मेट्रो में झम्मन फंसे

सुनील जैन `राही`
पालम गांव(नई दिल्ली)

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बहुत दिनों से सोच रहे थे,एक बार बिटिया के यहां मेट्रो से जाएं। बहुत नाम सुना है। टी.वी. पर फुर्र से इधर,फुर्र से उधर गुजरते देखा। चमचमाती ऐसे जैसे नई दुल‍हनिया की साड़ी। साफ-सुथरी ऐसी जैसे नेता जी की मूंछ। पूंछ तो है ही नहीं। पूंछ में भी एक आदमी अटका है। रंग ऐसा चोखा,जैसे ईमानदारी हो। गति ऐसी,जैसे महंगाई हो। चाल ऐसी जैसी हिरणी दौड़ रही हो। रुके तो सांस थम जाए। चले तो बुडढों की सांस उखड़ जाए। बहुत दिनों से सोच रहे थे,एक बार तो बिटिया के यहां इसी दिलउखाड़ दिल्ली धमनी से जाएंगे। आखिर कब तक इस तरह दिल थामे टी.वी. पर देखते रहेंगे।
एक दिन मुकम्मल कर लिया। जिस कुर्ते पर कई बरसों से पड़ोसन की नजर थी,उसी को धोबी से धुलवाकर प्रेस करवाई। पाजामा तो धुलना ही था। टोपी को खुद धो डाला। कुर्ता ही कुछ ऐसा था। कई मुशायरों में कविता की तारीफ तो ना हुई,लेकिन कुर्ते की तारीफ में कसीदे गढ़ दिए गए।
सफेद कुर्ता,सफेद पाजामा,सफेद टोपी ऐसा लग रहा था,जैसे बगुला हाथ में छड़ी लिए नवाबी चाल में चल रहा है। घर से बाहर कदम रखते ही रिक्शेवाले को बुला भेजा। मेट्रो का पहला दिन था। कहीं दाग न लग जाए। अगर दाग लग गया तो किससे धुलवाएंगे,कौन-सा पावडर होगा,किसे कैसे बताएंगे कि दाग कहां-कैसे लगा। वैसे आज तक बेदाग हैं,तो दाग क्यों लगें।
रिक्शेवाले ने भी अदब और आश्चर्य से देखा। पता नहीं किसका असर था रिक्शेवाले पर,झम्मन को देखते ही आंख दब गई। झम्मन को तैश तो बहुत आया,गुस्से में कहने वाले ही थे-क्या संसद समझ रखा है। प्रियाप्रकाश की औलाद कहीं का। बड़ी सावधानी से रिक्शे में बड़ी नजाकत से कदम रखा। पहले ही झटके में ओंधें मुंह गिरते-गिरते बचे। वे साइकिल रिक्शा समझे थे,वो ई-रिक्शा निकला।
मचान पर बने मेट्रो स्टेशन को देखते ही रह गए। वो रिक्शेवाले ने कहा-मियां अब क्या देखते ही रहोगे या फिर तशरीफ टोकरा नीचे भी लाओगे। झम्मन ने घूरकर देखा और दस रुपल्ली का सिक्का टिका दिया। सिक्का देख रिक्शे वाला बोला-ये तो कब का गिर गया,नोट निकालो। आखिरकार रिक्शेवाले से निजात पाकर,मंच पर बने मेट्रो स्टेशन की ओर लपके। सामने से मेट्रो सर्र-सी निकल गई। झम्मन देखते रह गए।
मेट्रो में घुसने के पहले टिकट तो लेना ही था। मशीन के सामने मशीन की तरह खड़े हो गए। भला हो उस जवान का,जिसने बताया कि इस मशीन में रुपया डालो प्लास्टिक का सिक्का आएगा। झम्मन दुखी हो गए। सरकार का सिक्का तो गिर गया। ये प्लास्टिक के सिक्के से सरकार चलेगी। खैर किसी तरह टिकट तो ले लिया। अब मशीन फिर सामने थी। वहां तैनात जवान ने हाथ उठाने के लिए कहा। झम्मन ने बौखलाकर कहा-हम क्या चोर-उचक्के हैं,जो हमारी खाना-तलाशी ले रहे हो। हम जाने-माने नायाब शायर हैं। झम्मन अड़ गए,हम तलाशी नहीं देंगे। ये बेअदबी है,हम इसे कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे। खैर जवान के साहब ने बताया कि ये आपकी ही सुरक्षा के लिए कड़े इंतजाम हैं,जिससे आप महफूज रह सकें। बात झम्मन को समझ में आ गई।
सामने फिर मशीन थी। न कोई आदमी,न आदमी का बच्चा। फिर से प्लास्टिक की मशीन। इतनी देर में सभी कर्मचारी समझ चुके थे,चचा पहली बार मेट्रो के लिए निकले हैं। एक कर्मचारी ने उन्‍हें समझाया और मेट्रो प्लेटफार्म पर पहुंचने के लिए निकल पड़े,लेकिन चलती सीढ़ियाँ देखकर चौंके। चलते पुर्जे तो कई देखे थे,लेकिन चलती सीढ़ियाँ पहली बार देखीं। खैर,देखा-देखी सीढ़ियों पर चढ़ तो गए। यह दीगर बात है कि पीछे वाले ने अगर संभाला नहीं होता तो सर के बल नीचे होते।
प्लेटफार्म पर पहुंचने के बाद एक मेट्रो तो देखते-देखते ही निकल गई। मेट्रो की साफ-सफाई,उसकी गति,उसका इठला कर बांए मुड़ जाना और न जाने कहां की दुनिया में खो गए झम्मन,शायर जो ठहरे। पहले समझा और दूसरी का इंतजार करने लगे। सामने आती दूसरी मेट्रो देखकर छड़ी के साथ-साथ खुद भी तन गए। आवाज के साथ दरवाजा खुला तो मेट्रो से उतरती भीड़ ने झम्मन को पांच फुट पीछे धकेल दिया। उन्हें जवानी के दिन याद आ गए,बस फिर क्या था, छड़ी के साथ मेट्रो के भीतर ये गए कि वो गए।
मेट्रो में घुसते ही खाली सीट पर पके आम की तरह टपक गए। अभी टपके हुए चंद लम्हे ही गुजरे थी कि एक मोहतरमा आईं और बोली-ये सीट महिलाओं के लिए है। आप अपनी तशरीफ का टोकरा और कहीं और ले जाएं। झम्मन ने सोचा-बड़े बे-आबरू होकर तेरे कूंचे से हम निकले।
अभी इधर-उधर तांक-झांक करते,उससे पहले ही उनकी नज़र दूसरी तरफ सीट के ऊपर जा पड़ी। विकलांग और वरिष्ठ नागरिकों के लिए। अरे वाह,महिलाओं की सीट पर बुडढे नहीं बैठ सकते तो बुडढों की सीट पर जवान कैसे बैठ सकते हैं ? छड़ी घुमाते हुए उस सीट की ओर लपके,जिस पर जवान बैठे हुए थे,लेकिन इस बीच,रास्ते में खड़े एक सज्जन की थैली से धक्का-मुक्की में जलेबी की चासनी और कचौड़ी के साथ लाई आलू की सब्जी ने झम्मन के कुर्ते को रंगीला बना दिया। खैर,झम्मन कुछ नहीं बोल नहीं पाए। बोलते भी कैसे-जलेबी वाला सज्जन जलेबी की तरह टेड़ा और सब्जी की मिर्ची की तरह मिर्चीदार था। लम्बाई अमिताभ बच्चन- सी,गंजे शेटटी की तरह गठीला शरीर,मूंछें नत्थूलाल की तरह,सीना ८० इंच का,तो डोले सनी देओल की तरह। आंखें प्राण की तरह लाल। चुपचाप बिना कुछ कहे सीट पर बैठे लौंडों पर अकड़ गए। बुजुर्गों की सीट पर बैठते आपको शर्म नहीं आती। लड़के भी बड़े ढीठ थे-आओ बैठो। शेर पर तो बस चला नहीं,बिल्ली के कान उमेठने चले आए। खिसियाकर झम्मन बैठ गए। देखते ही देखते स्टेशन पर स्टेशन आते गए। बिटिया के घर के स्टेशन के नाम की आवाज सुनाई देते ही मुरझाए चेहरे से उठे और फिर से ई-रिक्शा में बैठ बिटिया के घर की ओर…।
चमचमाती मेट्रो से चमचमाते झम्मन नहीं निकल पाए। ईस्टमेन रंग में बिटिया के घर पहुंचे तो नवासे ने कहा-दाग अच्छे हैं। झम्मन की इच्छा हुई कि,निरमा के ड्रम में डूब जाएं।
पहली बार कसम खाई-अब मेट्रो में आएंगे तो बेटे के साथ ही आएंगे।

