यातना और अंधकार के खिलाफ प्रेरित करती कविताओं का कलश

गुलाबचंद एन.पटेल
गांधीनगर(गुजरात)
*********************************************

समीक्षा-काव्य संग्रह………………………………………………

राजकुमार जैन ‘राजन’ द्वारा प्रस्तुत काव्य संग्रह `खोजना होगा अमृत कलश` कविता संग्रह से एक बार जरुर अमृत पीना होगाl इसमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाली रचनाएं हमें प्रेरित करती हैl हमारा आत्मविश्वास बढ़ाती हैl सामाजिक,आर्थिक,प्राकृतिक और सामाजिक परम्पराओं में पनप रही विषमताओं के प्रति आक्रोश हैl हताश और हारे हुए व्यक्ति को प्रेरित करती ये कविताएं आज की संघर्षमय जिन्दगी में खोते हुए रिश्तों के मूल में कुठाराघात करती हैंl अंधकार से प्रकाश की ओर आगे बढ़कर जीवन में एक नया सूरज उगाकर सहायता प्राप्त करने को प्रेरित करती यह कविताएं बहुत उत्कृष्ट हैंl इनकी कविताएं आशा और विश्वास जगाती हैंl कवि का कला रेखांकन भी बहुत सुंदर हैl राजन में संवेदना बहुत भरी हुई है,तभी तो इतनी संवेदनशील रचना का जन्म हुआ हैl इस कारण सामाजिक मूल्यों, सांस्कृतिक,राजनीतिक,आर्थिक और पुराने समय से लेकर वर्तमान समय तक अपनी दिव्य दृष्टि से इसे एक नया मार्ग दिखाती यह कविताएं बहुत प्रेरक हैंl

अमृत कलश में `लाखों संकल्प` कविता में कवि ने आज के युग की चिंताओं का जिक्र किया हैl महाभारत के पात्रों द्रोणाचार्य,अभिमन्यु और अर्जुन का उदाहरण देकर आज के हस्तिनापुर की बातें की है,एवं आज के युग में दुर्योधनों के कमी नहीं है,यह बात कविता के माध्यम से की गई हैl

आज मानवता और विश्वास खो गए हैंl आज-कल खूनी खेल जो खेले जा रहे हैं,वो इतिहास बन जाएगा,ऐसी संभावना कवि ने `बन जाएगा इतिहास` कविता में देखी हैl इन्सान को टूटते हुए दर्पण को देखना है,सर्वथा जैसे सार्थकता नहीं खोताl इस तरह आज दर्पण बनोगे तो सार्थकता प्राप्त होगी,ये बात `सार्थकता` कविता में लिखी गई हैl इस धरती पर अमृत की जगह `विष बीज किसने बोया ?` इसकी चिंता भी कवि ने प्रकट की हैl

कहीं बम धमाके,विधवाओं की चीत्कार,पशुओं का विलाप,लूट,हत्या,बलात्कार की घटनाएँ देखकर कवि ने अपील की है कि,आओ हम सब मिलकर जिन्दगी का गीत लिखेंl `जिन्दगी का गीत` में यह बात लेखक राजन ने की हैl

साँझ के अंधेरों में चांदनी की शीतलता,धर्मशालाओं में गुरुओं की वाणी को ढूँढने में इन्सान असमर्थ हैl आज सूर्य किरणों की चमक ने इन्सान को पक्षियों का कलरव,फूलों का रंग,मिट्टी की गंध,गीतों की हृदय को छू लेने वाली वाणी आज अंतहीन यात्रा का अनुभव कराती है,ये `अंतहीन अनुसंधान` कविता में दिखाया गया हैl `अंधकार के बीज` कविता में अंधकार के सामने लड़ने के लिए इन्सान को अपना अंतर्मन की मशाल जलाने का आह्वान किया गया हैl फूलों की मुस्कराहट,हवा की खुशबू,चांदनी के पांव के घुंघरू और संस्कृति को ले जाने वाले ‘तुम कौन हो ?` आजकल मरने वालों से मरवाने वाले बड़े होते हैंl पतझड़ से डरने का मतलब,जिन्दगी की दौड़ में मिलती कठिनाईयों से नहीं,डरकर एक हाथ में बसंत लेकर उसका सामना करने चलते रहने की बात कवि ने `हाथ में बसंत` कविता में की हैl आसमानी हवाओं की खुशबू,धीरे-धीरे बहती नदी के कल-कल,चिड़िया की चिहूं-चिहूं के साथ मुस्कराहट और सूखे गुलाब के फूल की तरह टूटता हुआ विश्वास,श्रद्धा को देखकर कवि व्यथित होता हैl इसे `नियति` का क्रम मान के स्वीकार किया हैl मंजिल की तलाश में कंटीला सफर में चलते हुए भी इन्सान कभी हारा नहीं हैl वो रुक-रुककर संघर्ष के साथ आगे बढ़ रहा हैl `हारा भी नहीं हूँ मैं` कविता में देखने को मिलती हैl

