योग्य मार्गदर्शक थे बैरागी जी

डॉ.राजेश्वर उनियाल
मुंबई(महाराष्ट्र)

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बंधुओं,साहित्यकार नीरज नैथानी जी के माध्यम से समाचार पढ़ा कि,आदरणीय बालकवि बैरागी जी का निधन हो गया है। बैरागी जी का का मुझसे अत्यंत स्नेहमयी संबंध था। मैं उनसे अक्सर साहित्य विमर्श किया करता करता था। सचमुच में वह स्वयं एक वरिष्ठ साहित्यकार ही नहीं थे,बल्कि योग्य मार्गदर्शक भी थे। मैंने `हिंदी लोक साहित्य का प्रबंधन` विषय की एक पुस्तक लिखी थी,परंतु इसे प्रकाशित नहीं करवा पा रहा पा रहा था। मेरी चिंता इस बात की थी कि,हिंदी साहित्य समाज,लोक साहित्य में प्रबंधन विषय को स्वीकार भी करता है या नहीं,क्योंकि लोक साहित्य में प्रबंधन शब्द शायद हिंदी साहित्यकारों को स्वीकार्य नहीं होगा। मैंने जब इस संबंध में आदरणीय बैरागी जी से राय मांगी तो उन्होंने मुझे अपनी पांडुलिपि भेजने के लिए कहा। उसके लगभग १ महीने बाद उनका मुझे एक पत्र आया और उन्होंने आयाl उन्होंने लिखा कि यह पुस्तक-नई गायत्री का सूर्योदय-के समान है। आलोचकों की चिंता मत करो और इसे तुरंत छाप दो। देख लेना आपको यह पुस्तक राष्ट्रीय सम्मान व पहचान दिलाएगी। इसी के साथ उन्होंने पुस्तक की प्रस्तावना भी लिखी। कहना न होगा कि इसी पुस्तक ने मुझे भारत के राष्ट्रपति के कर कमलों से पुरस्कृत भी करवाया। ऐसे साहित्यिक ऋषि को नम आंखों से श्रद्धापूर्वक नमन…l
          (सौजन्य-वैश्विक हिंदी सम्मेलन,मुंबई)

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