मार्गदर्शक खुद भटक गए

डॉ.अरविन्द जैन
भोपाल(मध्यप्रदेश)
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मानव जीवन स्वयं दुखों का संसार है,संसार यानी संस्रण करना यानि भ्रमण,दुःख-सुख एक आभास होता हैl कारण संसार में सब वस्तुएं अस्थाई हैंl जन्म हमारे हाथ में नहीं है,पर एक ही सनातन सत्य है वह है मृत्यु,बस उसके सामने प्रश्न चिन्ह लगे होते हैं ,कब,क्यों,कहाँ,कैसे ? पर है निश्चितl हम जन्म से लेकर सुख की चाह में जीते हैं या चाहते हैंl बचपन खेल में खोया,और जवानी में कुछ होश आता है तो वह नींद में खो जाता हैl
आज जब संत-महंत-महाराज आदि के नाम सामने आते हैं तो हमारा मन,मस्तिष्क सम्मान से नतमस्तक हो जाता है,पर कुछ लोग अपने कुकृत्यों से अपने नाम के साथ संत समाज को कलंकित कर देते हैं-जैसे आशाराम बापू,राम रहीम,और अभी-अभी चर्चित हुए दाती मदन महाराज,तो दूसरी और भय्यू महाराज ने स्वयं आत्महत्या कर लीl उसका कारण पारिवारिक कलह आ रहा हैl जो व्यक्ति दूसरों की कलह का निपटारा करता था,वह स्वयं अपनी कलह से इतना निराशा हुआ कि,उन्हें इतना बड़ा कदम उठाना पड़ाl इस घटना ने संत-महंत-महाराज-गुरु शब्दों की व्याख्या करने को मजबूर कर दिया हैl
विषयशावशातीतो निरारम्भोअपरिग्रहः!
ज्ञानध्यानतपोरत्नस्तपस्वी स प्रषसयते!!
अर्थात स्पर्शनादि इन्द्रियों के विषयभूत माला तथा स्त्री आदि विषयों की आकांक्षा सम्बन्धी अधीनता जिनकी नष्ट हो गई है,अर्थात जिन्होंने इन्द्रिय विषयों पर पूर्ण विजय प्राप्त कर ली है,जो खेती आदि व्यापार का परित्याग कर चुके हैं,बाह्य और आभ्यन्तर परिग्रह से रहित हैं तथा ज्ञान,ध्यान और तप को ही जो रत्नों के समान श्रेष्ठ समझकर अभी की प्राप्ति में लीन रहते हैं,वही तपस्वी अर्थात गुरु प्रशंसनीय होते हैंl
मनुष्य के चरित्र की गिरावट के मूल कारण कंचन और कामिनी होती हैl संत कोई भी बन जाए या कहलाए,पर वह बिना परिवार के साथ परिग्रह त्याग के नहीं बन सकताl अपार संपत्ति,पद यश,मान के वशीभूत व्यक्ति पाप और कषाय से मुक्त नहीं हो सकताl भय्यू महाराज भी इससे मुक्त नहीं होने के कारण तनाव में रहकर अपना जीवन स्वयं दूभर कर इस स्थिति में आए और उन्होंने आत्महत्या की,जबकि वे विद्वान होने के साथ गुणी होने से उन्होंने अपने हजारों शिष्यों को विषम परिस्थितियों से विलग किया होगाl स्वाभाविक है,उन्होंने अपने उपदेशों में मानव जाति को नैतिकता का पाठ पढ़ाया होगा,सदाचार के कारण वे समाज में प्रतिष्ठित हुए थे और वे स्वयं अपनी इतनी-सी समस्या से नहीं लड़ पाएl
पर उपदेश देना और स्व अनुभूति के कारण मनुष्य बहुत जल्दी टूट जाता हैl निश्चय ही उनको बहुत अधिक मानसिक आघात हुआ होगा,जो असहनीय होने के कारण इस कदम को उठाने के लिए मजबूर होना पड़ाl वास्तव में भैय्यू महाराज ने जो भी कदम उठाया उससे जन सामान्य यह सोचने को मजबूर हो गया कि जो दूसरों को मार्गदर्शन देते थे,उसने स्वयं अपने मार्ग से भटककर इतना बड़ा कदम उठायाl निश्चय ही यह मानव समाज की दुखद घड़ी हैl
आशाराम,राम रहीम या दाती महाराज और अन्यों के कुकृत्यों के कारण संत समाज कलंकित हुआ और अब जनता इनके चक्करों में नहीं फंसना चाहतीl कभी-कभी जब निगाह चारों और डालते हैं तो लगता है कि,जैन मुनि जिन्होंने सम्पूर्ण परिग्रह का त्याग कर मात्र उनके पास एक पिच्छी और कमंडल के अलावा ज्ञानार्जन के लिए शास्त्र का उपयोग करते है,कोई बाह्य आलम्बन नहीं रखते,न ही किसी से कोई अपेक्षा रखते हैंl वे निष्कलंक जीवन यापन अपनी ज्ञान पिपासा को शांत करने के अलावा आत्मकल्याण में ही अपना समय व्यतीत करते हैंl
इसका आशय यह नहीं है कि,किसी जाति विशेष के गुणों का बखान करना है,पर यह सत्य है कि आत्मा को हित है सुख सो सुख ,आकुलता बिन कहिएl सच्चा सुख आकुलता रहित होना चाहिए,और जिसमें भय,क्रोध,आक्रोश,नफरत,घृणा,बैर-भाव रहे,उससे सच्चे सुख की अपेक्षा करना नामुमकिन हैl समता भाव,वितराग भाव,अहिंसाभाव से ही सुख की अनुभूति होती हैl
`राजा राणा छत्रपति ,हाथिन के असवारl
मरना सबको एक दिन,अपनी-अपनी बारll
दल-बल देवी देवता मात-पिता परिवारl
मरती बिरियाँ जीव को,कोई न राखनहारll
दाम बिना निर्धन दुखी,तृष्णा वश धनवानl
कहूं न सुख संसार में,सब जग देख्यो छानll
आप अकेला अवतरे,मरै अकेलो होयl
यूँ कबहुँ इस जीव को,सगा न साथी कोयll`
यदि मानव समाज इन पंक्तियों को गंभीरता से पढ़कर समझे तो बहुत-सी उलझनें हल हो सकती हैंl जीवन संग्राम से पलायन करना बुद्धिमत्ता नहीं हैl जीवन में कौन ऐसा व्यक्ति होगा,जिसके जीवन में उतार-चढ़ाव नहीं आते और संघर्ष करना ही जीवन का मूल मंत्र हैl इससे यह पाठ मिला कि,संसार में कोई सुखी नहीं है,सब सुखाभास में जी रहे हैंl इसी को कहते हैं-मार्गदर्शक खुद भटक गयाl

