यहाँ स्वर्ण मत खोज,यहाँ पर मानव ढलता है

डॉ. विकास दवे
इंदौर(मध्य प्रदेश )

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कहां से प्रारम्भ करुं,समझ नहीं पा रहा,चलिए का कात्रे जी से ही प्रारम्भ करें। पूरा नाम सदाशिव गोविन्द कात्रे। रेल विभाग में सेवारत अच्छा घर,अच्छा परिवार,अच्छा समाज और इन सबका आनंद लेते श्री कात्रे जी। अचानक प्रकृति का कहर टूट पड़ा उन पर। उन्हें कुष्ठ रोग हुआ था। जिस घर,परिवार और समाज में उनका अपना एक स्थान था,धीरे-धीरे उनसे दूर होते चले गए। समाज की कुष्ठ रोगियों के प्रति उपेक्षा और घृणा से भरी उस सोच को कात्रे जी ने खुद भोगा था इसलिए मन में एक टीस पैदा हो गई। तभी उन्होंने मन बना लिया था कुष्ठ रोगियों के लिए कुछ कर दिखाने का। उपचार से धीरे-धीरे कात्रे जी बिलकुल ठीक हो गए,किन्तु कुष्ठ रोग की यह विशेषता होती है कि रोग चाहे बिलकुल ठीक हो जाए,उसकी विकृतियां (ऊंगलियों का गल जाना,नाक चपटी हो जाना तथा आंख की भी भौंहें मोटी हो जाना) जीवनभर के लिए स्थाई हो जाती है। कात्रे जी के लिए यह रोग निराशा ले लेकर नहीं,अपितु एक नया आत्म विश्वास लेकर आया था। रेल्वे की सेवा से उन्होंने मुक्ति प्राप्त कर ली।
बिलासपुर के पास स्थित है चांपा स्टेशन। आजकल तो यह जिला मुख्यालय हो गया है। चांपा से कोई ७-८ कि.मी. की दूरी पर जनसंघ के तत्कालीन सांसद का एक बड़ा भूमि खंड वहां पर रिक्त पड़ा था। कात्रे जी ने इसे ही अपना कर्मक्षेत्र बनाना पसंद किया। लगभग ६५ एकड़ में फैली इस जमीन पर कात्रे जी ने अपनी झोपड़ी बनाई। यहीं कुष्ठ रोगियों की पहचान कर स्थान-स्थान से कुष्ठ रोग के कारण निर्वासित किए गए भाई-बहिनों को उन्होंने एक छत के नीचे एकत्र किया। सबकी अपनी -अपनी करुण कथाएं थीं।
बड़ा परिवार जब बना तो लालन-पालन हेतु कात्रे जी ने आस-पास के गांवों के घरों में अन्न पात्र रखने की व्यवस्था की। लोग एक-मुठ्ठी अन्न एकत्र कर कुष्ठ आश्रम को सहयोग दिया करते थे। इतना सब होते हुए भी समाज से असहयोग की घटनाएं भी साथ-साथ चलती रहती थीं। कुष्ठ आश्रम से आधा-आधा कि.मी. पहले ही बस,ट्रक,मेटाडोर आदि वाहन अपनी गति अत्यधिक तेज कर लिया करते थे। उन्हें भय रहता था कि कहीं कोई रोगी गाड़ी में सवार होने का आग्रह न करने लगे। परिवार जैसे-जैसे बढ़ रहा था,व्यवस्था की समस्याएं भी बढ़ने लगी। आवश्यकता की सामग्रियां लाने हेतु चांपा तक पैदल-पैदल जाना-आना भी कम कठिन न था। कात्रे जी ने आश्रम हेतु धन संग्रह किया। धीरे-धीरे कात्रे जी और आश्रमवासियों का श्रम रंग लाने लगा। बंजर भूमि को खोद-खोदकर उपजाऊ बनाया गया। धान चावल,दाल, गेहूँ,सब्जियां वहीं उपजाए जाने लगे। कात्रे जी की हार्दिक इच्छा थी कि समाज से ठुकराया हुआ यह वर्ग अपने स्वाभिमान को अक्षुण्ण रखते हुए अपने श्रम से अपना भोजन ही नहीं प्राप्त करे, बल्कि अन्य कार्य कर आजीविका चलाने हेतु धन भी अर्जित करे। इन्हीं विचारों को मूर्तरूप देते-देते यह ऋषि प्रयाण कर गया। आश्रमवासियों के लिए यह बड़ी क्षति थी,किन्तु कात्रे जी के सपनों को अपने सपने मानकर उन्हें मूर्त रूप देने का कार्य अपने कंधों पर ले लिया दामोदर गणेश बापट ने। बापट जी के सम्बंध में शेष सारी चर्चा से पूर्व आप सबके लिए यह जानना अधिक आवश्यक है कि वे स्वयं बिलकुल स्वस्थ्य हैं। निश्चय ही कात्रे जी की तपस्या से इनकी तपस्या इस रूप में और भिन्न रही,क्योंकि कात्रे जी स्वयं कुष्ठ रोगी थे, इसलिए उनका आत्मिक कष्ट तो समझा जा सकता है किन्तु बापट जी को तो इन रोगियों को देख-देखकर जो कष्ट हुआ उसी के परिणाम स्वरूप उन्होंने अपना सारा जीवन इसी कार्य के लिए अर्पित कर दिया।
