मैं माँ भारती की जुबां हूँ..

जीवनदान चारण ‘अबोध’  
पोकरण(राजस्थान) 
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मैं माँ भारती की जुबां हूँ,मैं हिन्दी हूँ,फिर भी बहुत दुखी हूँ। स्तब्ध हूँ। समझ में नहीं आता कहाँ से शुरू करूँ ? कैसे शुरू करूँ ? मैं जिसकी पहचान इस देश से है,इसकी माटी से है। इसके कण-कण से है। यकायक अपने ही आँगन में बेइज्जत कर दी गई! कहने को संविधान के अनुच्छेद ३४३ में मुझे राजभाषा का दर्जा प्राप्त है। अनुच्छेद ३५१ के अनुसार संघ का यह कर्तव्य है कि वह मेरा प्रसार बढ़ाएं,पर आज यह सब मुझे क्यों कहना पड़ रहा है ? नहीं जानती थी मेरा किसी ‘राज्य’ की विधानसभा में किसी ‘जुबान’ पर आना ऐसा शर्मनाक तांडव रच सकता है।
मन बहुत दुखता है,जब मुझे अपनी ही संतानों को यह बताना पड़े कि मैं भारत के ७० प्रतिशत गाँवों की अमराइयों में महकती हूँ। मैं लोकगीतों की सुरीली तान में गूंजती हूँ। मैं नवसाक्षरों का सुकोमल सहारा हूँ। मैं जनसंचार का स्पंदन हूँ। मैं कलकल-छलछल करती नदिया की तरह हर आम और खास भारतीय हृदय में प्रवाहित होती हूँ। मैं मंदिरों की घंटियों,मस्जिदों की अजान,गुरुद्वारे की शबद और चर्च की प्रार्थना की तरह पवित्र हूँ,क्योंकि मैं आपकी,आप सबकी-अपनी हिन्दी हूँ।
मेरा विश्वास करो,कि मैं दिखावे की भाषा नहीं हूँ,मैं झगड़ों की भाषा भी नहीं हूँ। मैंने अपने अस्तित्व से लेकर आज तक कितनी ही सखी भाषाओं को अपने आँचल से बाँधकर हर दिन एक नया रूप धारण किया है। फारसी,अरबी,उर्दू से लेकर ‘आधुनिक बाला’ अंग्रेजी तक को आत्मीयता से अपनाया है। सखी भाषा का झगड़ा मेरे लिए नया नहीं है। इससे पहले भी मेरी दक्षिण भारतीय ‘बहनों’ की संतानों ने यह स्वर उठाया था,मैंने हर बार शांत और धीर-गंभीर रहकर मामले को सहजता से सुलझाया है,लेकिन इस बार मेरी अनन्य सखी मराठी की संतानें मेरे लिए आतंक बनकर खड़ी हैं। इस समय जब,सारे देश में विदेशी ताकतों का खतरा मँडरा रहा है,ऐसे में आपसी दीवारों का टकराना क्या उचित है ?
कैसे समझाऊँ और किस-किसको समझाऊँ ? मैं क्या कल की आई हुई कच्ची-पक्की बोली हूँ,जो मेरा नामो-निशान मिटा दोगे ? मैं इस देश के रेशे-रेशे में बुनी हुई,अंश-अंश में रची-बसी ऐसी जीवंत भाषा हूँ,जिसका रिश्ता सिर्फ जुबान से नहीं,दिल की धड़कनों से हैं। मेरे दिल की गहराई का और मेरे अस्तित्व के विस्तार का तुम इतने छोटे मन वाले भला कैसे मूल्यांकन कर पाओगे ? इतिहास और संस्कृ‍ति का दम भरने वाले छिछोरी बुद्धि के प्रणेता कहाँ से ला सकेंगे वह गहनता, जो अतीत में मेरी महान संतानों में थी।
मैंने तो कभी नहीं कहा कि,बस मुझे अपनाओ। बॉलीवुड से लेकर पत्रकारिता तक और विज्ञापन से लेकर राजनीति तक हर एक ने नए शब्द गढ़े,नए शब्द रचे,नई परम्परा,नई शैली का ईजाद किया। मैंने कभी नहीं सोचा कि,इनके इस्तेमाल से मुझमें विकार या बिगाड़ आएगा। मैंने खुले दिल से सब भाषा का,भाषा के शब्दों का,शैली और लहजे का स्वागत किया। यह सोचकर कि,इससे मेरा ही विकास हो रहा है। मेरे ही कोश में अभिवृद्धि हो रही है। अगर मैंने भी इसी संकीर्ण सोच को पोषित किया होता कि,दूसरी भाषा के शब्द नहीं अपनाऊँगी तो भला यहाँ तक उद्दाम आवेग से इठलाती-बल खाती कैसे पहुँच पाती ?
मैंने कभी किसी भाषा को अपना दुश्मन नहीं समझा। किसी भाषा के इस्तेमाल से मुझमें असुरक्षा नहीं पनपी,क्योंकि मैं जानती थी कि मेरे अस्तित्व को किसी से खतरा नहीं है,पर महाराष्ट्र विधानसभा की घटना से एक पल के लिए मेरा यह विश्वास डोल गया था।
पिछले दिनों मैं और मेरी सखी भाषाएँ मिलकर त्रिभाषा समीकरण पर सोच ही रही थी,लेकिन इसका अर्थ यह तो कतई नहीं था कि हमारी संतान एक-दूसरे के विरुद्ध नफरत के खंजर निकाल लें। यह कैसा भाषा-प्रेम है ? यह कैसी भाषाई पक्षधरता है ? क्या ‘माँ’ से प्रेम दर्शाने का यह तरीका है कि,’मौसी’ की गोद में बैठने पर अपने ही भाई के मुँह पर तमाचा मार दो ? क्या लगता है आपको,इससे ‘मराठी’ खुश होगी ?,नहीं हो सकती। हम सारी भाषाएँ संस्कृत की बेटियाँ हैं। बड़ी बेटी का होने का सौभाग्य मुझे मिला,लेकिन इससे अन्य भाषाओं का महत्व कम तो नहीं हो जाता,पर यह भी तो सच है ना कि मुझे अपमानित करने से मराठी का महत्व बढ़ तो नहीं गया ?
यह कैसा भाषा गौरव है जो अपने अस्तित्व को स्थापित करने के लिए स्थापित भाषा को उखाड़ देने की धृष्टता करे। मुझे कहाँ-कहाँ पर प्रतिबंधित करोगे ? ‍पूरा महाराष्ट्र तो बहुत दूर की बात है,अकेली मुंबई से भी मुझे निकाल पाना संभव नहीं है। बरसों से भारतीय दर्शकों का मनोरंजन कर रहे फिल्म उद्योग से पूछकर देख लो कि,क्या मेरे बिना उसका अस्तित्व रह सकेगा ? कैसे निकालोगे लता के सुरीले कंठ से,गुलजार की चमत्कारिक लेखनी जो ‘मन’ से सबको भाए ना कि ‘मनसे’ सबको डराए। अपनी सोच को थोड़ा-सा विस्तार दो,मैं आपकी भी तो हूँ। बस इतना ही,धन्यवाद..l