परिचय- डॉ.अरविन्द जैन का जन्म १४ मार्च १९५१ को हुआ है। वर्तमान में आप होशंगाबाद रोड भोपाल में रहते हैं। मध्यप्रदेश के राजाओं वाले शहर भोपाल निवासी डॉ.जैन की शिक्षा बीएएमएस(स्वर्ण पदक ) एम.ए.एम.एस. है। कार्य क्षेत्र में आप सेवानिवृत्त उप संचालक(आयुर्वेद)हैं। सामाजिक गतिविधियों में शाकाहार परिषद् के वर्ष १९८५ से संस्थापक हैं। साथ ही एनआईएमए और हिंदी भवन,हिंदी साहित्य अकादमी सहित कई संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। आपकी लेखन विधा-उपन्यास, स्तम्भ तथा लेख की है। प्रकाशन में आपके खाते में-आनंद,कही अनकही,चार इमली,चौपाल तथा चतुर्भुज आदि हैं। बतौर पुरस्कार लगभग १२ सम्मान-तुलसी साहित्य अकादमी,श्री अम्बिकाप्रसाद दिव्य,वरिष्ठ साहित्कार,उत्कृष्ट चिकित्सक,पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी() आदि हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-अपनी अभिव्यक्ति द्वारा सामाजिक चेतना लाना और आत्म संतुष्टि है।

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