धीरे-धीरे उनके जैसे अनेक सेवाभावी कार्यकर्ता तैयार होने लगे,जो स्वयं कभी रोगी नहीं रहे किन्तु उन्होंने कुष्ठ रोगियों के कष्ट को अपना कष्ट मानकर आश्रम जीवन में अपने-आपको लगा दिया। मैं एक लम्बी यात्रा के बाद जब गत माह चांपा के उस कुष्ठ आश्रम में पहुंचा तो एक बार में विश्वास ही नहीं हुआ कि इतना बड़ा मानवता का यह जीता-जागता प्रकल्प विकलांग हाथ-पैरों ने अपने श्रम-स्वेद की एक-एक बूंद से सींचकर तैयार किया है।
अब आश्रम की भूमि ८५ एकड़ हो गई है। धान के लहलहाते खेत प्रति वर्ष ८०० बोरी चावल पैदा करते हैं,जो ४०० आश्रमवासियों के लिए पर्याप्त हो जाता है। सब्जियों के खेतों में लगी ताजी सब्जियां मन को मोह लेती हैं। गौला में कुल मिलाकर लगभग १०० की संख्या में पशुधन है। दूध की भी कोई कमी नहीं रहती। आश्रम में भ्रमण करने पर यह जानकर आश्चर्य होता है कि,आश्रमवासी स्वयं ही ट्रेक्टर चलाकर खेती करने से लेकर अन्य सभी कार्यों में अपने को व्यस्त रखते हैं। बापट जी के सहयोगियों में से प्रमुख हैं दिवाकर देव यानी
‘देव काका‘,तथा अनेक वर्ष तक विदेशों में अभियंता के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके मनोहर कुण्टे भी अब आश्रम में ही रहते हैं। आश्रम में ही विद्यालयों को विक्रय करने हेतु श्याम पट्ट के लिए चाक निर्माण का कार्य भी होता है। इसी के पास दरी निर्माण का कार्य भी चलता है। बड़ी-बड़ी दरियों से लेकर छोटे-छोटे आसन तक सब-कुछ उनका अपना बनाया हुआ है। धागा कातने से लेकर दरी बुनने और विक्रय तक का कार्य सब मिलकर करते हैं। आदेश मिलने पर हर आकार की दरियां (बहुत उत्तम गुणवत्ता वाली) बनाई जाती हैं। इतना ही नहीं, अपने उपयोग की चटाईयां,टोकरियां तथ अन्य सामान भी ये स्वयं बनाते हैं। बढ़ई का कार्य हो या लोहारी का,सब इन्हीं का किया हुआ होगा। सर्वाधिक आवश्यकता इन्हें लगती थी चिकित्सालय की,जिसे डॉ. प्रभाकर गत २५ वर्ष से वहीं रहकर पूरी कर रहे हैं। उन्हें रोगियों की मरहम पट्टी करते देखना एक अनूठा अनुभव था। मैंने अपने जीवन में ऐसी श्रद्धा किसी मंदिर के पुजारी की आंखों में पूजा करते समय भी नहीं देखी।
बापट जी ने एक बहुत बड़ी भोजनशाला दिखाते हुए परिचय कराया-“ये रूकमणी बहन हैं,भोजनशाला यही सम्हालती हैं। यही हमारी अन्नपूर्णा मां है।” रूकमणी बहन ने संकोच से अपने हाथ साड़ी के पल्लू में छुपा लिए थे। सचमुच कैसा दृश्य था,समाज जिन हाथों को घृणाभाव से देखता था,उन्हीं हाथों से आटा गूंथकर भोजन बनाने वाली बहन को बापट जी ने ‘अन्नपूर्णा मां’ कहा था। यह जानकर आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता हुई कि,आश्रम में रोगी और स्वस्थ सब एक साथ एक छत के नीचे भोजन करते हैं। कोई दुराव नहीं,कोई घृणा नहीं। सेवाभाव को यहीं विराम नहीं मिला। बापट जी के मार्गदर्शन में एक विद्यालय भी वहीं खोल लिया गया,चूंकि कुष्ठ रोगियों के बच्चों को अन्य