दादर पुल का उदाहरण देकर कवि राजन ने `हाशिए` पर कविता में पुल के नीचे एक निराश मन के साथ रोशनी का टुकड़ा ढूंढता,फटी पेंटवाला,स्वप्नों के घरौंदे से बुनता हुआ,अपमानित होता हुआ,जुल्म सहता हुआ,खामोशियों के साथ रोशनी की तमन्ना के साथ चलते इन्सान का सुंदर वर्णन किया हैl स्वप्नों के साथ नई आशा लेकर,आती हुई सुबह शाम होते ही इच्छाएं मौन हो जाती है,इसलिए कवि राजन कहते हैं कि,समय के हाथ में रोशनी को लेकर धरती में इसे उगाओ,शब्द बीज-खाद डालकर धैर्य रूपी पानी से सिंचन करने से तुम्हें सफलता जरुर प्राप्त होंगेl ऐसा बोध `अस्तित्व बोध` कविता में दिया गया हैl आत्मीय के स्थान पर मुखौटा के रुप में मिलते सफेद पोषाक के सेवक द्वारा चीर-हरण, इच्छा,लालसा,लोभ,प्रमाद,आस्था खो चुका इन्सान बन गया है,लेकिन प्रतीक्षा है कि,सूर्य की किरणों जैसी,गम जैसी आंधियां दूर करने के लिए ‘आशा की लौ जलती रहेगी` कविता में ऐसी कल्पना कवि ने की है।

स्वप्नों की पगदंडी पर चलते-चलते आज इन्सान के पांव थम गए हैंl भौतिकता के मीठे विष में विश्वास गलत साबित होने लगा हैl फिर भी वो चल रहा है,बढ़ रहा है सूर्य की तलाश मेंl कवि को आशा है कि,जीवन में एक नई `स्वप्नों की पगदंडी` जरुर खुलेगी और सफलता प्राप्त होगीl`

आज लोगों के जीवन में अजीब-सी ख़ामोशी,मौन और सन्नाटा हैl अनाम,अनगिनत पीड़ा और प्रश्नों के डंक से समय कहीं खो गया हैl कवि कहते हैं कि,सफलता के लिए आशा का पूरा `सूरज अपनी हथेली में उगाओ` जरुर सफलता प्राप्त होगीl भाषणों के माध्यम से एक शतरंगी चाल वाला अभियान चलाया जा रहा हैl घड़ियाली आंसू बहाए जा रहे हैंl गाँव की चौपाल से लेकर मंदिर, मस्जिद,धर्मशाला और संसद के गलियारों के तक बड़ी सावधानी से इन्सान-इन्सान के बीच अलगाववाद पैदा करके विष बांटा जा रहा है,इसलिए कवि ‘राजन’ के मन में सवाल उठकर बार-बार कहता है कि,ये दुनिया ऐसी क्यूँ है ? `एक सवाल` कविता में कवि ने कहा है कि,वही पुराना सवाल पूछता रहूँगा कि ये दुनिया ऐसी क्यूँ हैl

सूखे फूलों ने अपनी गंध को पकड़ रखा हैl स्नेह का अभाव है। आज आशाओं के दीप बुझते जा रहे हैं। कोई सूखे गुलाब के फूलों से महसूस करें। क्यों अहंकार के सामने जंग नहीं छेड़ते हम ? ‘सूखे फूलों की गंध’ कविता में ये सुंदर बात कवि ने की है।

