मामा रे मामा !

कीर्ति राणा
इंदौर(मध्यप्रदेश)
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मप्र में शिवराज के रथ के पीछे बच्चे मामा-मामा कहते दौड़ लगाते रहे और इधर कार्तिकेय के मामा कब शिव-साधना के स्नेह बंधन तोड़ माया मोह के जादुई कालीन पर बैठकर कांग्रेस के कमल में खदान,टेंडर,मोहमाया के रिश्ते तलाशने लग गए,इसकी भनक जीजी और जियाजी तक को नहीं लगी। ऐसा संभव तो नहीं कि घर में बन रहे देशी घी के पराठे से पूरी ग्वाड़ी (चाल) महकने लगे और घर के सदस्य कहें कि हमें तो खुशबू ही नहीं आई…!
भाजपाई कैलाश विजयवर्गीय ने एक दिन पहले प्रेम-पुचकार से जिन बाप-बेटे के गले में भगवा दुपट्टा डाला था, उस धमाके पर कांग्रेसी कमलनाथ ने मसानी वाला गीला कंबल डाल दिया।
देखा जाए तो संजय को साथ लाकर कमलनाथ ने कई निशाने साधे हैं। महाकौशल में कांग्रेस को कितनी मजबूती मिलेगी,यह वक्त तय करेगा लेकिन बालाघाट के बारासिवनी से संजय को चुनाव जितवाकर अब शिवराज परिवार से चुनाव पूर्व के हिसाब चुकते करने में मदद मिलेगी। प्रेमचंद गुड्डू के पैर में बंधे काले डोरे की गठान दिग्विजय सिंह ही खोल सकते हैं,इसके जबाव में संजय मसानी को कांग्रेस में लाकर कमलनाथ ने कैलाश-दिग्गी की अदृश्य प्रेम कथा में संजय मसानी के किरदार को शामिल कर कहानी में बीस साल बाद जैसा ट्विस्ट दे दिया है जिसमें हर किरदार पर शक होता कि खूनी पंजे वाला यही होगा।
संजय मसानी नामक शख्स का भाजपा की राजनीति में कार्यालय की  प्रेस विज्ञप्ति लगाने वाले भृत्य जितना भी योगदान नहीं है,इससे जान सकते हैं कि उनके भाजपा छोड़ने से भूचाल नहीं आने वाला है। मसानी दल के प्रति वफादार रहे भी होंगे तो अपने स्वार्थों की पूर्ति होने तक। हाँ,उनके इस कदम से बहन साधना के विश्वास के धागे टूट गए हैं,शिवराज जीजा और भांजे कार्तिकेय के लिए ये मामा महाभारत के पात्र समान हो गया है। अभिनेता अक्षय कुमार के मप्र में कार्यक्रम  कराने से लेकर ‘टॉयलेट एक प्रेमकथा’  और ‘पेडमेन’ के लिए वित्तीय व्यवस्थापक के रूप में यदि सारी खुदाई एक तरफ वाले हालात बनते रहे तो उसके पीछे शिवराज मंडली की सदाशयता भी रही है। दस-बारह साल पहले तक गोंदिया निवासी इस युवक ने दिलीप बिल्डकॉन के मुकाबले अपना साम्राज्य खड़ा किया तो (कथित) सख्त अफसर कहे जाने वाले प्रमुख सचिव की सदाशयता दर्शाना भी है। आज तक लोग अपने काम कराने के लिए इनका तोड़ नहीं तलाश सके और संजय आँख-कान बन जाए तो यह सीएम हाउस के प्रति आदरभाव का ही तो प्रतीक है।
गोंदिया का यह साधारण-सा युवक देखते देखते खदानों का मालिक हो जाए,प्रशासनिक अधिकारियों वाले  क्लब की महफिलों में बड़े-बड़े अधिकारी कुर्सी देने लगें तो यह सीएम हाउस की अदृश्य शक्ति बिना संभव नहीं है। दिल्ली से भोपाल तक जो पंच लाईन ‘ना खाऊंगा न खाने दूंगा’ अब व्यंग्य मानी जाने लगी है तो मसानी या कहीं अंबानी ही मूल में रहे हैं।
