मेरा बचपन लौटा दो

मालती मिश्रा ‘मयंती’
दिल्ली
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तरक्की कहाँ से कहाँ ले के आई,
बेफिक्री वाली वो दुनिया भुलाई
सब-कुछ तो है पर सुकून खो गया है,
कोई फिर से मेरी वो बेफिक्री लौटा दो
कोई मुझे मेरा बचपन लौटा दो,
वो चिकनी मिट्टी से पुता घर-आँगन लौटा दो
कोई मुझे मेरा बचपन लौटा दो…।
रोज बनाती हूँ नए आयाम,
भागती हूँ दौड़ती हूँ छूने को ऊँचाइयाँ
गगन चुंबी इमारतों में खुद ही खो जाती हूँ,
शाम को लौटकर दो पल सुकून के तलाशती हूँ
सुकून से भरी वो सूखी घास की ठंडी छत,
कोई ला सकता हो तो फिर से ला दो
वो चिकनी मिट्टी से पुता घर-आँगन लौटा दो,
कोई मुझे…।
वो नानी और दादी की परियों की कहानी,
राजा रानी के मरने से होती खतम थी
अम्मा की डाँट और दादी की पुचकार,
चंदा की रोशनी से जगमग तारों भरी रात
वो तारों को गिनती हुई ठंडी रातें लौटा दो,
दादी की कहानियों की सौगातें लौटा दो
कोई मुझे…।
वो बरसाती अंधेरी रातों में जुगनू का चमकना,
वो जुगनू संग आकाश का धरती पे उतरना
बंद कर हथेली में फिर उनको उड़ाना,
वो रंग-बिरंगी तितलियों के पीछे दौड़ लगाना
वो कोयल की कूक सुन उसको चिढ़ाना,
कोई तो कोयल की मधुर कूक फिर सुना दो
वो रंग-बिरंगी तितलियाँ कोई फिर दिखा दो,
कोई मुझे…।
वो घर से निकलते स्कूल की पगडंडी पर,
लहलहाते खेत गन्नों के,वो फिर से दिखा दो
चलो खाएँ गन्ने खाएँ,छीमियाँ मटर की,
अपने छोड़ दूजे खेतों की राह फिर दिखा दो
नून मिर्च की चटनी संग चने के फुनगी का साग,
भूल गई रसना,वो स्वाद फिर चखा दो
बड़ी हो गई हूँ फिर बच्चों-सी चोरी सिखा दो
कोई मुझे…।
बच्ची थी जब तब ये बड़प्पन था लुभाता,
तरह-तरह के सब्जबाग था दिखाता
बताया नहीं इसने कभी,
कि गया बचपन न लौटेगा
पाने को इसको कभी फिर मन तरसेगा,
फिर न देखूँगी बड़े होने के सपने….
ले लो सारे सपने,वो बेफिक्री लौटा दो,
कोई मुझे…।
वो बारिश के पानी में घंटों नहाना,
वो हल्दी वाले दूध संग माँ की मीठी डाँट खाना
भूल सारी मस्ती माँ के गर्म आँचल में दुबक जाना,
और बिना देरी किए माँ का वैद्य से दवाई ले आना
और नहीं कुछ तो वैद्य की वो कड़वी पुड़िया ही लौटा दो,
वो चिकनी मिट्टी से पुता घर-आँगन लौटा दो
कोई मुझे मेरा बचपन लौटा दो।
जीवन की भाग-दौड़ में जीना ही भूल गई हूँ,
माँ के बिन जीते-जीते
बचपन से कितनी दूर आ गई हूँ,
नहीं चाहिए ऊँचाई
मुझे रोज की वो ठोकरें लौटा दो,
वो गिरकर फूटे घुटनों के
घाव फिर दिखा दो,
वो घाव पे हल्दी लगाती माँ की मीठी सी छुअन फिर लौटा दो
कोई मुझे मेरा बचपन लौटा दो,
वो चिकनी…।
आज डनलप के मुलायम गद्दे हैं पर नींद रूठ गई,
पहले सर्दी में दादी पुआल बिछाती थी
बड़े ही सुकूनभरी वो रात होती थी,
एक ही रजाई में पुआल के गद्दे पे
सोते थे सभी साथ,होती थी चुहलबाजियाँ,
वो पुआल की मीठी-सी गरमाहट तो ला दो
नींद वाली सुकून भरी रातें ही लौटा दो,
कोई मुझे…
चिकनी मिट्टी…।
दिवाली पे आँगन में मिट्टी के घरौंदे,
रंग मिले चूने की सफेदी से थे चमकते
बड़ों की दुनिया से जुदा,
दिवाली के दीयों से जगमगाता…
हमें महलों का अहसास था कराता,
वो मिट्टी का घरौंदा फिर से बना दो
उसमें वो राम दरबार की तस्वीर भी सजा दो,
कोई मुझे मेरा बचपन लौटा दो
चिकनी मिट्टी से पुता…।
बड़ी हो गई हूँ,तरक्की भी कर ली है,
कमा के रुपया बैंक बैलेंस भर लिया है
फिर भी,
फिर भी आँखें खोजती हैं वो मिट्टी की गुल्लक
जिसमें भरे होते बाबूजी के दिए अठन्नी-चवन्नी के सिक्के,
मेरे बैंक खातों को कोई वो गुल्लक का पता दो
ले लो चेक मेरे बैंक बैलेंस भी ले लो,
फिर से मुझे उस गुल्लक की खनक तो सुना दो
कोई मुझे…।
वो चिकनी मिट्टी…॥
परिचय-मालती मिश्रा का साहित्यिक उपनाम ‘मयंती’ है। ३० अक्टूबर १९७७ को उत्तर प्रदेश केसंत कबीर नगर में जन्मीं हैं। वर्तमान में दिल्ली में बसी हुई हैं। मालती मिश्रा की शिक्षा-स्नातकोत्तर (हिन्दी)और कार्यक्षेत्र-अध्यापन का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप साहित्य सेवा में सक्रिय हैं तो लेखन विधा-काव्य(छंदमुक्त, छंदाधारित),कहानी और लेख है।भाषा ज्ञान-हिन्दी तथा अंग्रेजी का है। २ एकल पुस्तकें-अन्तर्ध्वनि (काव्य संग्रह) और इंतजार (कहानी संग्रह) प्रकाशित है तो ३ साझा संग्रह में भी रचना है। कई पत्र-पत्रिकाओं में काव्य व लेख प्रकाशित होते रहते हैं। ब्लॉग पर भी लिखते हैं। इनकी लेखनी का उद्देश्य-साहित्य सेवा,हिन्दी भाषा का प्रसार तथा नारी जागरूकता है। आपके लिए प्रेरणा पुंज-अन्तर्मन से स्वतः प्रेरित होना है।विशेषज्ञता-कहानी लेखन में है तो रुचि-पठन-पाठन में है।

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