याद है न…

प्रखर दीक्षित 
फर्रूखाबाद (उत्तर प्रदेश)
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याद है न तुम्हें,
वह सावन की अनवरत झड़ी
दफ़्तर से लौटते वक्त,
काले कजरारे बादलों ने
हमें आगोश में ले लिया था।
न कहीं सिर छुपाने की जगह,
न बचने-बचाने का कोई साधन
बस एक तुम्हारा दुपट्टा ही तो था…
जो इक छतरी और हम हैं दो,
की मांग पूरी कर रहा था॥
पहले भीगने से बचने का असफल यत्न,
सराबोर होने के बाद
जीवन समेट लेने को आतुर मन,
मुझे याद है तुम्हारी ना-नुकुर में
तुम्हारी मौन सहमति परिलक्षित थी॥
हमें पता ही न चला,
कब बरसात थमी
कब ठंडी हवा के झोंके ने,
पूरा तन-मन कंपा दिया
बेसुध से उस टर्राते स्कूटर पर,
बैठ घर की राह धरी॥
समय के चक्र में,
सब कुछ बह गया …….
यौवन रंग संगी-साथी नाते-रिश्ते,
और…और तुम भी
काल के करूर पंजों ने मेरी,
जीवनसंगिनी छीन ली॥
…दे गया यादें,
सावन के बिताए वह क्षण
गवाह हैं तुम्हारी धुंधली स्मृतियाँ,
प्रिये…॥

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