मोम के दिल पत्थर में बदल गए

डॉ.मंजूलता मौर्या 
मुंबई(महाराष्ट्र)
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जिस दिल में कभी बहार का मौसम हुआ करता था,
आज वहाँ बस वीरानियों का बसेरा है।
जिस चेहरे पर सदा मुस्कुराहट खिला करती थी,
आज उस पर खौफ़ ने डाला डेरा है॥
दिवाली में अब प्रेम की मिठाइयाँ कहाँ बँटती हैं,
होली भी तो बेरंग नज़र आती है।
ईद की सेवइयां भी अब फीकी-सी लगती हैं,
सावन के झूले भी मायूस से लगते हैं॥
जमाना क्या बदला,लोगों के हृदय भी बदल गए,
मोम के दिल आज पत्थर में बदल गए।
नदी के  मीठे जल-सा था लोगों का मन,
आज वह खारे समंदर में बदल गए॥
हवा का झोंका भी,कभी लाता था अपनों का संदेश,
प्यार हर दिल में बसा था,हो कोई भी देश।
पर आज हवा भी हमें डराती है,
अनजानी घटना की आशंका हृदय को कँपाती है॥
नसों में दौड़ता था प्रेम का जो रक्त,
नफरत की आग ने उसे स्याह कर दिया।
जुबाँ तो मन का द्वार हुआ करती थी,
आज लोगों ने उसे हथियार बना दिया॥
मधुर वचन जो घावों पर मरहम थे,
आज वही वचन बरछी और कटार बन गए।
जमाना क्या बदला,लोगों के दिल भी बदल गए,
मोम के दिल आज पत्थर में बदल गए॥
परिचय-डॉ.मंजूलता मौर्या का निवास नवी मुंबई स्थित वाशी में है। साहित्यिक उपनाम-मंजू है। इनकी जन्म तारीख-१५ जुलाई १९७८ एवं जन्मस्थान उत्तरप्रदेश है। महाराष्ट्र राज्य के शहर वाशी की डॉ.मौर्या की शिक्षा एम.ए.,बी.एड.(मुंबई)तथा पी.एच-डी.(छायावादोत्तर काव्य में नारी चित्रण)है। निजी महाविद्यालय में आपका कार्य क्षेत्र बतौर शिक्षक है। आपकी  लेखन विधा-कविता है। विशेष उपलब्धि शिक्षकों के लिए एक प्रकाशन की ओर से आयोजित निबंध प्रतियोगिता में पुरस्कृत होना है। मंजू जी के लेखन का उद्देश्य-चंचल मन में उठने वाले विविध विचारों को लोगों तक पहुँचाकर हिंदी भाषा की सेवा करना है। 
 

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2 Comments

  1. मेरा देश बदल रहा है यही है डिजिटल इंडिया की सच्चाई

  2. सुन्दर अति सुन्दर. परिवर्तन ज़रूरी है पर इस तरह का परिवर्तन नहीं चाहिए. ऐसी उन्नति किस काम की जो स्वार्थ और एकांकीपन को प्रोत्साहन दे.

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