मारीशस में हिंदी सेवियों का विलक्षण इतिहास रच रहे इन्द्रदेव भोला

 

हिंदी की इस उर्वरा भूमि में हिंदी के अनेक सुगंधित पुष्प खिले,जिन्होंने मॉरीशस सहित विश्व में हिंदी की सुगंध को फैलाया है। वे न केवल हिंदी के प्रचार-प्रसार में लगे हैं बल्कि हिंदीभाषियों की नई पीढ़ियाँ तैयार करने में जी- जान से जुटे हैं। बाल-मन को बचपन से ही हिंदी से सुगंधित करने के लिए उन्होंने बाल-निबंध,बाल-नाटकों की रचना के साथ-साथ बाल-जगत पत्रिका का प्रकाशन भी प्रारंभ किया। साथ ही लोक-जीवन को भारतीय संस्कृति के कलेवर में समेटने के लिए उन्होंने लोक कथाओं को भावी पीढ़ियों के लिए संकलित किया है। इन्द्रदेव भोला गद्य और पद्य दोनों विधाओं में समाधिकार से स्तरीय रचना करने वाले ऐसे ही सशक्त साहित्यकार हैं।

९ दिसंबर १९६१ को डॉ.मुनीश्वरलाल चिंतामणी ने मॉरीशस के लेखकों के एक संघ की स्थापना करने के लिए पोर्ट-लुईस (मॉरीशस की राजधानी) के नेओ महाविद्यालय में आमंत्रित लेखकों को संबोधित करते हुए कहा था कि संघ का मुख्य उद्देश्य व्यवस्थित रूप से मॉरीशस में साहित्य-सृजन करना है,और निकट भविष्य में अनेक लेखक,कवि,कहानीकार,उपन्यासकार तथा अनेक साहित्यकार पैदा करना है,जो देश के दीप-स्तंभ बनेंगे। इसी हिंदी लेखक संघ के तृतीय स्तंभ इन्द्रदेव भोला मूलत: कवि हृदय हैं। जीवन जिजीविषा से संपूर्ण कवि हृदय ही उन्हें एक साथ कथाकार,निबन्धकार, संपादक और शोधकर्ता बनाए हुए है। इन्होंने मॉरिशस के साथ-साथ विश्व के हिंदी और हिन्दुस्तानी समाज को महत्वपूर्ण कृतियाँ भेंट की हैं।

इन्द्रदेव भोला अपने शोधकार्य,संपादन एवं लेखन द्वारा मॉरीशस और विश्व के हिंदी सेवियों का विलक्षण अविस्मरणीय इतिहास रच रहे हैं। विदेशों में हिंदी तथा विश्व में हिंदी एवं आर्य समाज उनकी ऐसी महत्वपूर्ण शोधपरक पुस्तकें हैं जिनमें विश्व में हिंदी के विकास का इतिहास दर्ज है तो ‘गागर में सागर’ काव्य-संग्रह में २२४४ हाइकू के मोती हैं और प्रतिध्वनियाँ कविता पुस्तक में २२४४ कविताएं हैं।

लोककथाओं में जीवन और जगत की प्राणवान शक्ति होती है।लोककथाएँ अपने समय और समाज की सच्चाइयों की कोख में जन्म लेती है। वे समाज के मानस की वास्तविक सहचर होती है।इसे ध्यान में रखते हुए ‘मॉरिशस की लोककथाओं और लोक संस्कृति की रक्षा और संवर्धन के निमित्त ‘मॉरिशस की लोककथाएं’पुस्तक की रचना की जो बहुत चर्चित रही।

इस तरह एक ओर कविता,कहानी,नाटक द्वारा इन्द्रदेवजी ने मॉरिशस के साहित्य भंडार को समृद्ध किया है तो दूसरी ओर ‘बालसखा’ पत्रिका प्रकाशित करके बालमानस की हिन्दुस्तानी और मानवीय संवेदनाओं से रचने का प्रयास किया है। तीसरी ओर उन्होंने अपने देश के अंग्रेजों पर स्मृतिग्रन्थ संयोजित करके अपने समय के इतिहास को संजोने का महान कार्य भी किया है।

इस तरह इन्द्रदेव भोला हिंदी,अंग्रेजी,फ्रेंच,भोजपुरी तथा क्रियोल भाषाओं में भी लेखन करते हैं। हिंदी,अंग्रेजी, क्रियोल तथा भोजपुरी में लिखे इनके कई नाटक इनके ही निर्देशन में मंचित हुए हैं। सन् २०१२ में राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित क्रियोल में इन्हें राष्ट्रीय एकता मंत्रालय द्वारा इन्हें सर्वश्रेष्ठ नाटककार के रूप में सम्मान प्रदान किया गया। आप हिंदी लेखक संघ के महामंत्री रहे और अब उसके अध्यक्ष हैं। शिक्षा केंद्र विद्या भवन के संस्थापक व संचालक हैं,जहाँ पिछले ४४ वर्षों से हिंदी की नि:शुल्क पढ़ाई होती है।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी इन्द्रदेव भोला ’प्रकाश’ शीर्षक से पाक्षिक साहित्यिक-सांस्कृतिक रेडियो कार्यक्रम भी प्रस्तुत करते रहे हैं। सरकारी स्कूल में हिंदी अध्यापक व उप प्रधानाध्यापक रहे हैं। पिछले पचास वर्षों से हिंदी सेवा व सृजनात्मक लेखन के लिए मॉरिशस सरकार तथा साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित होते रहे हैंजिनमें प्रमुख-‘सनातन धर्म टेम्पल्स फेडरेशन’,‘आर्य सभा’, ‘हिंदी प्रचारिणी सभा,‘हिंदी सेवा संस्थान’,‘हिंदी संगठन’, और ‘हिंदी लेखक संघ’ आदि हैं।

पी-एच.डी.,सारस्वत विद्या वाचस्पति तथा ‘हिंदी सरस्वति सम्मान’ से भी आप विभूषित हैं। इसके साथ-साथ ग्राम परिषद द्वारा विशिष्ट सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। हिंदी भाषा व साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए संघर्षरत ऐसे संघर्षशील व्यक्ति को ‘वैश्विक हिंदी सम्मेलन’ द्वारा ‘हिंदी का विश्वदूत’ घोषित किए जाने से हम सभी स्वयं को गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं।

(सौजन्य:वैश्विक हिंदी सम्मेलन,मुंबई)

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