मैं हूँ इतिहास

कनकप्रिया
इंदौर(मध्यप्रदेश)
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मैं ही हूँ इतिहास देश का,
मैं राजपूत,मैं राजपूत,मैं क्षत्रिय।
मिटा सको तो मिटाकर देखो मुझको,
हटा सको तो हटाकर देखो मुझको।
कण-कण में छुपा हूँ,रज-रज में बसा हुआ मैं,
राजस्थान के रेगिस्तान में किलों की उंची दीवारों में
हल्दी घाटी के मैदान में,वहां की रक्त तलैया में,
अंग-अंग बिखरे थे,धड़ से अलग हुए सिर
रक्त सने धरा पर बिखरे थे,
जो पहले हुंकार विजय की भरते थे।
तलवारें अब भी कटी भुजा में जकड़ी थी।
ढाले देह को जकड़े थी,गिद्धों का अम्बार लगा था,
कैसा ये घनघोर दृश्य था,काल गर्जना करता था।
दौड़ रहे थे घोडे़ जो सरपट कर चिंकार,
पड़े हुए थे घायल,क्षत-विक्षत,निर्जीव अनेक।
कांप रही थी रणभूमि जिन हाथियों की चिंघाड़ों से,
खड़े हुए थे अपने बेजान अपने निर्जीव सवारों की देह के पास
गूंज के उलट-पुलट,उन्हें हिला-हिला परखते थे,
उस ताल तलैया में उस हल्दी जैसी पीली मिट्टी में
मैं रचा करता हूँ,मिट्टी कुछ हटाकर तो देखो।
अवशेषोें से ये मेरी ही पटी हुई है।
मैं क्षत्राणी कनकप्रिया पृथ्वीराज चैहान की वंशज
आव्हान तुझसे करती हूं।
त्याग,तीज,अभिमान,ईर्ष्या,मान-अपमान अपनों की पहचान कर,
रक्त से रंजित पड़ी हुई है,मिट्टी ये राजस्थान की।
करो तिलक उस पवित्र रज से,
माथे पर,अपने मन में प्रण तो आज कर
राजपूताने के शौर्य का इतिहास फिर से दोहराया जाएगा।
पर मनमुटाव का,आपस की खींचतान का,
विचार इसी मिट्टी में,दुश्मनों-सा दफनाया जाएगा।
महारानी पद्मिनी के शौर्य में छिपी विवशता की पहचान कर,
जब घेरा था दुश्मन ने चितौड़ को,
कहां गए थे राजे-महाराजे? जब ज्वाला धधकती में कूद रही थी वीर बालाएं।
सोलह हजार एक भाई सारे कहां गए थे ?
जल गई जीते जी,भयंकर आग में,
जो ललनाएं जीवनभर रक्षा का वादा करने वाला कोई भाई वहां नहीं आया।
क्या सचमुच यह हमारा शौर्य दिवस है ? या है शर्म से सिर झुकाने का इतिहास!