विद्यालयों में कई परेशानियों का सामना करना पड़ता था इसलिए विद्यालय भी अपना हो,यह विचार बना। विद्यालय खुला तो सोचा जब इतने बच्चे यहां रहते हैं तो अन्य स्थानों से आए अनाथ उपेक्षित बच्चों के लिए भी यह उनका अपना घर बन जाए। बस सुशील बालक गृह की कल्पना साकार हो गई। आज वहां १२० बच्चे हैं। यही नहीं, एकदम नन्हें-मुन्नों के लिए एक झूलाघर भी है,जहां ४० नन्हीं कोपलें विकसित हो रही हैं। सुशील बालक गृह के बाहर भगवान गणेश की मिट्टी की प्रतिमा देखकर आश्चर्य हुआ। पता लगा संतोष ने बनाई है,गणेश चतुर्थी पर स्थापना के लिए। इतना ही नहीं,आश्रम के प्रवेश द्वार के पास ही गणेश जी का एक सुन्दर स्थाई मंदिर भी आकार ले रहा है। उनका अपना एक विशाल मंदिर,सचमुच स्वावलंबन की पराकाष्ठा है यहां। स्वाभिमान,आत्म सम्मान और आत्म विश्वास की जीवन्त मूर्तियां हैं ये लोग। यहां एक सचल चिकित्सा वाहन पूर्व से तो है ही,आश्रम का अपना चिकित्सालय भी बनकर तैयार हो गया है। लगभग ५० बिस्तरों वाला यह चिकित्सालय एकदम स्वच्छ और किसी निजी नर्सिंग होम से कम नहीं लगता है। ऑपरेशन थियेटर तो बना ही है। पूर्व में हड्डियों में आई विकृति को दूर करवाने हेतु ऑपरेशन बाहर करवाना पड़ते थे,जिन पर अधिक व्यय होता था। अब अपना चिकित्सालय तो हो ही गया और ऑपरेशन थिएटर भी स्वयं का ही है। आश्रमवासी प्रसन्न हैं यह जानकर कि अमेरिका तथा अफ्रीका में अनेक वर्षों से सेवाएं दे रहे डॉ. जगदाले (एम.डी.,एफ.आर. सी.एस.)अब कुछ ही दिनों में यहीं आकर रहने वाले हैं। अखिल भारतीय कुष्ठ निवारक संघ,कात्रे नगर,चांपा इस पते पर आने वाली डाक और जाने वाली डाक की संख्या देखते हुए वहीं के लिए डाकघर भी स्वीकृत हो गया है,जिसे कात्रे नगर डाकघर कहा जाता है। आश्रम में कात्रे जी के समय में आए प्रारंभिक रोगियों में से एक वसन्त कुलकर्णी स्वयं कार्यालयीन व्यवस्थाएं देखते हैं। इनकी बेटी रेणुका यहीं के विद्यालय में अध्यापिका हैं,तो दूसरी बेटी जानकी नर्सिंग कोर्स कर यहीं के चिकित्सालय में परिचारिका हो गई हैं। असंभव को संभव कर दिखाने का जीवन्त उदाहरण है यह आश्रम। वहां स्थित कात्रे जी की समाधि एक ऐसा दीप स्तंभ है,जो कई भटके हुए मनों को दिशा देगा।
आश्रम से विदा हो रहा था कि पता लगा गौला में एक गाय ने नन्हीं बछिया को जन्म दिया है। नन्हें मेहमान की सूचना ने बापट जी,देव काका और आश्रमवासियों को प्रसन्न कर दिया। सबकी आंखों में हिलोरे लेता निश्छल स्नेह कह रहा था-समाज ने हमें चाहे जो दिया हो,हमारे पास तो बस अपनत्व है जो हर आने वाले मेहमान के लिए बाहर छलक आता है। आप,हम सब तो कात्रे जी और बापट जी जैसे महामानवों के इन कार्यों को देखकर या विवरण पढ़कर रोमांचित भर हो सकते हैं, किन्तु हजार का लाख और लाख का करोड़ बनाते हम लोग क्या अपने दायित्व को भूल जाएंगे ? यदि हमने आश्रम से चाक,दरियां क्रय कर मंगवाई या अपनी आय में से शतांश भी सहयोग रूप में वहां भेजा तो शायद हमारा जीवन भी धन्य हो जाए। अन्त में उस पुण्य स्थली के लिए यही कहा जा सकता है-“यहां स्वर्ण मत खोज,यहां पर मानव ढलता है।”