कवि ने बेरोजगार की पीड़ा बहुत खूबी से व्यक्त की है। बेरोजगार को हमारी दुनिया का महत्व का अंग माना है,ऐसी बात कवि ने ‘बेरोजगार’ कविता के माध्यम से की है।

नहीं देखा मैंने समुद्र फिर भी मेरे मन को कोई छूता है तो मेरे मन के पेहरुओं को लहरें उठाकर फेंक देती है । तूफान बाद समुद्र खामोश हो जाता है। ‘नहीं देखा समुद्र’ फिर भी उसकी गर्जना को महसूस करता है।

कवि राजन कहते हैं कि सूरज ढलने के बाद अँधेरा हो जाता है। फिर सुबह में रोशनी आती है,इसलिए अँधेरे से डरो मत। फसलें शांति की उगाएंगे तो प्यार की जिन्दगी शुरु होगी,इसलिए ‘भागे न कोई हार।’ टूटी हुई खटिया पर खाँसती लेटी हुई माँ,सयानी हो रही मुनिया,किताब और पेन के लिए ज़िद करते मुन्ना को देखकर अनाज मंडी में कंधे पर बोरियां ढोता,बीड़ी के कश में धुंआ उठाता,पसीने से तर-बतर ‘वह आदमी निराश नहीं है।

प्रकृति के तांडव के कारण उतराखंड,कभी नेपाल,कभी कश्मीर में मौत की बरसात हो रही है। आज भरे पेटों के जूठन भूख से बिलखने लगा है जीवन। आतंक की छाया को दूर करने के लिए रोशनी के पेहरूओं को जलती मशालें लेकर नया प्रकाश फैलाने की सीख कवि राजन ‘रोशनी के पेहरुओं’ कविता में दे रहे हैं।

इस देश की बदहाल प्रजा को बड़े बड़े स्ट्रीट लाईट की रोशनी जैसे जगमगाते आश्वासन मिलते हैं। एक मुठठी हौंसले में रोशनी सजाते अंधकार को पराजित करने के लिए ‘एक सूरज फिर उगाना होगा’ कविता में सुझाव दिया गया है कि एक सूरज फिर उगाना होगा। ‘बचपन की बरसात’ कविता में मूसलधार बारिश में चू रही पानी की टप-टप को कवि ने अमृत कलश में ढोया है। ‘खोजना होगा अमृत कलश’ कविता में राजन बताते हैं कि रंग बदलती दुनिया में दर्द का रंग नहीं बदल पाता है। इन्सान इतना बौना हो गया है कि अपना कहा ही भूल गया है। विश्वास भटक गया है और मुस्कुराहट भीड़ में खो गई है। अब संबंधों पर पहरा है,और इंसानियत बहरी है।

जीवन मूल्य अंधकार में खो गया है। सब तरफ मायाजाल में जज्बात और भावनाओं की कोई कीमत नहीं है इस दुनिया में। कवि कहते हैं कि, सपनों की दुनिया से बाहर निकलकर यातना शिविर से फैले जाल को अब तोड़ना होगा। धरा पर जो प्यार की खुशबू मानवता के घर-आंगन को रोशन करे,सदभाव के दीए जलाए,ऐसा अमृत कलश खोजना होगा। तब उदय होता सूरज ‘सत्यम शिवम् सुन्दरम’ का प्रकाश फिर से फैला देगा।

बाल साहित्य के क्षेत्र में विस्तार से काम कर रहे तथा ३० से अधिक पुरस्कार प्राप्त राजकुमार कुमार ‘राजन’ की साहित्य और समाज के प्रति ऐसी उम्दा भावना बहुत कम लोगों में दिखाई देती है।

जिस कविता का विवेचन छूट गया है वो पाठकों के लिए विवेचन करने हेतु छोड़ दी है। अंत में यही कहूँगा कि राजकुमार जैन ‘राजन’ ईमानदार, मानवतावादी,समाज उत्प्रेरक और एक सैनिक की भूमिका निभाते हैं। वर्तमान के अंधेरों में भी ये जाग रहा है और काम के लिए प्रश्न खोज रहा है। आप उनकी कविताएँ पढ़ेंगे तो आपको भी ये कविताएं सार्थक लगेगी,ऐसा हमें विश्वास है।

Hits: 47

आपकी प्रतिक्रिया दें.