मैं तो हर बात नई कहता हूँ

शिवम द्विवेदी ‘शिवाय’ 
इंदौर (मध्यप्रदेश)
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सोचता हूँ,बिसराता हूँ,बात वही कहता हूँ,
समझोगे कैसे ? मैं तो हर बात नई कहता हूँ।
सम्बन्ध नहीं रखता हूँ,फासले बनाकर रखता हूँ,
कभी भी आज़मा लेना तुम,ओ! आज़माने वालों
हैसियत से परे जाकर के भी,बात सही करता हूँ,
देशभक्त हूँ,देशद्रोह की बात नहीं करता हूँ
मैं तो हर बात नई कहता हूँ।
जो अज़नबी हैं,आओ इत्तेला कर लो,
क्या पता कब तक साथ में,जिगर-जान रखता हूँ
भीतर का तो मत पूछो,थोड़ा शहद छुपाकर रखता हूँ,
क़दमों में विश्वास,चेहरे पे दिलखुश मिज़ाज़  रखता हूँl
गैरों के लिए भी वही,अपनों के लिए भी एक-सा बर्ताव,
नहीं चाहता किसी की गैरमौज़ूदगी में एक भी पल का पछतावा
सारे यहाँ दुनिया भर की बात करते हैं,
धर्म,रंग,देश,जाति की खबर रखते हैं
अरे! मैं साधारण-सा इंसान,इंसान की बात करता हूँ,
समझोगे कैसे ? मैं तो हर बात नई कहता हूँ।
मुझे नहीं गुमान फ़िज़ूल का,लहज़े में अदब रखता हूँ,
ना हाथ में मेरे पेड़ों से फलदार
फिर भी ज्यादातर देने का नजरिया रखता हूँ,
खुद की कोई बिसात नहीं तो क्या हुआ,
हर-क्षण ओहदा दिल का दरिया रखता हूँ।
चिढ़ता हूँ,यदि कोई कंधे पे हाथ धर दे,
शाबाशी वो नहीं तो तार-तार कर दे
ये तो वो जाम है जो रूह गुलज़ार कर दे,
मैं तो सिर्फ आशीर्वाद जतन कर रखता हूँ
मैं हर बात नहीं कहता हूँ,
समझोगे कैसे,मैं हर बात नई कहता हूँ।
मुझे ख़ौफ़ज़दा ज़िंदगी मंजूर नहीं,
माँ-बाप से बड़ा मेरे लिए कोई हुज़ूर नहीं
मैं नीम का कड़वा झाड़ ही सही,पर मैं बिन घोंसले का खजूर नहीं,
मैं कहाँ कुछ लिखा करता हूँ,ये तो ज़ज़्बात पढ़ा करता हूँ,
बड़ी दूर और ऊँची है मंज़िल,मैं तो सिर्फ नसेनी चढ़ा करता हूँ।
बीमारी से दूर रहो,भोजन भी भरपूर करो,
बच्चों से सेवा पाना हो,तो माँ-बाप की सेवा खूब करो
सुखमय जीवन जीना हो,तो वृक्षारोपण खूब करो,
मैं भी गाय को चारा देता हूँ,शर्म नहीं मैं करता हूँ
ज़िस्म-ए-ख़ाक़ ही अरबों के मालिक होते हैं,
मैं भी हूँ जमींदार का बेटा,गांव से ताल्लुक रखता हूँ
अरे ओ! लाटसाहब,मैं भी…
समझोगे कैसे,मैं तो हर बात नई कहता हूँ।
सोचता हूँ,बिसराता हूँ,बात वही कहता हूँ,
समझोगे कैसे ? मैं तो हर बात नई कहता हूँll

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