मैं बुजुर्ग हो चला…

सुनील चौरे ‘उपमन्यु’ 
खंडवा(मध्यप्रदेश)

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मेरे लल्ला देखो,
मैं बुजुर्ग हो चला
समय ने मुझको बहुत,
बहुत ही छला।
थी बहुत आवश्यकता मुझे
इस उम्र में तुम्हारी माँ की,
कर अकेला मुझे ‘उसने’
उसकी जां ली,
मुझे पता नहीं
पूर्व के क्या थे प्रारब्ध मेरे ?
जो सजा मुझे यह दी,
नहीं बोलती अब वह
रूंध जाता पुकारते गला।
मेरे लल्ला देखो,
मैं बुजुर्ग हो चला
समय ने मुझको बहुत,
बहुत ही छला।
अब तुम्हें ही रखना होगा-
अपना-अपना ध्यान,
नाते रिश्तेदारों,अपने-परायों से
भरी दुनिया का रखना होगा ज्ञान,
बनाए रखना
दयाभाव से परिपूर्ण जीवन,
और बनेे रहना दयावान
भाँति-भाँति के लोग यहाँ,
जिनमे कूट-कूट के भरी
नुकसान पहुँचाने की कला,
करना न चिंता उनकी
करते रहना तुम भला।
मेरे लल्ला देखो,
मैं बुजुर्ग हो चला
समय ने मुझको बहुत,
बहुत ही छला।
धीरे-धीरे अशक्त हो रहा,
अपने ही बोझ को मैं सह रहा
आँखें भी निंद्राग्रस्त हो रही,
इस अवस्था को आवा-जाही कहीं,
अब तो बस इतना कर लेना
कर महेनत अपनी जमीं बना लेना,
कभी आ जाए आगन्तुक तो
उसे पनाह देना,
मैं रहूं,न रहूं…
ये ही कर्म तुम्हारे काम आएंगे,
मैं तो जन्म लेते ही बुजुर्ग तक,
इन्हीं कर्मों में पला।
मेरे लल्ला देखो,
मैं बुजुर्ग हो चला
समय ने मुझको बहुत,
बहुत ही छला॥
परिचय-सुनील चौरे का उपनाम ‘उपमन्यु’ है। सुनील चौरे ‘उपमन्यु’ की जन्मतिथि २० अप्रैल १९६० है। आपने वाणिज्य में स्नातक सहित विधि और अन्य विषय में स्नातकोत्तर भी किया हुआ है। विभिन्न समाचार पत्रों में आपके रचित व्यंग्य लेख एवं कविता  प्रकाशित हैं। नुक्कड़ नाटकों में गहन रुचि रखने वाले श्री चौरे विभिन्न संस्थाओं द्वारा अभिनंदित हैं। ऐसे ही मुम्बई में टेलीफिल्म ‘भारत की शान’  कार्यक्रम में पंच परमेश्वर के रूप में निर्णायक भी रहे हैं। आपकी दो पुस्तकें प्रकाशनाधिन हैं। आपका निवास खंडवा(मध्यप्रदेश) स्थित रामेश्वर रोड पर है। आप कक्षा आठवीं से ही लेखन कर रहे हैं। इस अनवरत यात्रा में ‘मेरी परछाईयां सच की’(काव्य संग्रह) हिन्दी में अलीगढ़ से,व्यंग्य संग्रह ‘गधा जब बोल उठा’ जयपुर से,बाल कहानी संग्रह ‘राख का दारोगा’ जयपुर से तथा बाल कविता संग्रह भी जयपुर से ही प्रकाशित हो चुका है। एक कविता संग्रह हिन्दी में ही प्रकाशन की तैयारी में है। श्री चौरे के नाम लोकभाषा निमाड़ी में ‘बेताल का प्रश्न’ व्यंग्य संग्रह भी है तो,निमाड़ी काव्य संग्रह स्थानीय स्तर पर प्रकाशित है। आपका निवास खंडवा में है। आडियो कैसेट,विभिन्न टी.वी. चैनल पर आपके कार्यक्रम प्रसारित होते रहते हैं। साथ ही आप अखिल भारतीय मंचों पर भी काव्य पाठ के अनुभवी हैं। परिचर्चा भी आयोजित कराते रहे हैं तो अभिनय में नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से साक्षरता अभियान हेतु कार्य किया है। जीवन संगिनी को वक्ष केन्सर से खो चुके श्री चौरे को साहित्य-सांस्कृतिक साहित्य-सांस्कृतिक कार्यक्रमों में वे ही अग्रणी करती थी। आप वैवाहिक जीवन के बाद अपने लेखन के मुकाम की वजह अपनी पत्नी को ही मानते हैं।

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