मेरी हिन्दी…सबसे अंतरंग सहेली

लिली मित्रा
फरीदाबाद(हरियाणा)
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हिन्दी दिवस स्पर्धा विशेष……………………….
 मेरी हिन्दी!!! मेरी सबसे अंतरंग सहेली!!, जो मेरे मन के उछलते-कूदते मसखरे भावों को शब्द देती है। कुछ भी कैसे भी उड़न-चंडी से बौखलाए ख्याल,बे-सिर-पैर की कल्पनाओं के बेताली भूत या फिर बहुत घनीभूत भावों के सावनी मेघ गड़गड़ाते हैं,तब शब्द वर्षा कर हृदय के तपते धरातल को अभिव्यक्ति की सोंधी गीली माटी देती है,जिसके शब्दों का सहारा मेरी आत्म अभिव्यक्ति को संतुष्टि का चरम प्रदान करता है।
      मुझे मेरी जैसी लगती है,कभी मनचली,कभी हठधर्मी,कभी फक्कड़, कभी अलसाई,कभी शान्त।
हृदय से मस्तिष्क तक इसने मुझे सम्मोहित कर अपने प्रेमपाश से वशीभूत कर रखा है,और अब मैं पूरी तरह इसकी गिरफ्त में हूँ। सच कहूं तो इसकी व्याकरण,इसके उपमान,इसके रूपक ,अक्षर,शब्द,वाक्य या कहूं इसका सारा वजूद इतना घुलनशील है कि मैं आज तक समझ नहीं पाई कि ये मुझमें घुली है या मैं इसमें विलय हो गई ?? लिखते वक्त ये मेरी ताल पर नाचती है,या बड़ी चतुराई से अपनी डुगडुगी पर मुझे नचाती है ??? नौ रसों का शरबत बड़े कौशल के साथ फेंटवाकर सबमें बंटवा देती है।
        ना जाने कितनी विविधता लिए, अपने सरलतम,सहजतम रूप से इसने मुझे अपनी तरफ ऐसा आकर्षित किया ,और वह आकर्षण कब थोड़ी नोक-झोंक,मान-मनुहार के साथ गहनतम प्रेम में परिवर्तित हो गया,पता ही नहीं चला ???
      हाँ, ‘प्रेम’ ना जाने यह ‘ढाई आखरी’ शब्द कितने रुपों में इस सृष्टि में अपना अस्तित्व रखता है कहना मुश्किल है। कई बार हुआ ऐसा कि मैं भटकी,इधर-उधर,खुली खिड़कियों से दिखने वाले सीमित अभिव्यक्ति-व्योम की तरफ लपकी,पर मेरी हिन्दी शायद मेरी तुलना में,मुझसे भी अधिक मुझे प्रेम करती है। इसने मुझे खुद को इतना लचीला,इतना जल सम,सहृदयी,सहिष्णु,और विशाल हृदयी बना डाला,और मुझे खिड़कियों के फ्रेम में घिरे आसमान से बाहर निकाल असीम अभिव्यक्ति लोक दे डाला,जहाँ मुझे कोई बंधन नहीं दिखता। मैं अंतर के भावों को अपनी इच्छानुसार आकार देने लगी। यहाँ कोई कोना नहीं दिखाता मुझे,दिखता है तो एक वृहद विस्तृत विस्तार,जहाँ ना शब्दों का अभाव है,ना किसी बाह्य विदेशी,शब्द के लिए अस्वीकृति,जो हर दशा,हर देशकाल को व्यक्त करने में समर्थ है।
        सबसे सुन्दर बात मेरी हिन्दी सुशील है,सरल है,सरस है,और हर रूप में स्वीकार्य है!!! शब्दकोश में महासागर है,चाहे जितने नीचे जाकर गोता मारो, सदा रत्नगर्भा-सी झिलमिलाती-मुस्कुराती मिलती है।
         मेरा मन नही था कि हिन्दी दिवस पर मैं,या तो इसके समृद्ध खजाने से निकाल मुक्ता मणि उड़ाऊँ! आलोचना करूं! इसको अधिक से अधिक लोगों तक कैसे पहुँचाया जाए,इस पर सुझाव दूँ ,या इसके बिगड़ते स्वरूप को सुधारने हेतु समाधान लिखूं!
     मेरा मन नहीं था,मैं मेरी हिन्दी को फटी-चीथड़ी-दयनीय दिखाकर लोगों के आगे इसके प्रति सांत्वना या ‘सहानुभूति’ की गुहार लगाऊँ।
      मैं तो अपनी सबसे अंतरंग,मेरे हर प्रकार के भावों की ‘अभिव्यक्ति संगिनी’ हिन्दी को उसके प्रति मेरे मन की गहराइयों तक बह रही तरल,ठोस,वाष्पित हर प्रकार के प्रेम बिना किसी लीपा-पोती के विशुद्धतम् रूप में सम्प्रेषित कर सकूं।
मेरे विवेक,मेरी भावुकता,मेरी चेतन-अवचेतन बुद्धि द्वारा हिन्दी दिवस पर इससे सकारात्मक अभिव्यक्ति दूजी नहीं सूझी। भारत माँ के माथे की बिन्दिया के साथ-साथ ये मेरे माथे की बिन्दिया-सी सदा मेरे हृदय कपाल पर जगमगाती रहे।
परिचय- ब्लॉग पर भी लेखन में सक्रिय लिली मित्रा का निवास फरीदाबाद (हरियाणा)में है। आपने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर(राजनीति शास्त्र) किया है एवं लेखन तथा नृत्य के प्रति विशेष लगाव से कार्य निष्पादन करती हैं। लिली मित्रा की रचनाएं कई ऑनलाइन पत्रिकाओं में श्रेष्ठ रुपक एंव श्रेष्ठ ब्लाॅग के रुप में चुनी गई हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन काव्य,बाल कविताएं,कहानियां एवं लघुकथा के रुप में हो चुका है। श्रीमती मित्रा हिन्दी भाषा के प्रति स्वाभाविक आकर्षण रखती हैं। इनके अनुसार भावनाओं की अभिव्यक्ति साहित्य एवं नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत करने का यह आरंभिक सिलसिला है। इनकी रुचि नृत्य,लेखन,रसोई और साहित्य पाठन विधा में भी है। कुछ समय पहले ही लेखन शुरू करने वाली श्रीमती मित्रा बतौर गृहिणि शौकिया लेखक हैं। आपकी विशेष उपलब्धि में एक समूह द्वारा आयोजित काव्यलेखन स्पर्धा में दिल्ली के ‘एवान-ए-ग़ालिब’ में ‘काव्य शिखर’ सम्मान,ऑनलाइन वेबसाइट पर कई लेख ‘बेस्ट ब्लाॅग’ एंव ‘फीचर्ड’ सहित एक वेबसाइट पर दो बार ‘शीर्षस्थ कवि’ सूची में नाम आना है। लेखन विधा-स्वतंत्र सृजन,आलेख,बाल रचनाएं है। आपकी लेखनी का उद्देश्य हिन्दी भाषा के प्रति अनुराग है।

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