मिली आफ़त से मुक्ति

डॉ.आभा माथुर
उन्नाव(उत्तर प्रदेश)
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उन दिनों मैं राजकीय बालिका महाविद्यालय में प्रधानाचार्या थी। हमारे विद्यालय का भवन केवल २-३ वर्ष पहले बना था। किसी कारणवश विद्यालय भवन के बीच लगभग दो इंच की दरार दी गई थी और इस दरार को एल्युमिनियम की पट्टी से जोड़ दिया गया था। न जाने कैसे बीच के स्थान में एक गिरगिट ने घर बना लिया था। पहले पहल चौकीदारी करने वाले चपरासी ने शिकायत की,कि रात को वह गिरगिट बाहर निकलकर सामने पड़े मैदान में घूमता है। उन दिनों विद्यालय में चौकीदार का पद रिक्त पड़ा था अतः सभी सभी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की बारी-बारी से एक-एक महीने की चौकीदारी की ड्यूटी लगाई जाती थी। एक चपरासी को समझा-बुझाकर काम निकलवाया तो अगले महीने दूसरे ने वही आपत्ति उठाई। कोई भी चपरासी चौकीदारी करने को तैयार नहीं था। उनका कहना था कि यदि रात के समय गिरगिट ने काट लिया तो उनकी जान भी जा सकती हैl
दो महीने बाद जाड़े का मौसम आ गया। अब गिरगिट दोपहर के समय भी धूप सेंकने के लिए बाहर निकलने लगा,यद्यपि बाहर भीड़ देखकर वापस भवन में लौट जाता था।छात्राओं का यह हाल हो गया कि,अवसर पाते ही उस दरार के सामने जमा हो जातीं और झुककर गिरगिट को झाँक-झाँककर देखतीं। उन्हे वहाँ से हटाना कठिन हो जाता। मुझे डर लगता कि, यदि गिरगिट बाहर निकल आया और छात्राओं में भगदड़ मच गई तो दो-चार कुचल जाएंगी,व्यर्थ का तमाशा बन जाएगा। अब मैंने ठान लिया कि उस गिरगिट को मरवाना ज़रूरी है,पर कैसे ? वह तो अपनी मर्ज़ी से जब चाहता बाहर आता,या सिर निकालकर झाँकताl वह जब चाहता दरार में वापस चला जाता,जहाँ वह पूर्ण सुरक्षित था,क्योंकि वहाँ पर लाठी-डन्डा बेकार थाl
अन्त में मैंने ही एक योजना बनाई। निश्चय हुआ कि दरार में पीछे की ओर से क्लोरोफ़ॉर्म फेंका जाए और जब उसकी गन्ध से घबराकर गिरगिट बाहर निकले,तब उसे लाठी से मारा जाए। दिन चुना गया महीने का अन्तिम दिन। महीने के अन्तिम दिन मध्यावकाश के बाद बच्चों की छुट्टी हो जाती है,पर शिक्षिकाएं,प्रधानाचार्या व शिक्षणेतर कर्मचारी विद्यालय में रहते हैं। शिक्षिकाएं अपने-अपने कक्षा रजिस्टर पूर्ण करती हैं अर्थात महीनेभर के शुल्क व छात्राओं की उपस्थिति का लेखा पूर्ण किया जाता है।
महीने के अन्तिम दिन का मध्यावकाश के बाद का समय निश्चित हो जाने पर एक चपरासी को काम सौंप दिया गया। सब काम योजनानुसार सफलता से सम्पन्न हो गया। वह दृश्य यद्यपि करुण और वीभत्स का मिला-जुला रूप था,पर उसके अभाव में कोई बड़ी दुर्घटना हो सकती थी। कभी-कभी आत्मरक्षा के लिए हिंसा भी आवश्यक हो जाती है।

परिचय-डॉ.आभा माथुर की जन्म तारीख १५ अगस्त १९४७ तथा जन्म स्थान बिजनौर (उत्तर प्रदेश)हैl आपका निवास उन्नाव स्थित गाँधी नगर में हैl 
उन्नाव  निवासी डॉ.माथुर की लेखन विधा-कविता,बाल कविताएं,लेख,बाल कहानियाँ, संस्मरण, लघुकथाएं है। सामाजिक रुप से कई संगठनों से जुड़कर आप सक्रिय हैं। आपकी पूर्ण शिक्षा फिलासाफी ऑफ डॉक्टरेट है। कार्यक्षेत्र उत्तर प्रदेश है। सरकारी नौकरी से आप प्रथम श्रेणी राजपत्रित अधिकारी पद से सेवानिवृत्त हुई हैं। साझा संग्रह में डॉ.माथुर की कई रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं। साथ ही अनेक रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हैं। सामाजिक मीडिया समूहों की स्पर्धाओं में आप सम्मानित हो चुकी हैं। इनकी विशेष उपलब्धि आँग्ल भाषा में भी लेखन करना है। आपकी लेखनी का उद्देश्य आत्म सन्तुष्टि एवं सामाजिक विसंगतियों को सामने लाना है, जिससे उनका निराकरण हो सके। आपमें दिए गए विषय पर एक घन्टे के अन्दर कविता लिखने की क्षमता है। अंग्रेज़ी भाषा में भी लिखती हैं।

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