नहीं सानी विश्व में कोई ऐसी कुंजी,
बचाने अपनी आन और लाज।
जल गई जीते-जी बहू-बेटियां,
सोलह हजार अपने खुबसूरत नाजुक तन लिए
चित्तौड़ की महारानी पद्मिनी के साथ।
जो ललनाएं ना कर पाई जौहर,लेकिन हर दिन जीते-जी जली चिता पर।
अब भी स्वप्न कितनों का होता,उनका हिसाब हमें रखना है।
उनकी रक्षा हमें करना है। हे युवाओं आव्हान तुम्हारा
प्रतापसेना का निर्माण करो,सत्यार्थी जैसे सपूतों से लो प्रेरणा।
ताकि उत्थान करो,कितनी अबलाएं अब भी सिसक रही हैं।
अंधेरों,कोने और कुचालों में।
बढ़ा दो हाथ उनकी ओर,जीवन उनका ला दो।
ना भूलो गाड़ियां लौहारों ने घर अपना अभी तक न बनाया है,
महाराणा का वंशज खुद को कहते हैं।
आग सीने में जलती हुई उनके,
अब भी सीने प्रज्जवलित कर अग्नि को रोज ही खुद को तपाते हैं।
लेकिन अफगानिस्तान से लाई पृथ्वी माटी को
हम वीराने में छोड़ आते हैं।
कर दिया न्यौछावर सर्वस्व इस देश पर जो सब इस देश  की धाती है।
हमारा गौरव है,इतिहास है,साक्षी इतिहास के हैं।
गौरवगाथा खुद हमको उनकी गानी होगी,
आज की युवा पीढ़ी तक पहुंचाना होगा।
वर्ना ना कोई प्रताप,पद्मिनी,दुर्गा,शिवाजी इस पृथ्वी पर होेंगे,
केवल उनका मांस बेचने वाले गीदड़ होेंगें।
हे राजपूतों जागो,हे क्षत्रियों जागो,
फिर से समय ने देश ने तुमको पुकारा है।
करें शस्त्र धारण अपने देश का उत्थान करें,
देश में छिपे दुश्मनों से देश की रक्षा करें।
चुन दिए दीवारों में जिंदा मासूम लोग,
गुरू गोविंद सिंह जी के पुत्र प्यारे
कटा दिया सिर पिता ने,चढ़ गए बलि वेदी पर देश की।
प्राण प्यारे पुत्र सारे।
तब गुरूजी ने आश्रित हो आश्रम में एक वास किया,
जहां देख एक बेरागी राजपूत सिंह बादासिंह को
गुरू गोविंद सिंह जी ने यह हुंकार भरी,
हे राजपूत बेराग तुम्हारा काम नहीं,क्षत्रिय हो,क्षत्रिय-सा काम करो।
उठा लो तलवार हाथों में दुश्मनों का संहार करो।
तब सुन उपदेश गुरू जी का बादा ने निज धर्म जगाया था,
उठा शस्त्र अपने कहर का शत्रुओं पर पहले सिख राज का निर्माण किया।
मेरा भी आव्हान यही है,हे क्षत्रियों तुमसे केसरिया साफे फिर से बांध लो,
देश की बागडोर फिर से अपने हाथ लो
भारतभूमि और विश्व का कल्याण करो।
सागर-सी गइराई तुममें,हिमालय-सी ऊंचाई तुममें।
आंधी से शक्तिमान तुम,पानी से तरल तुम,
सूरज-सा तेज तुममें,चांद-सी शीतलता भी
रामायण,महाभारत,गीता और पुराण में तुम।
राजा भी तुम,रंक भी तुम।
विजय तिलक मस्तक तुम्हारे,
सिर एक काला धब्बा भी
जब था भार देश रक्षा का तुम पर,
क्यों कर्तव्य अपना ना निभा सकें
देश अपना ना बचा सकें।
बाहर से आकर दुश्मन ने हम पर वार किया,
कह गए एक-एक हम मिलकर साथ एक-दूजे का ना प्रतिकार किया।
पाटकर सात समंदर एक-एक कर गोरों ने गुलाम हमें बना डाला,
देखते रहें पराजय एक-दूजे की,अपने मान-अपमान की कसौटी पर,
सालों की गुलामी इल्जाम तुम्हीं पर आता है।
इस कलंक को मिटा डालो,तो कसम कुल की अपने,
भारत का नव निर्माण करो।
मस्तक तुम उंचा करो॥
परिचय – कनकप्रिया का जन्मस्थान इंदौर है। आपकी रुचि-लेखन,संगीत,साहित्य और चित्रकला में है। बी.ए.(मनोविज्ञान)तक शिक्षित कनकप्रिया के प्रिय नायक -महाराणा प्रताप,रानी लक्ष्मीबाई,शिवाजी और वीर सावरकर हैं,जबकि प्रिय लेखक-महादेवी वर्मा, सुभद्राकुमारी चैहान एवं रामधारी सिंह दिनकर हैं। 

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