियों- मनीषियों ने इतने ग्रन्थ लिखे और मानव को समझाने ही में
लगे रहेl आज भी सब नियम-कानून मानव के लिए बने हैंl हां,पशु पक्षियों,पेड़ों,नदियों-पहाड़ों के बचाव और संरक्षण के लिए भी कानून बने,न कि उल्लंघन के लिएl जानवरों,पशुपक्षियों के लिए कहीं भी गोदाम नहीं बने और न वृक्ष ने अपने फसल के लिए भी ऐसा कुछ कियाl
विगत २५ वर्षों में जब से व्यापार का खुलापन हुआ,बैंकों ने
सुगम ऋण देना शुरू किया और स्वाभाविक रूप से आर्थिक सम्पन्नता आई है,तब से हमारे मष्तिष्क में दूषित भाव आया और हम भौतिकवादी हो गएl इसके साथ हम प्रकृति से दूर होते गएl हमने स्वयं अपनी मुसीबतों को आमंत्रण दियाl
व्यक्ति को प्रगतिशील,आधुनिकतावादी होना चाहिए,तथा उसे जीवनोपयोगी हर सामग्री का उपयोग और उपभोगकर्ता होना चाहिए,इससे कोई इंकार नहीं करता,पर एक सीमा मेंl आज हमने हर सीमा को असीमित कर दिया हैl धन का अधिक होना मनुष्य
को एकांगी और एकान्तवादी बना देता हैl धन ने सबको बाँट दिया है और अब सब स्व केन्द्रित होते जा रहे हैं,इसका मुख्य कारण आवश्यकता हैl शहर आज इतने विशालतम होते जा रहे हैं कि नौकरीपेशा,व्यापारी,शाला-महाविद्यालय और संस्थान इतने दूर हो गए कि,हमें वाहनों का उपयोग जरुरी हो गया हैl इसी प्रकार आर्थिक समृद्धि से हर परिवार के सदस्य का निजी मकान,बंगला होना भी आवश्यक हैl समृद्धि के कारण हमारा रहना बहुत उच्च कोटि का होने से हमने जंगलों का दोहन किया,यानि बेतहाशा जंगलों की कटाई की,जिससे हमारे घर का फर्नीचर बना,पेड़ों के कटने से पशु पक्षियों की सुरक्षा घटीl
इसको हमने स्व केन्द्रित रखकर दूसरे से अपेक्षा की, वह नियमों का पालन करे,मैं तो कर रहा हूंl धन सम्पन्नता ने हमको उच्चतम दर्ज़े का स्वार्थी बनाया और हमारे देश में कानून का कोई विशेष अर्थ नहीं रहता है,इसलिए धन सम्पन्न अपनी प्रतिष्ठा के अनुरूप अपनी भौतिक सामग्री का संचय करता है उसके पास कोई सीमा नहीं होतीl एक घर में अनेक वाहन होना
उनकी प्रतिष्ठा का सूचक हैl होना भी चाहिए,पर अब प्रदूषण होने पर रोना क्यों आ रहा है ? इस प्रदूषण,जो दिल्ली और उसके आसपास के अलावा सम्पूर्ण विश्व में इसका प्रभाव है,का मूल कारण क्या है या क्या हो सकता है,इसको समझने की जरुरत हैl यह हमारे मन की उपज हैl हमने अपने मन को अपने शरीर और भावनाओं पर इतना अधिक प्रभावशाली बना लिया है कि,उसके प्रभाव से वंचित न होकर उसके गुलाम हो गए हैंl
हमने अपने आपको अमर्यादित भी बना लिया है, जबकि हमने अपने संस्थान को लिमिटेड बनाया क्यों ? हम खाने-पीने में,वाहन चलाने में सीमा क्यों रखते हैं ? कारण हमें ज़िंदा रहना है,पर हमारी अनियमितता या असीमितता से हमने कितने जंगल,पशु-पक्षियों को मारा और उजाड़ा,इसका दर्द
हमको नहीं होता है,क्योंकि हम हृदयहीन हो गए हैं,स्वार्थी हो गए हैंl हमने अंधाधुंध पेट्रोल,डीज़ल,वातानुकूलन आदि के साथ फैक्ट्री से उगलने वाला धुआं और जहरीले गैसों के कारण अकारण अनेक बीमारियों और बुराइयों को आमंत्रण दिया हैl हमारा दायित्व यह नहीं है कि,हम प्रकृति से जितना लेते हैं,उसमें कुछ नहीं दे सकते तो बचाव तो कर सकते हैं,क्योंकि हमारे पास प्रकृति को देने की क्षमता नहीं हैl क्या हम काटे वृक्ष को उगा सकते हैं,नहीं तो नए लगा सकते हैं और जो जीवित हैं उनका संरक्षण कर सकते हैंl पशु-पक्षियों को मारने का अधिकार हमारे पास सुरक्षित है,पर एक जीव को जन्म नहीं दे सकते तो बचा भी तो सकते हैंl