परिचय-आपका जन्म स्थान पाढ़म(जिला-मैनपुरी,फिरोजाबाद)तथा जन्म तारीख २९ सितम्बर है।सुनील जैन का उपनाम `राही` है,और हिन्दी सहित मराठी,गुजराती(कार्यसाधक ज्ञान)भाषा भी जानते हैं।बी.कॉम.की शिक्षा खरगोन(मध्यप्रदेश)से तथा एम.ए.(हिन्दी,मुंबई विश्वविद्यालय) से करने के साथ ही बीटीसी भी किया है। पालम गांव(नई दिल्ली) निवासी श्री जैन के प्रकाशन खाते में-व्यंग्य संग्रह-झम्मन सरकार,व्यंग्य चालीसा सहित सम्पादन भी है।आपकी कुछ रचनाएं अभी प्रकाशन में हैं तो कई दैनिक समाचार पत्रों में लेखनी का प्रकाशन होने के साथ आकाशवाणी(मुंबई-दिल्ली)से कविताओं का सीधा और दूरदर्शन से भी कविताओं का प्रसारण हो चुका है। राही ने बाबा साहेब आम्बेडकर के मराठी भाषणों का हिन्दी अनुवाद भी किया है। मराठी के दो धारावाहिकों सहित करीब १२ आलेखों का अनुवाद भी कर चुके हैं। इतना ही नहीं,रेडियो सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में ४५ से अधिक पुस्तकों की समीक्षाएं प्रसारित-प्रकाशित हो चुकी हैं। आप मुंबई विश्वविद्यालय में नामी रचनाओं पर पर्चा पठन भी कर चुके हैं। कुछ अखबारों में नियमित व्यंग्य लेखन करते हैं। एक व्यंग्य संग्रह अभी प्रकाशनाधीन हैl नई दिल्ली प्रदेश के निवासी श्री जैन सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रीय है| व्यंग्य प्रमुख है,जबकि बाल कहानियां और कविताएं भी लिखते हैंl आप ब्लॉग पर भी लिखते हैंl आपकी लेखनी का उद्देश्य-पीड़ा देखना,महसूस करना और व्यक्त कर देना है।

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