मैं : पुरुष

 ओम अग्रवाल ‘बबुआ’
मुंबई(महाराष्ट्र)
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बूढ़ी माँ की आँखें रौशन उन आँखों की ज्योति हूँ,
और पिता नित जपते हैं,मैं उस माला का मोती हूँ।
नित्य मांग वो भर लेती है उसका तो सिंदूर हूँ मैं,
मौन अधर की हर चाहत का सत्य सदा मंजूर हूँ मैं॥
छोटे-छोटे बच्चों पर मैं तरुवर की सी छाया हूँ,
मनभावों में बहनों के हित नेह ढूँढकर लाया हूँ।
छोटे-छोटे भाई उनकी आशाओं का सागर हूँ,
स्याह तिमिर का बैरी हूँ,मैं खुद में एक दिवाकर हूँ॥
हे मित्र आप हो कृष्ण और मैं स्वयं सुदामा बन जाऊँ,
आप निहारें नयन हमारे और उन्हें मैं छलकाऊँ।
सत्य यही है हर सुयोग में हाथ नहीं पीले होते,
छिप-छिपकर मैं रोता हूँ,पर नेत्र नहीं गीले होते॥
पुरुषों पर फिर जाने क्यूँ ये संसार सशंकित होता है,
कुछ लोगों के कारण ही पुरुषत्व कलंकित होता है।
सत्य कहूँ तो पुरुषों की बस इतनी सिर्फ कहानी है,
कर्तव्यों के बंधन हैं,फिर इन आँखों में पानी है॥
परिचय-ओमप्रकाश अग्रवाल का साहित्यिक उपनाम ‘बबुआ’ है।आप लगभग सभी विधाओं (गीत, ग़ज़ल, दोहा, चौपाई, छंद आदि) में लिखते हैं,परन्तु काव्य सृजन के साहित्यिक व्याकरण की न कभी औपचारिक शिक्षा ली,न ही मात्रा विधान आदि का तकनीकी ज्ञान है।आप वर्तमान में मुंबई में स्थाई रूप से सपरिवार निवासरत हैं ,पर बैंगलोर  में भी  निवास है। आप संस्कार,परम्परा और मानवीय मूल्यों के प्रति सजग व आस्थावान तथा देश-धरा से अपने प्राणों से ज्यादा प्यार है। आपका मूल तो राजस्थान का झूंझनू जिला और मारवाड़ी वैश्य है,परन्तु लगभग ७० वर्ष पूर्व परिवार उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में आकर बस गया था। आपका जन्म १ जुलाई को १९६२ में प्रतापगढ़ में और शिक्षा दीक्षा-बी.कॉम.भी वहीं हुई है। आप ४० वर्ष से सतत लिख रहे हैं।काव्य आपका शौक है,पेशा नहीं,इसलिए यदा-कदा ही कवि मित्रों के विशेष अनुरोध पर मंचों पर जाते हैं। लगभग २००० से अधिक रचनाएं आपने लिखी होंगी,जिसमें से लगभग ७०० का शीघ्र ही पाँच खण्डों मे प्रकाशन होगा। स्थानीय स्तर पर आप कई बार सम्मानित और पुरस्कृत होते रहे हैं। आप आजीविका की दृष्टि से बैंगलोर की निजी बड़ी कम्पनी में विपणन प्रबंधक (वरिष्ठ) के पद पर कार्यरत हैं। कर्नाटक राज्य के बैंगलोर निवासी श्री  अग्रवाल की रचनाएं प्रायः पत्र-पत्रिकाओं और काव्य पुस्तकों में  प्रकाशित होती रहती हैं। आपकी लेखनी का उद्देश्य-जनचेतना है।     

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