हमने स्वयं अपना मष्तिष्क इतना अधिक प्रदूषित कर रखा है कि,हम दिन-रात क्रोध,मान,माया,लोभ,हिंसा,झूठ,चोरी, कुशील,परिग्रह आदि से घिरे हुए हैंl हमने संसार जैसी गन्दगी अपने दिमाग में भर रखी हैl
`दिपे चाम चादर मढ़ी,हांड पींजरा देह,भीतर या सम जगत में और नहीं घिन घेवl`
यानी हम सिर्फ बाह्य आवरण के कारण भटक रहे हैं,पर भीतर वैसी ही गंदगी भरी पड़ी हैl आज जरुरत इस बात की है कि,हम सब इस संसार की एक इकाई है तो सबका यह अमूल्य सहयोग इस विपत्ति के समय होना चाहिएl जो जिस जगह जिस
स्थान पर है,वह प्रकृति,जंगल,पशु-पक्षी के साथ मानव का भी हित देखेl मानसिक प्रदूषण का ही कारण है कि,इंसान बलात्कार ,हत्या,चोरी आदि के कामों में संलिप्त हैl इसके अलावा वाहनों का अधिक उपयोग,कारखानों से प्रदूषित और रासायनिक गैसों का निकलना,अधिकतम विद्युत का उपयोग एवं हमारा खान-पान भी प्रदूषित हैl आज वर्तमान में कितने-कितने प्रकार के रोगों से ग्रस्त हो चुके हैं,बच्चों को तो ये बीमारियां उपहार में मिल रही हैंl अदृश्य वातावरण हमें कैसे-कैसे रोगों के आगोश में ले रहा है,और हम बेगाफ़िल हैंl इसमें सरकार,प्राधिकरण या और कोई कुछ नहीं कर सकता हैl कानून का डंडा नहीं चलने वाला है,यह है नैतिकता ,सभ्य नागरिक के गुणों का पालन करने से ही सुधार होगाl आज इस प्रदूषण के कारण सैकड़ों मानव मर रहे और लाखों पक्षियों ने प्राण त्याग दिए तो लाखों वृक्षों के ऊपर ऐसी परतें जम गई कि, उन्हें भी सांस लेने में तकलीफ हो रही है,पर वे बताएं किसे और कौन सुनेगा ? पशुओं की हालत और गंभीर हैl इस प्रकार मानसिक प्रदूषण ने न केवल मानव को,वरन सम्पूर्ण सृष्टि
को अपने में समेट लिया हैl अभी भी समय है कि अपनी नैतिक जिम्मेदारी को समझते हुए प्रयास किया जाए,अन्यथा हम भी खतरे में हैंl हम सूक्ष्म जहर से ग्रसित हो चुके हैं-
`देखो-समझो पहले पर पीड़ा को,
जब तक हमें नहीं आएगी सहानुभूति
तब तक कुछ नहीं होगा,
कारण सहानुभूति हम दिखाते और
समानुभूति में हम भोगते हैं,
दिखाने और भोगने में बहुत अंतर हैं बाबू
सरकार जो करेगी वह सबके लिए होगा,
पर जो तुम भोगोगे,उसे तुमको ही भोगना होगा
पशु-पक्षी वृक्ष-नदियां मिटटी हवा पानी देती सब,
पर हम इनको नहीं बना सकते अब
हाँ,यह अत्याचार चलता रहा तो,
हमको प्रकृति में मिल जाने रहना होगा तैयार
कितना कृत्रिम हो चला हमारा जीवन,
प्रकृति की बाँहों में आकर समाओ
मन को बनाओ दोष मुक्त,
तभी वातावरण होगा दोष मुक्तl`

परिचय- डॉ.अरविन्द जैन का जन्म १४ मार्च १९५१ को हुआ है। वर्तमान में आप होशंगाबाद रोड भोपाल में रहते हैं। मध्यप्रदेश के राजाओं वाले शहर भोपाल निवासी डॉ.जैन की शिक्षा बीएएमएस(स्वर्ण पदक ) एम.ए.एम.एस. है। कार्य क्षेत्र में आप सेवानिवृत्त उप संचालक(आयुर्वेद)हैं। सामाजिक गतिविधियों में शाकाहार परिषद् के वर्ष १९८५ से संस्थापक हैं। साथ ही एनआईएमए और हिंदी भवन,हिंदी साहित्य अकादमी सहित कई संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। आपकी लेखन विधा-उपन्यास, स्तम्भ तथा लेख की है। प्रकाशन में आपके खाते में-आनंद,कही अनकही,चार इमली,चौपाल तथा चतुर्भुज आदि हैं। बतौर पुरस्कार लगभग १२ सम्मान-तुलसी साहित्य अकादमी,श्री अम्बिकाप्रसाद दिव्य,वरिष्ठ साहित्कार,उत्कृष्ट चिकित्सक,पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी() आदि हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-अपनी अभिव्यक्ति द्वारा सामाजिक चेतना लाना और आत्म संतुष्टि है।

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