परिचय-डॉ. विकास दवे का निवास इंदौर (मध्यप्रदेश)में है। ३० मई १९६९ को निनोर जिला चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) में जन्मे श्री दवे का स्थाई पता भी इंदौर ही है। आपकी पूर्ण शिक्षा-एम.फिल एवं पी-एच.डी. है। कार्यक्षेत्र-सम्पादक(बाल मासिक पत्रिका) का है। करीब २५ वर्ष से बाल पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्यरत हैं। सामाजिक गतिविधि में डॉ.दवे को स्वच्छता अभियान में प्रधानमंत्री द्वारा अनुमोदित एवं गोवा की राज्यपाल डॉ. मृदुला सिन्हा द्वारा ब्रांड एम्बेसेडर मनोनीत किया गया है। आप केन्द्र सरकार के इस्पात मंत्रालय की हिंदी सलाहकार समिति में सदस्य हैं। इनकी लेखन विधा-आलेख तथा बाल कहानियां है। प्रकाशन के तहत सामाजिक समरसता के मंत्रदृष्टा:डॉ.आम्बेडकर,भारत परम वैभव की ओर, शीर्ष पर भारत,दादाजी खुद बन गए कहानी (बाल कहानी संग्रह),दुनिया सपनों की (बाल कहानी संग्रह), बाल पत्रकारिता और सम्पादकीय लेख:एक विवेचन (लघु शोध प्रबंध),समकालीन हिन्दी बाल पत्रकारिता-एक अनुशीलन (दीर्घ शोध प्रबंध), राष्ट्रीय स्वातंत्र्य समर-१८५७ से १९४७ तक(संस्कृति मंत्रालय म.प्र.शासन के लिए),दीर्घ नाटक ‘देश के लिए जीना सीखें’,(म.प्र.हिन्दी साहित्य अकादमी के लिए) और हिन्दी पाठ्य पुस्तकों में ४ रचनाएं सम्मिलित होना आपके खाते में है। १००० से अधिक रचनाओं का प्रकाशन बाल पत्रिका सहित विविध दैनिक-मासिक पत्र-पत्रिकाओं में है,जबकि ५० से अधिक शोध आलेखों का प्रकाशन भी हुआ है।डॉ.दवे को प्राप्त सम्मान में बाल साहित्य प्रेरक सम्मान २००५,स्व. भगवती प्रसाद गुप्ता सम्मान २००७, अ.भा. साहित्य परिषद नई दिल्ली द्वारा सम्मान २०१०,राष्ट्रीय पत्रकारिता कल्याण न्यास,दिल्ली सम्मान २०११,स्व. प्रकाश महाजन स्मृति सम्मान २०१२ सहित बाल साहित्य जीवन गौरव सम्मान २०१८ प्रमुख हैं। आपकी विशेष उपलब्धि म.प्र. शासन के पाठ्यक्रम में नैतिक शिक्षा समाहित करने हेतु गठित सलाहकार समिति में सदस्य,म.प्र. शासन के पाठ्यक्रम में गीता दर्शन को सम्मिलित करने हेतु गठित सलाहकार समिति में सदस्य,म.प्र. साहित्य अकादमी के पाठक मंच हेतु साहित्य चयन समिति में सदस्य। होना है। आपको ७ वर्ष तक मासिक पत्रिका के सम्पादन का अनुभव है। अन्य में सम्पादकीय सहयोग दिया है। आपके द्वारा अन्य संपादित कृतियों में- ‘कतरा कतरा रोशनी’(काव्य संग्रह), ‘वीर गर्जना’(काव्य संग्रह), ‘जीवन मूल्य आधारित बाल साहित्य लेखन’,‘स्वदेशी चेतना’ और ‘गाथा नर्मदा मैया की’ आदि हैं। विकास जी की लेखनी का उद्देश्य-राष्ट्र की नई पौध को राष्ट्रीय चेतना एवं सांस्कृतिक गौरव बोध से ओतप्रोत करना है। विशेषज्ञता में देशभर की प्रतिष्ठित व्याख्यानमालाओं एवं राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों में १५०० से अधिक व्याख्यान देना है। साथ ही विगत २० वर्ष से आकाशवाणी से बालकथाओं एंव वार्ताओं के अनेक प्रसारण हो चुके हैं। आपकी रुचि बाल साहित्य लेखन एवं बाल साहित्य पर शोध कार्य सम्पन्न कराने में है।

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  1. पढ़ते पढ़ते मन भावुक हो गया … विभिन्न कष्टों / विसंगतियों को भोगते समाज और उस दृश्य बदलने को प्रयासरत मनु की संतान l अंधकार में से भी उजला, प्रभावित करने वाला और प्रेरणा देने वाला पक्ष निकलकर सामने रखने के लिए आपक हृदय से आभार विकास जी
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