परिचय-जीवनदान चारण का बसेरा  पोकरण(राजस्थान) में है। ‘अबोध’  आपका साहित्यिक उपनाम है। इनकी जन्म तारीख १३ जुलाई १९९४ एवं जन्म स्थान गांव पोस्ट आरंग है। श्री चारण का स्थाई पता आरंग(जिला बाड़मेर)है। परम्पराओं के लिए प्रसिद्ध राज्य राजस्थान के अबोध ने बी.एड. सहित बी.ए. और एम.ए. की पढ़ाई की है। आपका कार्यक्षेत्र अध्यापक (विद्यालय-पोकरण) का है। सामाजिक गतिविधि के अन्तर्गत आप समाज सुधार,प्रचलित कुप्रथाओं को दूर करने के लिए अपने विचारों से सतत सक्रिय रहते हैं। लेखन विधा-दोहे,श्लोक,ग़ज़ल, कविता(विशेष-संस्कृत में गीत,श्लोक, सुभाषित, लेख भी।) है। प्रकाशन में  ‘कलम और कटार’ (किताब)आपके नाम है तो रचनाओं का प्रकाशन पत्र-पत्रिका में भी हो चुका है। आपकी विशेष उपलब्धि-संस्कृत साहित्य में लेखन करना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-ईश्वर उपासना,देवी गुणगान और देशभक्ति है।  आपके लिए प्रेरणा पुंज स्वामी विवेकानंद जी हैं।

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  1. महान और साहित्यिक दृष्टि से अनुपम कृति’ लहार लोकतंत्र की ‘ मेरे परम मित्र अबोध को हार्दिक शुभकामनाएं

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