मैं प्रकृति हूँ…

प्रो.स्वप्निल व्यास
इंदौर(मध्यप्रदेश)
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पर्यावरण दिवस विशेष…………………………..
मैंने तुमको जल दिया,तुमने मुझको दर्द दिया,
मैंने तुमको अन्न दिया,तुमने मुझको भंग किया।
मैं प्रकृति हूँ,मैं पर्यावरण हूं,मैं प्रकृति हूँ…॥

मैंने तो पोषण किया पर,तुमने मेरा शोषण किया,
मैंने सबका भार सहा पर,सबने मुझ पर वार किया।
मैं प्रकृति हूँ,मैं पर्यावरण हूं,मैं प्रकृति हूँ…॥

मेरी छाती छलनी करके,तुमने मुझको बाँझ किया,
मैंने आबाद संसार दिया,तुमने उसको बर्बाद किया।
मैं प्रकृति हूँ,मैं पर्यावरण हूं,मैं प्रकृति हूँ…॥

लेकिन माँ हूं और सहूंगी पर,फिकर तुम्हारी करती हूँ,
जल,जंगल,जमीन,जानवर सबकी बातें करती हूँ।
मैं प्रकृति हूँ,मैं पर्यावरण हूं,मैं प्रकृति हूँ…॥

मुझे मिटाकर क्या मिलेगा,मैं ही तो तुम्हारी हस्ती हूँ,
मैंने अपना फर्ज निभाया,अब तुमसे उम्मीद करती हूँ।
मैं प्रकृति हूँ,मैं पर्यावरण हूं,मैं प्रकृति हूँ…॥

परिचय-प्रो.स्वप्निल व्यास का निवास इंदौर में ही है। आपकी जन्मतिथि ३ जुलाई १९८४ तथा जन्म स्थान-इंदौर है।  मध्यप्रदेश राज्य के इंदौर वासी प्रो.स्वप्निल व्यास ने वाणिज्य में स्नातक पश्चात पत्रकारिता में भी स्नातक-स्नातकोत्तर उपाधि हासिल करने के साथ ही पीजीडीबीए,एमबीए,समाज कार्य विषय में एवं लोक प्रशासन में स्नातकोत्तर कर लिया है। आपका कार्य एक निजी महाविद्यालय में सहायक प्राध्यापक का है। सामाजिक गतिविधि-के अंतर्गत सामुदायिक परामर्शदाता का कार्य भी करते हैं। आपकी लेखन विधा-लेख और कविता है,जबकि प्रेरणा पुंज-माता-पिता हैं। स्वप्निल जी के लेखन का उद्देश्य-जागृति,संवाद के लिए स्वतन्त्र लेखन करते रहना है।

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