भोपाल में तो दल के लोग ही मजाक में कहा करते थे सीएम स्तर का कोई अटक रहा हो तो संजय भैया से पहचान निकाल लो,पर ये भैया इस तरह कमलनाथ से पहचान बढ़ा लेंगे और पूरे परिवार को उन बड़े नेताओं की नजरों में और छोटा कर देंगे,यह तो सपने में नहीं सोचा होगा। एक तो पहले ही पीएमजी से लेकर मोटाभाई तक प्रदेश में आते ही मुँह फुलाने वाली शैली में गुलदस्ता स्वीकारने की रस्म पूरी करते हैं,रही-सही कसर मसानी ने पूरी कर दी। कमलनाथ खुद बड़े उद्योगपति हैं,इसलिए संजय मसानी के इतिहास और भविष्य की उनकी महत्वाकांक्षाओं का आंकलन नहीं किया हो यह संभव नहीं पर उन्हें हाथों-हाथ कैलाश के प्रेमचंद दांव का जवाब देना था और रावण की हार में विभीषण की भूमिका वाला रामायण का चर्चित प्रसंग रामानुरागी भाजपा को भी याद दिलाना था,तो दिग्गी राजा को भी बताना था कि जब वे राजनीति में अर्जुन सिंह की अंगुली पकड़ कर आगे बढ़ रहे थे उसके पहले से केन्द्र में इंदिराजी के साथ ही संजय गांधी की कथित चौकड़ी में उनकी (कमलनाथ की) भी खास जगह थी। यही नहीं ज्योतिरादित्य को भी संदेश दिया है कि चॉकलेटी नायक होना अलग बात है लेकिन राजनीति के मैदान में हर तरह के दांव-पेंच आना जरूरी है।
संजय मसानी के कांग्रेस प्रवेश से भाजपा की अपेक्षा शिवराज को अधिक नुकसान होना है। शिवराज की प्रशंसा इसलिए भी की जानी चाहिए कि साले साब तो पिछले विधानसभा चुनाव से ही चुनाव लड़ने के लिए मचल रहे थे लेकिन इस जिद पर उन्होंने ध्यान ही नहीं दिया। जो आदमी खुद को भविष्य का सीएम मानने लगे और उसे इस बार भी शिवराज बारा सिवनी से टिकट नहीं लेने दें तो जीजा से खुन्नस निकालने का इससे बढ़िया तरीका तो हो भी नहीं सकता।
और हाँ,जो धर्मालुजन कार्तिक अमावस पर गंगा-नर्मदा-क्षिप्रा आदि में स्नान-पुण्य का मन बना रहे हों,अभी रुक जाएं,विभिन्न दलों के दावेदारों में डुबकी लगाने की दौड़ चल रही है। इन सारी नदियों का बहाव मार्ग अभी भाजपा-कांग्रेस मुख्यालयों की तरफ हैं जहां कांग्रेस से भाजपा में आने वालों को रगड़ मसल के नहलाया जा रहा है तो भाजपा से कांग्रेस में आने वालों के चेहरों और कपड़ों पर लगा भगवा रंग साफ किया जा रहा है। चुनाव निपटने तक इन नदियों का पवित्र जल भरकर भी न लाएं,क्योंकि एक-दूसरे के दल के खिलाफ जो अंगार उगलते बयान दिए, जो वीडियो क्लिपिंग हमले के लिए संभाल रखी थी,वह सब दल और दिमाग बदल जाने के कारण इन्हीं नदियों में प्रवाहित की जा रही है।
परिचय-पत्रकारिता जगत में स्थापित और प्रतिष्ठित नाम मिलनसार पत्रकार कीर्ति राणा का है। क़रीब चार दशक से पत्रकारिता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार श्री राणा लंबे समय तक बड़े दैनिक अखबार में समूह के विभिन्न संस्करणों में संपादक रहे तो अन्य समूह में भी शुरुआती सम्पादक रहे हैं। आपका निवास फिलहाल इंदौर(मध्यप्रदेश)में ही है। वर्तमान में दैनिक अखबार में इंदौर के सम्पादक हैं। आप राजनीतिक मुद्दों पर निरंतर लिखते रहते हैं,जबकि सामाजिक मूल्यों पर आधारित कॉलम ‘पचमेल’ से भी इनकी पहचान है। आप सोशल साइट पर भी लेखन में काफी सक्रिय हैं। यही नहीं,कविता रचते हैं,और पाठ भी करते हैं। श्रेष्ठ पत्रकारिता लिए आपको कई बार पुरस्कृत-सम्मानित भी किया जा चुका है।

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