मेरा मन

विजयलक्ष्मी जांगिड़ ‘विजया’ 
जयपुर(राजस्थान)
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आज जीवन के
अंतिम पड़ाव पर,
जब बहुत पास है
मृत्यु,
मुझे एक पल
दिया ईश्वर ने,
अपने सबसे
अजीज दोस्त से मिलने को,
सब कुछ धूमिल था…
एक अहसास-सा
मुझे छू रहा था,
मैंने पूछा-कौन हो तुम ?
उसने कहा-
तुम्हारा ‘मन’,
आज ये पल बस मेरा
तुम्हारा है,
सबसे दूर
बस खुद से बात
मुझसे ही बात करो,
मैं पूछ बैठी उससे
तुम कैसे हो प्रिय ?
उसने कहा-
अब भी याद हूँ मैं  तुम्हें ?
मैंने कहा-
भूली कब,
मन मुस्कुराया
और कुछ न बोला,
फिर मैंने उसके
मौन को
पढ़ा,
पहली बार
और मेरी आँखें भर आईं,
आखिर वो ही था
जो मुझे समझता था,
मगर में
दुनिया को
समझने में ही
व्यस्त थी,
हर बार।
जब उसने मुझसे
मांगा थोड़ा,
बस थोड़ा-सा वक़्त
मुझे समाज की
परिवार की,
फिक्र हुई
वो चुप हो रहा
बस प्रतीक्षा की,
अनन्त
मुझे मेरी ही
जरूरत है,
ये समझता रहा
और मैं
उलझी रही,
और…
जरूरतों को
पूरी करने में
वो सिकुड़ता रहा,
भीतर ही भीतर
मैं देख न सकी
उसकी घुटन,
सहला न सकी
उसकी थकन,
उसने कई बार
मुझे बात करनी चाही,
किन्तु मुझे
अपने व्यवसाय की चिंता में
संलग्न देख,
वो फिर मुस्काया
और चुप हो गया,
बस एक पल के
इंतजार में…।
मैं सजाती रही
घर-आँगन,
अपना तन और जीवन
पर नहीं चुनी
एक भी घड़ी,
उसके लिए।
क्यों वो मेरा अपना,
मेरे ही भीतर
मेरे ही लिए
तरसता रहा,
और फिर भी
मेरे साथ चलता रहा।
सोचती हूं,
प्रश्नों,उलझनों और
ढेरों समस्याओं का
तोहफा ही उसे दिया मैंने,
और उसने
एक प्यारे साथी की तरह
सब स्वीकार किया,
बस एक पल की
चाह में,
आज भी आया हूँ मैं
तुम्हारा ‘मन’,
उसने मेरा
हाथ थामते हुए कहा
तुम्हें एक पल
सुकून देने,
तुमसे
तुम्हीं को मिलने
रुका हूँ।
काश! इस एक पल को,
मैंने कभी…कभी
जिया होता,
मैं क्यों
भूलती रही
उसी को,
जो सिर्फ मेरी
खतिर धड़कता रहा,
आज जब कोई साथ नहीं
बस वही मेरे साथ है,
मेरा ‘मन’॥

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