‘मी टू’ की होली…!

तारकेश कुमार ओझा
खड़गपुर(प. बंगाल )

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अरसे बाद अभिनेता नाना पाटेकर बनाम गुमनाम-सी हो चुकी अभिनेत्री तनुश्री दत्ता प्रकरण को एक बार फिर नए सिरे से सुर्खियां बनते देख मैं हैरान था,
क्योंकि भोजन के समय रोज टेलीविजन के सामने बैठने पर आज की ‘मी टू’ से जुड़ी खबरें…की तर्ज पर कुछ न कुछ चैनलों की ओर से नियमित परोसा जाता
रहा। मैं सोच कर परेशान था कि इतने साल तक ठंडे बस्ते में रहने के बाद अचानक यह विवाद फिर सतह पर कैसे आ गया और इस पर दोबारा हंगामा क्यों मच
रहा है। मुझे समझने में थोड़ा वक्त लगा कि यह मी टू अभियान की वजह से हो रहा है। मेरा मानना था कि पहले की तरह ही यह नया विवाद भी जल्द ठंडा पड़
जाएगा,लेकिन यह क्या! यह तो मानो मी टू की होली थी। भद्रजनों की होली जैसी होती है। ना-ना करते एक के बाद एक सभी के चेहरे रंगों की कालिख से
सराबोर हो गए। आलम यह कि कौन फंसा नहीं,बल्कि कौन बचा का सवाल अहम हो गया। अभिनेता से लेकर पत्रकार-संपादक तक इस विवाद की चपेट में आ गए।
छात्र जीवन में जो शख्स मेरे आदर्श थे,उन्हें ऐसी कीचड़ वाली होली के रंग में रंगा देख मैं हतप्रभ रह गया,क्योंकि समाचार की प्रमुख पंक्ति लगातार वही बन रहे थे। कभी लगता बेचारे की कुर्सी चली जाएगी, फिर जान पड़ता अरे नहीं बच जाएगी…पार्टी उसके साथ है…कुछ देर बाद…नहीं…जाना ही पड़ेगा…पार्टी ने पल्ला झाड़ लिया है। ऐसा लगता मानो
चैनलों पर समाचार नहीं,बल्कि भारत-पाकिस्तान के बीच खेला जा रहा २०-२० मैच देख रहा हूँ। इस विवाद की पृष्ठभूमि में मेरे मन में एक और सवाल
कौंधा। मैं मानो खुद से ही सवाल करने लगा कि क्या मी टू की जद में आए सारे विवाद मीडिया में इसलिए सुर्खियां नहीं पा सके,क्योंकि आरोप लगाने वाले और आरोपी दोनों अभिजात्य वर्ग से हैं। क्या पीड़िता यदि साधारण वर्ग की महिला होती तो उसे भी मीडिया में इतना कद मिल पाता। मी टू विवाद के
पीछे सनसनी,रहस्य,रोमांच,और चकाचौंध-चटपटेपन का तड़का है,इसीलिए वह इतनी प्रमुखता से सुर्खियां पा सका। अन्यथा साधारण मामलों में तो यह कतई संभव नहीं हो पाता,क्योंकि पेशे के चलते मैंने कई ऐसे पीड़ितों को न्याय दिलाने की कोशिश की,लेकिन उत्पीड़न और अन्याय का असाधारण मामला
होने के बावजूद उसे लोगों का ज्यादा प्रतिसाद या सहयोग नहीं मिल पाया। समाज के अभिजात्य और ताकतवर वर्ग ने जिससे न्याय मिलने की उम्मीद थी, ऐसे प्रकरणों का लेना भी जरूरी नहीं समझा। तभी मेरे जेहन में उस यांत्रिक अभियंता नौजवान का मासूम चेहरा उभर आया,जो आधार कार्ड में यांत्रिकी गड़बड़ी के चलते पहचान के विचित्र संकट से गुजर रहा है। आधार के बायोमीट्रिक पर अंगुली रखते ही उसकी पहचान के साथ किसी और की पहचान भी मिल जाती है और एक मिश्रित व संदिग्ध पहचान आधार की मशीन पर उभरती है। इससमस्या के चलते वह नौजावन पिछले एक साल से न सिर्फ बेरोजगार बैठा है,बल्कि दर-दर की ठोकरें खाने जैसी परिस्थिति उसके सामने है। उसकी चिंता में बूढ़े माँ-बाप का का भी मारे तनाव के बुरा हाल है। पूरा परिवार रात की जरूरी नींद भी नहीं ले पा रहा। उसकी विचित्र विडंबना को मैंने अपने पेशेवर दायित्व के तहत प्रचार की रोशनी में लाने की भरसक कोशिश की,लेकिन सफलता नहीं मिल पाई। हालांकि,उसका मामला प्रचार की रोशनी में आते ही बड़ी संख्या में ऐसे लोगों ने मुझसे संपर्क कर बताया कि उनकी भी कुछ ऐसी ही परेशानी है,जिससे निजात का कोई रास्ता उन्हें नजर नहीं रहा। केन्द्र
सरकार अधीनस्थ मामला होने से स्थानीय प्रशासन इस मामले में किसी भी प्रकार की मदद से साफ इन्कार कर रहा है,जबकि संबंधित विभाग से पत्राचार
या शिकायत पर केवल प्राप्ति रसीद और आश्वासन के कुछ नहीं मिल पाता।
पीड़ितों की आपबाती सुनकर फिर मेरे दिमाग में यह बात दौड़ने लगी कि बेवजह तनाव और परेशानी झेल रहे ऐसे निरीह लोगों की समस्या मीडिया की
सुर्खियां तो दूर स्थान भी क्यों हासिल नहीं कर पाती, जबकि मी टू जैसे प्रकरण पर रोज हमारा ज्ञानवर्द्धन हो रहा है। सचमुच इस विडंबना से मैं वाकई विचलित हूँ।

परिचय-तारकेश कुमार ओझा का नाम खड़गपुर में वरिष्ठ पत्रकार के रुप में जाना जाता है। आपका निवास पश्चिम बंगाल के खड़गपुर स्थित भगवानपुर (जिला पश्चिम मेदिनीपुर) में है। आपकी लेखन विधा अनुभव आधारित लेख,संस्मरण और सामान्य आलेख है।श्री ओझा का जन्म स्थान प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश) हैl पश्चिम बंगाल निवासी श्री ओझा की शिक्षा बी.कॉम. हैl कार्यक्षेत्र में आप पत्रकारिता में होकर उप सम्पादक हैंl आपको मटुकधारी सिंह हिंदी पत्रकारिता पुरस्कार तथा श्रीमती लीलादेवी पुरस्कार के साथ ही बेस्ट ब्लॉगर के भी कई सम्मान मिल चुके हैंl आप ब्लॉग पर भी लिखते हैंl  

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