यह प्रयोग बेतुकी चाल

श्यामरुद्र पाठक
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प्रतियोगिता परीक्षाओं में अंग्रेज़ी की अनिवार्यता समाप्त किए बिना अभियांत्रिकी या चिकित्सा की पढ़ाई में हिंदी का प्रयोग शुरू करना एक बेतुकी चाल है।

मैं ‘क्लेट’,’केट’,जेएनयू और डीयू में आयोजित प्रवेश परीक्षाओं,एसएससी और यूंपीएससी द्वारा आयोजित प्रतियोगिता परीक्षाओं की बात कर रहा हूँ,जिनका पाठ्यक्रम हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में पढ़ाया जा रहा है।

जिन प्रतियोगिता परीक्षाओं का पाठ्यक्रम भारतीय भाषाओं में पढ़ाया जा रहा है और जिनके आधार पर देश के युवाओं के किस्मत के दरवाजे खुलते हैं, उनमें अंग्रेज़ी की अनिवार्यता न समाप्त करके अभियांत्रिकी और चिकित्सा की पढ़ाई से सम्बंधित परीक्षाओं,जहाँ पाठ्यक्रम अंग्रेजी में पढ़ाया जा रहा है,में हिंदी माध्यम से उत्तर लिखने का विकल्प देना कुछ अटपटी-सी बात है |
दूसरे में अगर यह बेतुकी चाल चलनी भी है तो इसे समस्त हिंदी भाषी क्षेत्र में व्यापक स्तर पर शुरू करना चाहिए। शुरुआत से ही हिंदी भाषी क्षेत्रों में स्थित आईआईटी और एआईआईएमएस को इनमें जरुर सम्मिलित किया जाना चाहिए, नहीं तो हिंदी माध्यम में अभियांत्रिकी और चिकित्सा की परीक्षाएँ देने वाले लोग ओछे स्तर के अभियंता और चिकित्सक माने जाएँगे।

मुद्दा हिन्दी में चिकित्सा पढ़ाई का

अखिल भारतीय प्रतियोगिता परीक्षाओं में पूरे भारत (अतः पूरे हिंदी भाषी क्षेत्र) से लोग भारी संख्या में भाग लेते हैं,अतः जब भी सिविल सेवा परीक्षा, आईआईटी प्रवेश परीक्षा आदि प्रतियोगिता परीक्षाओं में अंग्रेज़ी की अनिवार्यता समाप्त हुई,भारतीय भाषाओं (हिंदी भाषा)में सम्बन्धित विषयों की पुस्तकों की आवश्यकता बहुत बड़े छात्र समुदाय के लिए हुई; अतःनिजी प्रकाशकों ने व्यापारिक दृष्टिकोण से आकर्षित होकर खुद ही हिंदी भाषा में सम्बंधित पुस्तकों को विशेषज्ञों से लिखवाकर तैयार करवाया और इस प्रकार हिंदी में आवश्यक पुस्तकों को छपवाने में न तो सरकार को और न ही किसी हिंदी सेवी को कोई काम करना पड़ा।
अतः पूरे राज्य या पूरे हिंदी भाषी क्षेत्र जैसे व्यापक स्तर पर प्रस्तावित परिवर्तन न करके अगर किसी एक अभियांत्रिकी या चिकित्सा महाविद्यालय की परीक्षाओं में हिंदी माध्यम में लिखने की छूट दी जाएगी तो विद्यार्थियों के लिए हिंदी भाषा में आवश्यक पुस्तकों का भी अभाव रहेगा।

उपर्युक्त बातों को नजरअंदाज करके हिंदी के नाम पर कमाने- खाने के लिए भोपाल के हिंदी विश्वविद्यालय में शुरू किए गए अभियांत्रिकी के सारे पाठ्यक्रम बंद करने पड़े और दाखिला लिए हुए सारे विद्यार्थियों को या तो पढ़ाई छोड़ देनी पड़ी या कहीं अन्यत्र अंग्रेज़ी माध्यम में दाखिला लेना पड़ा।

    (सौजन्य:वैश्विक हिन्दी सम्मेलन मुम्बई)

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